Wednesday, July 27, 2011

कैटरीना का विवादित बयान, 'राहुल गांधी हैं आधे भारतीय'



कैटरीना का विवादित बयान, 'राहुल गांधी हैं आधे भारतीय'



आमतौर पर फिल्म अभिनेत्री कैटरीना कैफ विवादों से काफी दूर रहना पसंद करती हैं और कुछ भी ऐसा नहीं बोलती जिससे कोई विवाद पैदा हो|

मगर इस बार कैटरीना ने कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी पर विवादस्पद टिपण्णी कर नया विवाद उत्पन्न कर दिया है|कैटरीना ने राहुल गांधी के बारे में कहा है कि वह आधे भारतीय हैं|

कैटरीना ने हाल ही में यह बातें एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में कहीं और उन्होंने इसके माध्यम से उन लोगों को करारा जवाब दिया जो हमेशा उनके पासपोर्ट,सरनेम और उनकी जाति पर सवाल उठाते हैं|

कैट ने कहा कि मैं जो हूं उसमें बहुत खुश हूं और मुझे समझ नहीं आता लोगों को इससे समस्या क्या है| मैंने कभी यह बात नहीं छुपाई कि मेरी माँ ब्रिटिश मूल की हैं|क्या मुझे इस बात पर शर्म आनी चाहिए कि मैं आधी एशियन हूं और आधी यूरोपियन?मैं ऐसा बिलकुल नहीं मानती|राहुल गांधी भी आधे भारतीय और आधे इटेलियन हैं|उसी तरह वह भी आधी भारतीय हैं तो इसमें बुरा क्या है|गौर करने वाली बात ये है कि कैटरीना की माँ ब्रिटेन की हैं जबकि उनके पिता भारतीय|कैट का जन्म हांग कांग में हुआ और उनकी परवरिश ब्रिटेन में अपनी माँ के पास हुई|





http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-katrina-kaif-said-rahul-gandhi-is-half-indian-2275753.html

देश को क्यों धोखा दे रहे हैं यह गांधी...............







देश को क्यों धोखा दे रहे हैं यह गांधी................


पहली प्रति में देखिये निर्वाचन आयोग को लोकसभा 2009 में दिये गये शपथ पत्र पर एमफिल कहां से किस विषय में और कब करने का दावा किया है, और दूसरे चित्र में देखिये उसी संस्थान ने इस झूठ से कैसे पर्दा उठाया है। यहां एक चीज और है राहुल गांधी का नाम (रॉल विंसी) बदल गया था...... क्यों यह तो उनका परिवार ही बतायेगा.....तीसरे चित्र में इस जानकारी की पुष्टि करती एक्सप्रेस न्यूज सर्विस की खबर की कटिंग भी लगी है.... संभवतः जिन मित्र ने यह उपलब्ध कराई है ... खबर छापने वाले पत्रकार का नाम हटा दिया है ... क्यों नहीं कह सकते ......इसके नीचे देख सकते हैं .... दिल्ली के महरौली और साकेत जैसी जगह पर फार्म हाउस और मॉल्स कितने सस्ते हैं............ जिनकी आदर्णीय राहुल जी ने कीमत सिर्फ लाखों में दिखाई है.................. कीमत सुन मेरे मन में लालच आ गया .... अगर वो बताई गयी कीमत से दुगने में भी बेचने को तैयार हों तो ....... कहीं न कहीं से लोन लेकर मैं खरीदने को तैयार हूं.........

Tuesday, July 26, 2011

कारगिल विजय दिवस: जरा याद करो कुर्बानी


कारगिल विजय दिवस: जरा याद करो कुर्बानी
‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’।
(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)
गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था।

26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।



कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि : कारगिल युद्ध जो कारगिल संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से प्रारंभ हुआ था।

इस युद्ध का कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना।

पूरे दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध (विदेशी मीडिया ने इस युद्ध को सीमा संघर्ष प्रचारित किया था) में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।

हिमालय से ऊँचा था साहस उनका : इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है।

इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।

भारत के वीर सपूत :

‘ये दिल माँगे मोर’ - हिमाचलप्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी।

यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही।
इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया।

राजपूताना राइफल्स के मेजर पद्मपाणि आचार्य भी कारगिल में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके भाई भी द्रास सेक्टर में इस युद्ध में शामिल थे। उन्हें भी इस वीरता के लिए ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।



1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए।

गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

भारतीय वायुसेना भी इस युद्ध में जौहर दिखाने में पीछे नहीं रही, टोलोलिंग की दुर्गम पहाडियों में छिपे घुसपैठियों पर हमला करते समय वायुसेना के कई बहादुर अधिकारी व अन्य रैंक भी इस लड़ाई में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में से थे कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी पैट्रोलिंग पार्टी के जवान। घोर यातनाओं के बाद भी कैप्टन कालिया ने कोई भी जानकारी दुश्मनों को नहीं दी।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान भी दुश्मन गोलीबारी का शिकार हुआ। अजय का लड़ाकू विमान दुश्मन की गोलीबारी में नष्ट हो गया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए।

वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया।

युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था। बाद में नवाज शरीफ और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पाक सेना की भूमिका को स्वीकार किया था। यह युद्ध हाल के ऊँचाई पर लड़े जाने वाले विश्व के प्रमुख युद्धों में से एक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ही देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं।

पर कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।

मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी...

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।



आज की पीढ़ी के सामने दो मिसालें हैं, देश का माथा ऊंचा करने वाले जाबांज सपूत और देश को शर्मसार करने वाले घोटालेबाज, आप कौन सी मिसाल अपनाना चाहेंगे?

Saturday, June 11, 2011

सरदार पटेल ने पूरा नहीं होने दिया पं. नेहरू का ख्वाब


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सरदार पटेल ने पूरा नहीं होने दिया पं. नेहरू का ख्वाब

Jun 11, 09:11 am


अहमदाबाद [शत्रुघ्न शर्मा]। अयोध्या के विवादित ढांचे से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी कहीं न कहीं जुड़े थे। वह पांचवे दशक में सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर सरकारी खजाने से विवादित ढांचे का पुनर्निर्माण कराना चाहते थे, लेकिन लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने उनकी इच्छा को परवान नहीं चढ़ने दिया। सरदार पटेल ने इसके लिए सरकारी खजाने से एक रुपया भी देने से साफ इंकार कर दिया।

पटेल की दलील थी कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार जनभागीदारी से हुआ है। ऐसे में विवादित ढांचे का पुनर्निर्माण सरकारी खजाने से कराने का प्रश्न ही नहीं उठता।

यह खुलासा सरदार पटेल की बेटी मणीबेन की डायरी के अंशों से हुआ है। सरदार पटेल मेमोरियल ट्रस्ट अहमदाबाद मणीबेन की इस डायरी के पुर्नप्रकाशन की तैयारी कर रहा है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस ट्रस्ट के अध्यक्ष दिनशा पटेल वर्तमान में मनमोहन सरकार के काबीना मंत्री हैं। डायरी के जल्द बाजार में आने की संभावना है। इसके बाजार में आने पर कांग्रेस की मुसीबत बढ़ सकती है।

मणीबेन की डायरी के अंशों में साफ कहा गया है कि कांग्रेस की हिंदू विरोधी मानसिकता पं. नेहरू के जमाने से चली आ रही है। कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पुरानी है, क्योंकि उसने हमेशा मुसलमानों को वोट बैंक के नजरिये से आंका।

डायरी के अंशों में आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी, पं. नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस और सरदार पटेल में तमाम मुद्दों पर गंभीर मतभेदों की बात भी शिद्दत से स्वीकारी गई है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि सरदार पटेल चूंकि महात्मा गांधी का काफी सम्मान करते थे। इसलिए वह उनके निर्देशों का पालन किया करते थे।

डायरी में कश्मीर, हैदराबाद रियासत के एकीकरण के मुद्दे पर नेहरु व सरदार में मतभेद की बात भी कबूली गई है। इसमें कहा गया है कि कश्मीर को लेकर नेहरु के राजनीतिक प्रयासों को सरदार ने बचपना तक कह दिया था।

उड़ीसा में आईजीपी की नियुक्ति पर 21 सितंबर 1950 की एक घटना का उल्लेख करते हुए मणीबेन ने डायरी में उल्लेख किया है कि प.नेहरू तथा मौलाना आजाद इस स्तर पर भी राष्ट्रवादी विचारधारा के बजाए हिंदू-मुस्लिम के रूप में सोचते थे। डायरी में इसे विकृत धर्मनिरपेक्षता बताते हुए सरदार के लिए बाधक बताया गया है।

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे तथा योग गुरु बाबा रामदेव भले आज भ्रष्टाचार तथा लोकपाल बिल की लड़ाई लड़ रहे हों ,लेकिन जुलाई 1950 को खुद सरदार पटेल ने रफी अहमद किदवई तथा फिरोज गाधी पर रिश्वत लेकर लाईसेंस बेचने के सबूत देने के बावजूद नेहरू चुप रहे। अगस्त 1950 में किदवई ने यहा तक कह दिया था कि उनके खिलाफ कार्रवाई हुई तो वे नेहरु को ब्लैकमेल करेगे।

मणिबेन ने मुसलमानों को भारत माता काऐसा छोटा बेटा बताया है जिसे जानबूझकर इस दलदल में धकेला गया है।

ट्रस्ट के संयुक्त सचिव प्रभाकर खमार बताते है कि इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदार पटेल-द डायरी ऑफ मणीबेन पटेल 1934-1950 में देश की राजनीति के उन स्याह पन्नों पर प्रकाश डाला गया है जो अभी तक अछूते थे। डायरी में सरदार की प्रतिभा को समस्याओं से संघर्षरत् यौद्धा के रूप में उभारा गया है।

Tuesday, June 7, 2011

काले धन पर और समिति की जरूरत नहीं... रामलीला मैदान में घायल राजबाला की हालत गंभीर



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काले धन पर और समिति की जरूरत नहीं
Jun 07, 08:32 pm

नई दिल्ली। काले धन के खिलाफ कार्रवाई के लिए बन रही समिति और अध्ययन के बहाने भ्रष्ट राजनेताओं, बिजनेसमैनों और नौकरशाहों को अपने अवैध धन को मुखौटा कंपनियों में लगाने का मौका मिल जाएगा। यह कहना जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स स्टडीज एंड प्लानिंग के प्रमुख प्रोफेसर अरुण कुमार का।

उन्होंने कहा कि अध्ययन, समितियां या नई विशेष जांच शाखा का गठन और विदेशी सरकारों के साथ संधियां कार्रवाई को लटकाने के लिए हैं। 'द ब्लैकमनी इन इंडिया' किताब के लेखक कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा काले धन पर अध्ययन शुरू करने या समितियां बनाने से भ्रष्टचार में लिप्त उच्चपदस्थ अधिकारियों और राजनेताओं को अपना पैसा विदेशों में कंपनियों में लगाने का मौका मिल जाएगा।

उन्होंने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने अवैध धन का निवेश अफ्रीकी खनन उद्योग में किया।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी की प्रोफेसर इला पटनायक का भी कमोबेश यही मानना है। उन्होंने कहा कि कर से जुड़े अपराधों पर नियंत्रण के लिए आपराधिक जांच निदेशालय [डीसीआइ] जैसी एजेंसी की जरूरत नहीं है। उल्लेखनीय है कि काले धन को लेकर बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने हाल ही में डीसीआइ का गठन किया था।

कुमार ने कहा कि सरकार संदिग्ध लोगों की टेलीफोन बातचीत के टेप के आधार पर जांच एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर कार्रवाई कर सकती है।

काली अर्थव्यवस्था का हिस्सा 1971 में वांचो समिति के आकलन, सात प्रतिशत से बढ़कर हालिया ग्लोबल इंटेग्रिटी रिपोर्ट की मुताबिक 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। कुमार ने कहा, 60 के दशक में दर्जनों समितियों ने काले धन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन किया और हजारों सलाह दी। जिसमें सैकड़ों सलाहों का उपयोग भी किया गया। इसके बावजूद काली अर्थव्यवस्था का आकार काफी हद तक बढ़ा हो गया।


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रामलीला मैदान में घायल राजबाला की हालत गंभीर
Jun 07, 05:59 pm

नई दिल्ली। रामलीला मैदान पर शनिवार की आधी रात में बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर पुलिसिया कार्रवाई में घायल हुए 71 लोगों में से 51 वर्षीय राजबाला की हालत आज लगातार तीसरे दिन भी गंभीर बनी हुई है।

वह दिल्ली के गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल में आईसीयू में वेंटिलेटर पर हैं। राजबाला का उपचार कर रहे डॉक्टरों ने बताया कि वह सचेत हैं और सामान्य मौखिक संकेतों को समझ रहीं हैं।

हालाकि उनकी हालत अभी गंभीर है और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है।

गुड़गाव की रहने वाली राजबाला को रीढ़ की हड्डी में चोट के साथ जीबी पंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग के एक डॉक्टर ने कहा कि उनकी हालत अब भी गंभीर है। कल उनकी सर्विकल स्पाइनल पर चोटों के लिए सर्जरी की गई। उनके शरीर का गर्दन से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त है।

इसके अलावा एक और समर्थक की हालत गंभीर बनी हुई है जिसे सिर में चोट के बाद लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अस्पताल की चिकित्सा अधीक्षक डॉ रिचा दीवान ने कहा कि हमारे यहा केवल एक मरीज भर्ती है और बाकी सब को छुट्टी दे दी गई है। उन्हें भी स्वस्थ होने के बाद जल्द ही छुट्टी दे दी जाएगी।

पुलिस के 'मैदान मारने' की कहानी में कई पेंच....










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पुलिस के 'मैदान मारने' की कहानी में कई पेंच



नई दिल्ली, मंगलवार, 7 जून 2011( 14:03 IST )

रामलीला मैदान में भूखे-सोए लोगों पर कहर बरपाने वाली दिल्ली पुलिस की कहानी में कई पेंच है। इसमें सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि बाबा रामदेव की दी गई कड़ी जेडप्लस सुरक्षा इस पूरे ड्रामे के दौरान कहां गायब हो गई थी। क्या ऐसे में बाबा पर जानलेवा हमला नहीं हो सकता था। लाठीचार्ज नहीं करने का पुलिसिया दावा भी बेदम नजर आता है। खुद को बचाने में जुटी पुलिस ने सोमवार की रात शिविर के सीसीटीवी रिकार्ड पर भी जबरन कब्जा कर लिया।


दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिनशर लॉ एंड ऑर्डर की बात को सही माने तो बाबा रामदेव की जान को खतरा था। इसी के तहत शनिवार की सुबह ही उन्हें कड़ी सुरक्षा वाली जेडप्लस सुरक्षा देने का दावा दी गई थी। इसके तहत आठ नेशनल सिक्योरिटी गार्ड के कंमाडो का एक सुरक्षा घेरा बाबा को मुहैया कराया जाता। लेकिन यह सुरक्षा बाबा को मुहैया कराई नहीं गई। अगर पुलिस या सरकार की नीयत साफ होती है तो यह सुरक्षा बाबा को मिल गई होती। जिस तरह से इतनी भारी भीड़ में बाबा के साथ जबरदस्ती हुई, क्या ऐसे में कोई उन पर हमला नहीं कर सकता था।

पुलिस ने शिविर में आने वाले समर्थकों की सघन तलाशी के लिए एक्सरे मशीन लगाई थी। इसमें हर बैग स्कैन होकर शिविर में गया। लेकिन पुलिस का दावा है कि बाबा के समर्थकों ने पुलिस पर पत्थर बरसाए। अब सवाल यह है कि इतनी कड़ी सुरक्षा व एक्सरे स्कैनर के बाद भी पत्थर शिविर में कैसे पहुंच गए। क्या यह पुलिस की विफलता नहीं है।

पुलिस का दावा है कि कोई लाठीचार्ज नहीं किया गया। लेकिन नईदुनिया के पास ही ऐसे फोटो है, जो साफ दर्शाते है कि लाठीचार्ज हुआ है। लोगों का भी आरोप है कि इसी लाठीचार्ज में उनके हाथ-पैर टूटे है। पुलिस का कहना है कि मंच से गिरने से लोगों के हाथ पैर-टूटे।


पुलिस की नीयत इससे भी पता लग जाती है कि सोमवार की रात पुलिस ने बाबा की ओर से शिविर में लगाए सीसीटीवी के रिकार्ड पर भी जबरन कब्जा कर लिया। मालवीय नगर थाने की पुलिस टीम ने सावित्री नगर स्थित सीसीटीवी लगाने वाली कंपनी के दफ्तर पर धावा बोल दिया। भारत स्वाभिमान न्यास के दिल्ली प्रदेश के संगठन मंत्री अनुज सोम का आरोप था कि वह लोग पुलिस की रिकार्ड देने को तैयार थे, लेकिन पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी। पूरी रिकार्ड मशीन को ही पुलिस उठाकर ले गई। अब पुलिसिया अत्याचार का पता शायद ही लग पाए। न्यास के इस रिकार्ड को जबरन ले जाने के पीछे पुलिस का क्या उद्देश्य है। क्या पुलिस अपनी बर्बरता को छुपाना चाहती है।

पुलिस के इस पूरे ऑपरेशन के दौरान शिविर की बिजली भी काट दी गई। बिजली काटने के पीछे क्या उद्देश्य था। कहीं बिजली काटने के बाद ही तो लाठीचार्ज नहीं किया गया ताकि मीडिया इसकी सही कवरेज न कर पाए।

इसमें एक अहम सवाल यह भी है कि बकौल पुलिस बाबा को पांच हजार लोगों के लिए शिविर लगाने की अनुमति मिली थी। लेकिन शिविर लगाया गया था करीब एक लाख लोगों के लिए। इतना बड़ा तामझाम पुलिस को नजर नहीं आया। ऐसे में पुलिस का खुफिया विभाग कहां सोया हुआ था। कैसे उन्हें इस बात की भनक नहीं लगी कि इतना बड़ा आंदोलन होने वाला है
सौजन्य से - नईदुनिया

दिल्ली पुलिस की असलियत अब सामने आई...किसी को नहीं पता कहां हैं बालकृष्ण..कालाधन वापस लाने के लिए आइटी को मिले 30 लाख पत्र.





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दिल्ली पुलिस की असलियत अब सामने आई
Jun 07, 01:35 am

नई दिल्ली। हमेशा बाबा रामदेव के साथ नजर आने वाले आचार्य बालकृष्ण का पिछले दो दिनों से कोई पता नहीं है। बाबा रामदेव का कहना है कि रामलीला मैदान से गायब हुए अधिकांश लोग दिल्ली पुलिस के कब्जे में हैं।

आचार्य बालकृष्ण, रामदेव के सबसे निकटस्थ माने जाते हैं। शनिवार को पुलिसिया कार्रवाई से पहले वह दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव के करीब ही दिखाई दिए थे। आचार्य बालकृष्ण की गैर मौजूदगी के बारे में सोमवार को जब रामदेव से पूछा गया तो उन्होंने सीधा जवाब देने के बजाय कहा, 'रामलीला मैदान से गायब हुए अधिकांश लोग दिल्ली पुलिस के कब्जे में हैं।' गौरतलब है कि एक दिन पहले उंन्होंने बालकृष्ण से बातचीत होने और उनके किसी गोपनीय मिशन पर लगे होने की बात कही थी। इस बाबत जब दिल्ली के पुलिस आयुक्त बी.के. गुप्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि बालकृष्ण को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में नहीं लिया है।


दिखाई बाबा के समर्थकों की गिरफ्तारी


नई दिल्ली [जागरण संवाददाता। बाबा रामदेव के सत्याग्रह को कुचलने के लिए बर्बरतापूर्ण कार्रवाई करने वाली दिल्ली पुलिस की एक और असलियत सामने आई है। पुलिस ने रामलीला मैदान से शनिवार रात बाबा के दस समर्थकों को हिरासत में लिया था, लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं दिखाई गई थी। सोमवार को पुलिस ने सभी को गुपचुप तरीके से अदालत में पेश कर दिया।

घटना के बाद से ही बाबा रामदेव के समर्थकों के गायब होने की बात कही जा रही थी। उधर, पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी से साफ इनकार कर रहे थे, लेकिन सोमवार को पुलिस ने बाबा के दस समर्थकों को तीस हजारी कोर्ट में पेश किया। सभी पर दंगा भड़काने, सरकारी कर्मचारियों से मारपीट व सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धाराएं लगाई गई हैं। पुलिस द्वारा गिरफ्तार लोगों में रवि नौटियाल, रोने ओनाम [असम], अजीरथ [राजस्थान], राम नरेश [मध्य प्रदेश], सुरेंद्र, सर्वजीत, प्रेम, योगेंद्र, हरिओम [हरियाणा] व अमन [दिल्ली] शामिल हैं।

पुलिस की पिटाई से घायल हुए लोगों को बाबा रामदेव के समर्थक हरिद्वार लेकर चले गए हैं। कोमा की हालत में राजबाला नामक महिला अभी जीबी पंत अस्पताल के आइसीयू में भर्ती है। रामलीला मैदान में छूट गया सामान भी लोगों को नहीं मिल रहा है। सामान पाने के लिए लोग भटक रहे हैं। पांच लोगों ने कमला मार्केट थाने में सामान नहीं मिलने की शिकायत की है।
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कालाधन वापस लाने के लिए आइटी को मिले 30 लाख पत्र
Jun 07, 08:07 am
बताएं

नई दिल्ली। बाबा रामदेव के आंदोलन से जारी हंगामे के बीच आयकर विभाग में पत्रों की बाढ़ आ गई है। अब तीस लाख से अधिक हस्ताक्षर युक्त पत्र मिल चुके हैं। इन पत्रों में देश के बाहर छुपाकर रखे गए कालाधन को वापस लाने की मांग की गई है। आयकर विभाग इन पत्रों की उपयोगिता की जांच करने में लगा है।

बाबा रामदेव द्वारा पहले भेजे गए इन पत्रों के बड़े-बडे़ पैकेट अब राजस्व सचिव के कार्यालय से आयकर विभाग की खुफिया इकाई को भेजे गए हैं। हालांकि विभाग को या केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के नार्थ ब्लॉक कार्यालय को ऐसे पत्रों का मिलना अब भी बंद नहीं हुआ है।

आयकर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इन पत्रों का कोई उपयोग नहीं है क्योंकि इनमें कार्रवाई करने के लायक कोई सूचना नहीं है। कुछ पत्रों में काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव के आंदोलन को लेकर को लेकर उनका आभार जताया गया है। अधिकांश पत्रों पर भेजने वाले का नाम और पता दर्ज है। जबकि कुछ में कुछ लोगों ने अकूत संपत्ति कहां से अर्जित की इसकी जानकारी होने का दावा किया गया है। अधिकारी ने बताया कि जिन पत्रों के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है उनकी सूचनाओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
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बाबा के समर्थन में आठ को कार्य बहिष्कार करेंगे वकील
Jun 06, 11:53 pm


नई दिल्ली। दिल्ली की विभिन्न निचली अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों ने समाज में भ्रष्टाचार तथा रामलीला मैदान से हटाने के लिए बाबा रामदेव के खिलाफ पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई के खिलाफ आठ जून को कार्य बहिष्कार करने का सोमवार को निर्णय लिया।

दिल्ली के बार एसोसिएशनों की समन्वय समिति के प्रवक्ता राजीव खोसला ने कहा कि बार महसूस करते हैं कि सरकार की ऐसी बर्बर कार्रवाई दुनिया के किसी भी लोकतात्रिक देश में सुनने को नहीं मिली। ऐसा जान पड़ता है कि पुलिस सभ्य समाज और अपराधियों के बीच अंतर भूल गई थी।

पटियाला हाऊस कोर्ट, तीस हजारी कोर्ट, द्वारका कोर्ट तथा रोहिणी कोर्ट के बार एसोसिएशनों ने आठ मई को कार्य बहिष्कार करने का निर्णय लिया है।

दिल्ली बार एसोसिएशन के महासचिव संजीव नास्सियर ने कहा कि बल प्रयोग से शातिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हटाना बिल्कुल गलत है।