Thursday, August 11, 2011

राहुल गांधी -सुकन्या बलात्कार काण्ड...राहल के अपराधों की लिस्ट और बड़ी हो सकती है




कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को बलात्कारी बताना  को भारी पड़......
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कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को बलात्कारी बताना किशोर समरीते को भारी पड़ गया है. एक ओर जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उनके खिलाफ पचास लाख का जुर्माना किया है वहीं सरकार ने इस पूरे मामले में सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है. हालांकि समरीते का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद वे अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

1 मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राहुल गांधी के नाम एक नोटिस जारी करते हुए उनसे पूछा था कि वे इस संबंध में अदालत में याचिकाकर्ता के आरोपों का जवाब दें.राहुल गांधी को अदालत ने दो सप्ताह का वक्त दिया था. लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही अदालत में एक डबल बेंच बैठी और उसने न केवल उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें राहुल गांधी द्वारा कथित तौर पर बलात्कार पीड़ित सुकन्या सिंह तथा उसके परिजनों को बंधक बनाकर रख लेने का संदेह जताया गया था बल्कि याचिकाकर्ता किशोर समरीते पर पचास लाख का जुर्माना भी लगा दिया. जुर्माने की इस रकम में 25 लाख रूपये उस लड़की को दिये जाएंगे जिसका नाम आ रहा है, 20 लाख रूपये राहुल गांधी को दिये जाएंगे और पांच लाख रुपये की रकम पुलिस महानिदेशक को दिये जाएंगे जिन्होंने समय के भीतर पीड़ित परिजनों को हाजिर कर दिया.

याचिकाकर्ता किशोर समरीते का कहना हैं कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद वे सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान पुलिस महानिदेशक करमवीर सिंह ने आज बलराम सिंह, उनकी पत्नी सावित्री और पुत्री सुकन्या को अदालत में पेश किया। तीनों ने कहा कि न तो उनका अपहरण हुआ और न उन पर कोई जुल्म किया गया। अब किशोर समरीते सवाल उठा रहे हैं कि जिन लोगों को सुकन्या देवी, बलराम सिंह और सावित्री देवी बनाकर पुलिस ने अदालत के सामने पेश किया है वे वह हैं ही नहीं. अदालत के सामने झूठे लोगों को पेश किया गया है. समरीते बताते हैं कि जिसे सुकन्या देवी बताकर पुलिस ने अदालत के सामने पेश किया है उसका नाम मोना है, जबकि सावित्री देवी की जगह कीर्ति सिंह और बलराम सिंह की जगह डॉ बलराम सिंह को पेश किया गया है. किशोर कहते हैं कि उनके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं और उन्हीं सबूतों के आधार पर वे सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

3 दिसंबर 2006 में कथित तौर पर घटी इस घटना के संबंध में जो खबरें आयी हैं उससे कांग्रेस पार्टी में खासा रोष है. कांग्रेस ने पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी जिसे देखते हुए केन्द्र ने सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है. पार्टी ने 8 मार्च को एक विज्ञप्ति जारी करके कहा था कि राहुल गांधी की छवि खराब करने के लिए जानबूझकर कुछ लोग इस तरह की अफवाह फैला रहे हैं.



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Friday, March 13, 2009
राहुल गांधी की आपराधिक पृष्ठभूमी

 
राहुल गांधी -सुकन्या बलात्कार काण्ड के बारे में लगभग सबको पता चल चुका है .और राहल के अपराधों की लिस्ट और बड़ी हो सकती है। परन्तु उन में से दो ऐसे अपराध हैं जिनके प्रमाणिक तथ्य उपलब्ध है ,वे इस प्रकार हैं ।
१-सितम्बर २००१ में राहुल अपनी सीक्रेट वाइफ जुअनिता उर्फ़ वेरोनिका के साथ अमेरिका के बोस्टन एयर पोर्ट पर ऍफ़ बी आई द्वारा गिरफ्तार किया गया था .उसके पास से इटालियन पासपोर्ट ,और सूटकेस से अवैध रूप से २०००० अमेरिकन डालर बरामद हुए थे। इस गिरफ्तारी के बारे में लखनऊ के ६ वकीलों ने हाईकोर्ट के माध्यम से ऍफ़ बी आई से जानकारी देने हेतु एक याचिका भी दायर भी की थी।

राहुल को छुडाने के लिए सोनिया ने ब्रिजेश मिश्रा से अनुरोध किया था .जो उस समय प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के सलाहकार थे। ब्रिजेश मिश्रा की लड़की ज्योत्स्ना एक इटालियन व्यक्ती से ब्याही है ,जो सोनिया का परिचित था.उसने ज्योत्स्ना के माध्यम से ब्रिजेश मिश्रा पर दवाब डाला की वह बाजपेयी से ,राहुल को छुडाने के लिए बुश प्रशाशन से कहें .और इस तरह से बाजपेयी के प्रयासों से राहुल को छुडाया जा सका था।
२-इंडियन एक्सप्रेस दिनांक ०३जन ०५ के अनुसार अपनी कोलंबियन गर्ल फ्रेंड जुअनिता के साथ केरल के कुमार कौनम ताज होटल में तीन दिन-रात रहा था .यह जगह केरल के कोच्ची नाम की जगह के पास है .जब होटल के मालिक ने राहुल से उसके साथ वाली लड़की के बारे में जानकारी चाही तो ,राहुल ने गोलमाल सा जवाब दिया। इस पर उसी होटल में रुके हुए एक रिटायर्ड प्रोफेसर जोन एम् इत्ती ने ३१दिसम्बर ०४ को लेरल की अलिपुज्हा जिला अदालत में राहुल के ख़िलाफ़ इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट के अधीन मुकद्दमा दायर कर दिया था .यह केस अभी अदालत में लंबित है ।
इस से आप समझ सकते हैं की राहुल किस प्रकार का व्यक्ति है .उसे सच्चाई छुपाने की क्या जरूरत थी। सच तो यह है की पूरा सोनिया परिवार ही झूठा है राहुल के बाप राजीव ने दावा किया था की उसने कैम्ब्रिज से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री की थी ,जो बाद में सरासर झूठ निकला .उसकी माँ ने कहा की उसने कैम्ब्रिज सेअन्ग्रेज़ी की डिग्री ली है,यह भी झूठ है .उसने सिर्फ़ एक कोचिंग स्कूल से अन्ग्रेज़ी सीखने का प्रमाण पत्र लिया है.अब राहुल भी ख़ुद को एम् फिल बताता फिरता है ,लेकिन जब उसने बी ऐ पास ही नहीं किया तो ,तो एम् फिल होना कैसे सम्भव हो सकता है।
यह सब मकार और चार सौ बीस हैं .ऐसे लोगों से देश को बचाना हमारा परम कर्तव्य है।
जय भारत
बी एन शर्मा -भोपाल दिनांक १३ मार्च 2009

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वंदेमातरम का अमर बलिदानी बालक खुदीराम


वंदेमातरम का अमर बलिदानी बालक खुदीराम

जंग ए आजादी के इतिहास में एक ऐसे क्रांतिकारी का भी नाम है जिसने मात्र 19 साल की उम्र में हंसते- हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में 3 दिसंबर 1889 को जन्मे खुदीराम बोस ने आजादी को अपने जीवन का सबसे परम ध्येय बना लिया था और इसीलिए वह नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता के हवन यज्ञ में कूद पड़े। वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल विभाजन के विरोध में 1905 में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।


इतिहासकार शिरोल ने खुदीराम के बारे में लिखा है कि बंगाल का यह वीर लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय था और वे उसे अपना आदर्श मानते थे। विप्लवी प्रवृत्ति के इस बालक को जब 28 फरवरी 1906 को गिरफ्तार किया गया तो वह कैद से भाग निकला। लगभग दो महीने बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया। प्रोफेसर एनकेपी सिन्हा के अनुसार खुदीराम का क्रांतिकारी चेहरा बचपन में ही नजर आने लगा था। एक बार जब क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन से जुड़ी गुप्त समिति के सदस्य और महान क्रांतिकारी नेता हेमचंद्र कानूनगो साइकिल से जा रहे थे तो खुदीराम ने उनका रास्ता रोककर अंग्रेजों को मारने के लिए उनसे बंदूक मांगी।

सिन्हा के मुताबिक खुदीराम की इस मांग से हेमचंद्र यह सोचकर हैरान रह गए कि इस बालक को कैसे पता चला कि उनके पास बंदूक मिल सकती है। आगे चलकर खुदीराम ने हेमचंद्र के नेतृत्व में कई क्रांतिकारी गतिविधियों को खुदीराम ने छह दिसंबर 1907 को नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, लेकिन वह बच गया। उन्होंने 1908 में दो अंग्रेज अधिकारियों वाटसन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन ये दोनों भी बच निकले।

बंगाल का यह वीर क्रांतिकारी मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा था, जिसने कई क्रांतिकारियों को कड़ी सजा दी थी। उन्होंने अपने साथी प्रफुल्ल चंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड से बदला लेने की योजना बनाई। दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया, लेकिन उस समय इस गाड़ी में किंग्सफोर्ड की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं सवार थीं जो मारी गर्इं। दोनों क्रांतिकारियों को इसका काफी दुख हुआ। अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। ाुदीराम पकड़े गए ्र जबकि प्रफुल्ल चंद चाकी ने खुद को गोली से उड़ा लिया।

उन्नीस साल की उम्र में 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम को फांसी दे दी गई। इस बलिदान के बाद वह इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे ऐसी धोती बुनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था। शिरोल ने लिखा है कि बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

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दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का विरोध क्यों करता है

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दिग्विजय सिंह अक्सर आर.एस.एस. ,बी.जे.पी और अन्य हिंदूवादी संगठनों को गलियां क्यों देता है ,बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का विरोध क्यों करता है ?राहुल गंदी की तारीफें करके सोनिया की चापलूसी क्यों करता है ?यह ऐसे सवाल हैं ,जो लोगों के मन में उठते रहते हैं .परेक बात सब लोग जानते हैं कि सोनिया .मनमोहन ,दिग्विजय ,अहमद पटेल ,विलास राव ,शीलादीक्षित ,शहीद बलवा ,और हसन अली सब एक ही थैले कि चट्ते बट्टे है,इन सबका विदेशों में अरबों रूपया जमा है .
लोग यह भी जानते हैं कि दिग्विजय एक चालाक ,और मक्कार व्यक्ति है .और राजनीति का घाघ खिलाडी है .उसे एक तीर से कई शिकार करने का अभ्यास है .अंगरेजी क़ी कहावत है ,कि यदि किसी औरत को पटाना हो ,तो उसके कुत्ते तक की तारीफ़ करो .इसी लिए दिग्विजय हर तरह से सोनिया को खुश करता रहता है .क्योंकि असल सत्ता उसी के पास है .वर्ना एक विदेशी विधवा सिवाय भ्रष्टाचार और महगाई के आलावा क्या पैदा कर सकती है .आप सब ने देखा है कि जैसे जैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन तेज होता जा रहा है यह सब एकजुट होने लगे हैं ,और सोनिया कि शरण में आ रहे है .जैसे कुत्तों के पिल्ले अपनी माँ के पास सिमट जाते हैं .
मुझे लगता है कि दिग्विजय की चमचागिरी के पीछे यही कारण होना चाहिए ,दिग्विजय ने अपने शासनकाल में मध्य प्रदेश को चौपट कर दिया था .इसके समय भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था .वैसे तो इसने कई घोटाले किये थे .लेकिन ताजा कर्जा घोटाला (loan scam )सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया है .दिग्विजय सन 1994 से 2000 तक मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री रहा .इसने "State Industrial Development Corporation "के माध्यम से कुछ औद्योगिक समूहों को सात सौ उन्नीस (719 )करोड़ रूपया बिना किसी जमानत ,या शर्त के कर्जा दे दिया था .और कर्जा लेने वालों से कोई जमानत (security )भी नहीं ली .यह सब दिग्विजय के मित्र थे .जब सन 2005 कर्जे की न तो किश्त जमा हुई ,और न ब्याज ही जमा हुआ तो बी. जे. पी की सरकार का माथा ठनका .उस समय कारपोरेशन का मेनेजिंग डायरेक्टर S .R .Mohanty था .जो एक I .A .S अधिकारी था .सरकार ने इस मामले की (EOW ) Economic Offences Wing से जाँच की तो पता चला कि यह कर्जा दिग्विजय ने उद्योगपतिओं को ICD योजना अर्थात "Inter Corporate Deposit "के तहत दिया था .इस घोटाले में उस समय के कुछ कांग्रेसी नेता ,और मोहंती के आलावा 35 अफसरों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर दर्ज हो गयी .( इंडियन एक्सप्रेस 5 फरवरी 2011 ) बाद में मोहंती जबलपुर हाई कोर्ट गया .जहाँ उसको किसी तकनीकी कारण से थोड़ी सी राहत मिल गयी .लेकिन मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया (एन ड़ी टी.वी 6 फरवरी 2011 )मामले कि गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके दो सदस्यों की एक बेंच बना दी ,जिसमे एक Chief Judicial Magistrate और एक Additional Session Judge को रखा गया है .क्योंकि अब वह कर्जा जो 719 करोड़ का था ब्याज मिलाकर 2200 करोड़ का हो गया है .
बी.जे. पी .मध्य प्रदेश के प्रवक्ता श्री नरोत्तम मिश्र ने अदालत से इस केस को प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटने की अपील की है .दूसरी तरफ मुख्य आरोपी मोहंती खुले आम दिग्विजय को जिम्मेदार बता रहा है .उस समय वह "Health Secratary "था .दिग्विजय ने जिन 29 उद्योग पतियोंको कर्जा दिया था उनके कुछ नाम इस प्रकार है -
ई एन बी -प्रफुल महेश्वरी -417 .55
अल्पाइन -सतीश भंडारी -275 .56
रुईया -टी बी रूइया -271 .91
ईशर-गुरुचरण -155 .43
सोम समूह -140 .57
इसकी काफी बड़ी सूचीहै जो ,पत्रिका ,भोपाल 24 दिसंबर 2010 में प्रकाशित हुई थी इसका शीर्षक था "कर्ज लेकर भूल गए :जनता का धन उद्योगपतियों की जेब में "
अब जैसे जैसे सुनवाई के दिन पास आते जा रहे हैं ,दिविजय की चड्डी ढीली होती जा रही है .वह बौखला कर सरे बी.जे.पी ओर संघ को गलियां देने लगा है .उसे भी यह भी डर है की कहीं बाबा रामदेव या अन्ना हजारे इस मूद्दे को देंगे तो सोनिया के साथ सभी अन्दर हो जायेंगे .क्योंकि चोर चोर मोसेरे भाई होते है .यद्यपि मिडिया ने इस घोटाले को अधिक महत्त्व नहीं दिया .फिर भी मैं अपने सभी ब्लोगर बंधुओं से अनुरोध करता हूँ कि,इस घोटाले की बात सबको पहुंचा दें .ताकि दिग्विजय की असलियत लोगों को पता चले .और कोई सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी कर सके .खबर की लिंक भी दी जा रही है -.
http://www.ndtv.com/article/india/loan%20-scam-another%20-ias-under-scanner%20-83683

Thursday, July 28, 2011

मंगोल

मंगोल
मंगोल छोटी आँख, पीली चमड़ी वाली एक जाति, जिसके दाढ़ी-मूँछ बहुत कम होती है। मंगोल लोग प्राय: खानाबदोश थे। ये खानाबदोश मर्द और औरतें बड़े मज़बूत कद-काठी के लोग थे। शहरी जन-जीवन इन्हें रास नहीं आता था। चंगेज़ ख़ाँ जैसा वीर, प्रतापी और महान नेता मंगोल इतिहास में शायद ही हुआ है। बाबर ने अपने वंश को भारत में मुग़ल प्रसिद्ध किया था। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मुग़ल, मंगोलों के ही वंशज थे।

मज़बूत क़द-काठी

मंगोलों को कष्ट झेलने की आदत थी और ये लोग उत्तरी एशिया के लम्बे चौड़े मैदानों में तम्बुओं में रहते थे। लेकिन इनका शारीरिक बल और कष्ट झेलने का मुहावरा इनके ज़्यादा काम न आते, अगर इन्होंने एक सरदार न पैदा किया होता, जो बड़ा अनोखा व्यक्ति था। शहरों और शहरों के रंग-ढंग से भी उन्हें नफ़रत थी। बहुत से लोग समझते हैं कि चूंकि वे खानाबदोश थे, इसलिए जंगली रहे होंगे। लेकिन यह ख्याल ग़लत है। शहर की बहुत सी कलाओं का उन्हें अलबत्ता ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने जिन्दगी का अपना एक अलग तरीक़ा ढाल लिया था और उनका संगठन बहुत ही गुंथा हुआ था।

इतिहास

मंगोलों के कई समूह विविध समयों में भारत में आये और उनमें से कुछ यहीं पर बस गए। चंगेज़ ख़ाँ, जिसके भारत पर आक्रमण करने का ख़तरा 1211 ई. में उत्पन्न हो गया था, वह एक मंगोल था। इसी प्रकार से तैमूर भी, जिसने भारत पर 1398 ई. में हमला किया, वह भी एक मंगोल था। चंगेज ख़ाँ और उसके अनुयायी मुसलमान नहीं थे, किन्तु तैमूर और उसके अनुयायी मुसलमान हो गए थे। 'मंगोल लोग ही मुसलमान बनने के बाद 'मुग़ल' कहलाने लगे।' 1211 ई. में चंगेज ख़ाँ तो सिन्धु नदी से वापस लौट गया, किन्तु उसके बाद मंगोलों ने और कई आक्रमण भारत पर किए। दिल्ली के बलबन और अलाउद्दीन ख़िलजी जैसे शक्तिशाली सुल्तानों को भी मंगोलों का आक्रमण रोकने में एड़ी-चोट का पसीना एक कर देना पड़ा। 1398 ई. में तैमूर के हमले ने दिल्ली सल्तनत की नींवें हिला दीं और मुग़ल वंश की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया, जिसने अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन की स्थापना होने तक इस देश में राज्य किया।

विजय अभियान

लड़ाई के मैदान में अगर मंगोलों ने महान विजय प्राप्त कीं तो अधिक संख्या होने के कारण नहीं, बल्कि अनुशासन और संगठन के कारण, और इसका सबसे बड़ा कारण तो यह था कि, उन्हें चंगेज़ ख़ाँ जैसा जगमगाता सेनानी मिला था। इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास में चंगेज़ जैसा महान और प्रतिभा वाला सैनिक नेता दूसरा कोई नहीं हुआ है। सिकन्दर और सीजर इसके सामने नाचीज़ नज़र आते हैं। चंगेज़ न सिर्फ़ खुद बहुत बड़ा सिपहसलार था, बल्कि उसने अपने बहुत से फ़ौजी अफ़सरों को तालीम देकर होशियार नायक बना दिया था। अपने वतन से हज़ारों मील दूर होते हुए भी दुश्मनों और विरोधी जनता से घिरे रहते हुए भी वे अपने से ज़्यादा तादाद की फ़ौजों से लड़कर उन पर विजय प्राप्त करते थे।

Wednesday, July 27, 2011

कैटरीना का विवादित बयान, 'राहुल गांधी हैं आधे भारतीय'



कैटरीना का विवादित बयान, 'राहुल गांधी हैं आधे भारतीय'



आमतौर पर फिल्म अभिनेत्री कैटरीना कैफ विवादों से काफी दूर रहना पसंद करती हैं और कुछ भी ऐसा नहीं बोलती जिससे कोई विवाद पैदा हो|

मगर इस बार कैटरीना ने कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी पर विवादस्पद टिपण्णी कर नया विवाद उत्पन्न कर दिया है|कैटरीना ने राहुल गांधी के बारे में कहा है कि वह आधे भारतीय हैं|

कैटरीना ने हाल ही में यह बातें एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में कहीं और उन्होंने इसके माध्यम से उन लोगों को करारा जवाब दिया जो हमेशा उनके पासपोर्ट,सरनेम और उनकी जाति पर सवाल उठाते हैं|

कैट ने कहा कि मैं जो हूं उसमें बहुत खुश हूं और मुझे समझ नहीं आता लोगों को इससे समस्या क्या है| मैंने कभी यह बात नहीं छुपाई कि मेरी माँ ब्रिटिश मूल की हैं|क्या मुझे इस बात पर शर्म आनी चाहिए कि मैं आधी एशियन हूं और आधी यूरोपियन?मैं ऐसा बिलकुल नहीं मानती|राहुल गांधी भी आधे भारतीय और आधे इटेलियन हैं|उसी तरह वह भी आधी भारतीय हैं तो इसमें बुरा क्या है|गौर करने वाली बात ये है कि कैटरीना की माँ ब्रिटेन की हैं जबकि उनके पिता भारतीय|कैट का जन्म हांग कांग में हुआ और उनकी परवरिश ब्रिटेन में अपनी माँ के पास हुई|





http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-katrina-kaif-said-rahul-gandhi-is-half-indian-2275753.html

देश को क्यों धोखा दे रहे हैं यह गांधी...............







देश को क्यों धोखा दे रहे हैं यह गांधी................


पहली प्रति में देखिये निर्वाचन आयोग को लोकसभा 2009 में दिये गये शपथ पत्र पर एमफिल कहां से किस विषय में और कब करने का दावा किया है, और दूसरे चित्र में देखिये उसी संस्थान ने इस झूठ से कैसे पर्दा उठाया है। यहां एक चीज और है राहुल गांधी का नाम (रॉल विंसी) बदल गया था...... क्यों यह तो उनका परिवार ही बतायेगा.....तीसरे चित्र में इस जानकारी की पुष्टि करती एक्सप्रेस न्यूज सर्विस की खबर की कटिंग भी लगी है.... संभवतः जिन मित्र ने यह उपलब्ध कराई है ... खबर छापने वाले पत्रकार का नाम हटा दिया है ... क्यों नहीं कह सकते ......इसके नीचे देख सकते हैं .... दिल्ली के महरौली और साकेत जैसी जगह पर फार्म हाउस और मॉल्स कितने सस्ते हैं............ जिनकी आदर्णीय राहुल जी ने कीमत सिर्फ लाखों में दिखाई है.................. कीमत सुन मेरे मन में लालच आ गया .... अगर वो बताई गयी कीमत से दुगने में भी बेचने को तैयार हों तो ....... कहीं न कहीं से लोन लेकर मैं खरीदने को तैयार हूं.........

Tuesday, July 26, 2011

कारगिल विजय दिवस: जरा याद करो कुर्बानी


कारगिल विजय दिवस: जरा याद करो कुर्बानी
‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’।
(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)
गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था।

26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।



कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि : कारगिल युद्ध जो कारगिल संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से प्रारंभ हुआ था।

इस युद्ध का कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना।

पूरे दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध (विदेशी मीडिया ने इस युद्ध को सीमा संघर्ष प्रचारित किया था) में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।

हिमालय से ऊँचा था साहस उनका : इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है।

इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।

भारत के वीर सपूत :

‘ये दिल माँगे मोर’ - हिमाचलप्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी।

यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही।
इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया।

राजपूताना राइफल्स के मेजर पद्मपाणि आचार्य भी कारगिल में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके भाई भी द्रास सेक्टर में इस युद्ध में शामिल थे। उन्हें भी इस वीरता के लिए ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।



1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए।

गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

भारतीय वायुसेना भी इस युद्ध में जौहर दिखाने में पीछे नहीं रही, टोलोलिंग की दुर्गम पहाडियों में छिपे घुसपैठियों पर हमला करते समय वायुसेना के कई बहादुर अधिकारी व अन्य रैंक भी इस लड़ाई में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में से थे कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी पैट्रोलिंग पार्टी के जवान। घोर यातनाओं के बाद भी कैप्टन कालिया ने कोई भी जानकारी दुश्मनों को नहीं दी।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान भी दुश्मन गोलीबारी का शिकार हुआ। अजय का लड़ाकू विमान दुश्मन की गोलीबारी में नष्ट हो गया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए।

वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया।

युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था। बाद में नवाज शरीफ और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पाक सेना की भूमिका को स्वीकार किया था। यह युद्ध हाल के ऊँचाई पर लड़े जाने वाले विश्व के प्रमुख युद्धों में से एक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ही देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं।

पर कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।

मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी...

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।



आज की पीढ़ी के सामने दो मिसालें हैं, देश का माथा ऊंचा करने वाले जाबांज सपूत और देश को शर्मसार करने वाले घोटालेबाज, आप कौन सी मिसाल अपनाना चाहेंगे?