Saturday, September 10, 2011

हूजी की धमकी अफजल गुरु की फांसी रोको वरना सुप्रीम कोर्ट उड़ा देंगे.......


हूजी की धमकी अफजल गुरु की फांसी रोको वरना सुप्रीम कोर्ट उड़ा देंगे.......

एक और आतंकी संगठन ने भारत में आतंक फैलाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। दिल्ली में हुए बम धमाके की जिम्मेदारी हरकत-उल-जिहाद हूजी ने ली है। हूजी द्वारा किए गए इस बम धमाके में अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है और लगभग 70 लोग घायल हुए हैं। हूजी ने भारत को धमकाते हुए कहा है कि अगर संसद हमले में फांसी की सजा पाने वाले अफजल गुरू की फांसी का फैसला बदला नहीं गया तो उनका अगला निशाना सुप्रीम कोर्ट होगा। हूजी ने यह धमकी -मेल के जरिए दी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनआईए इस -मेल की जांच कर रहा है। यह मेल (harkatuljihadi2011@gmail.com) नाम की मेल आईडी से आया है। मेल में लिखा गया है कि दिल्ली में आज हाईकोर्ट में हुए बम धमाकों की हम जिम्मेदारी लेते हैं। हमारी मांग यह है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा को बदला जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम भारत में दूसरे कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी ब्लास् करेंगे।



हरकत-उल-जिहाद नाम का यह आतंकी संगठन बांग्लादेश भारत और पाकिस्तान में सक्रिय है बांग्लादेश ने इस आतंकी संगठन को 2005 में प्रतिबंधित कर दिया था। इस आतंकी संगठन का मुखिया इलयास कश्मीरी है। जिसके 4 जून 2011 को ड्रोन हमले में मारे जाने की खबर थी लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। इलयास कश्मीरी फरवरी 2010 में पुणे के जर्मनी बेकरी में हुए बम धमाके में मुख् आरोपी है। इस आतंकी संगठन को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की भी शह प्राप् है।




दिल्ली हाईकोर्ट में एक बार फिर हुए बम धमाके ने सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के कामकाज पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। दिल्ली से सटे नोएडा के एक लड़के ने दावा किया है कि उसने दिल्ली पुलिस को बम धमाके की धमकी की जानकारी पखवाड़े भर पहले ही दे दी थी।
 
लड़के के मुताबिक 17 अगस् को उसके मोबाइल पर 923453367472 नंबर से फोन आया था। कॉल करने वाले शख् ने दिल्ली में होने का दावा किया था। कॉल करने वाले ने दिल्ली में धमाका करने की धमकी दी थी। इस लड़के ने इंटरनेट के जरिये पता लगाया कि यह नंबर पाकिस्तान का है और यह इस्लामाबाद में किसी शख् द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है। इसकी जानकारी पुलिस को दी गई थी लेकिन पुलिस ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की।
 
उधर, गृह मंत्री पी चिदंबरम ने आज संसद में दिए गए अपने बयान में दावा किया कि खुफिया एजेंसियों ने बीते 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस को आतंकी हमले के प्रति आगाह किया था। लेकिन दिल्ली पुलिस के सूत्रों का कहना है कि यह अलर्ट स्वतंत्रता दिवस के मद्देनजर था। इसमें कोई खास और सटीक जानकारी नहीं दी गई थी। यह सामानय चेतावनी थी, जो 11 शहरों को लेकर थी।
 
विपक्षी भाजपा ने सीधे तौर पर दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए धमाके को खुफिया एजेंसियों की नाकामी बताया है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा, ‘खुफिया रिपोर्ट नहीं होना भी खुफिया एजेंसियों की नाकामी है।
देश की राजधानी दिल्ली में हाईकोर्ट के बाहर बुधवार सुबह सवा दस बजे हुए धमाके में 13 लोग मारे गए हैं जबकि 76 घायल हुए हैं। घायलों में कई की हालत गंभीर है। विस्फोट इतना जबरदस् था कि घटनास्थल पर 3-4 फुट गहरा गड्ढा हो गया है। अदालत के गेट नंबर पांच के पास हुए इस धमाके की जिम्मेदारी आतंकी संगठन हरकत उल जिहाद इस्लामी (हूजी ने ली है। हूजी की ओर से मीडिया संस्थानों को भेजे मेल में कहा गया है हम दिल्ली हाईकोर्ट के पास हुए बम धमाके की जिम्मेदारी लेते हैं। हमारी मांग है कि मोहम्मद अफजल गुरु की फांसी की सजा तत्काल वापस ली जाए। नहीं तो हम बड़े उच् न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट को भी निशाना बनाएंगे।हालांकि इस मेल की प्रामाणिकता अभी जांची जा रही है।

हूजी की धमकी के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि आतंक से लड़ाई लंबा युद्ध है। हम जीत जाएंगे। ढाका से दिल्ली पहुंचने के बाद मनमोहन सीधे राम मनोहर लोहिया अस्पताल गए और घायलों का हालचाल लिया।

उधर धमाकों की जांच कर रही एजेंट के हाथ अभी खाली हैं। दिल्ली में आज जिस सूटकेस में विस्फोटक रख कर हाई कोर्ट के बाहर धमाका कराया गया, उसे वकील बन कर आए किसी शख् ने रखा था। खुफिया एजेंसी के एक सूत्र के मुताबिक, 'जिस तरह का ब्रीफकेस वकील रखते हैं, वैसे ही ब्रीफकेस में विस्फोटक रखा गया था। शायद इसलिए कि इस ब्रीफकेस को लावारिस देख कर भी किसी को शक नहीं हो।' दिल्ली पुलिस ने चश्मदीदों के बयान के आधार पर दो संदिग्धों के स्केच तैयार किए हैं (तस्वीर में इनमें से एक 50 साल का और दूसरा 26 साल का बताया गया है।

गृह मंत्रालय में सचिव (आंतरिक सुरक्षा यू के बंसल ने बताया कि धमाके में नाइट्रेट का इस्तेमाल हुआ है। इसमें पीईटीएन का भी इस्तेमाल होने की भी आशंका है। उन्होंने कहा कि विस्फोट में 2 किलो विस्फोटक के इस्तेमाल का अनुमान है। गृह सचिव के मुताबिक धमाके में आईईडी और टाइमर का इस्तेमाल किया गया है। अमोनियम नाइट्रेट का भी इस्तेमाल किए जाने की खबर है।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के प्रमुख एस सी सिन्हा के मुताबिक एनआईए के 20 सदस्यों की विशेष टीम को ब्लास् की जांच सौंपी गई है। एनआईए चीफ ने कहा कि यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस धमाके में हूजी का हाथ है। हालांकि हूजी की ओर से भेजे गए मेल पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

महाराष्ट्र एटीएस की टीम भी जांच में सहयोग करने के लिए दिल्ली पहुंची है। एनएसजी के जवान भी घटनास्थल पर जांच के लिए पहुंचे। एनएसजी और फॉरेंसिक की टीम ने हालांकि कुछ सैंपल ले लिए हैं लेकिन इसके बाद बारिश की वजह से कुछ सबूत धुल जाने की आशंका है। डॉग स्क्वॉयड को भी अभी तक कुछ हाथ नहीं लगा है।

हाईकोर्ट में 25 मई को भी एक छोटा धमाका हुआ था। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि खुफिया एजेंसियों ने 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस को अलर्ट दे दिया था। इसके बावजूद आतंकी वारदात को अंजाम देने में कामयाब रहे। सरकार ने आज धमाके के बाद दिल्ली सहित पूरे देश में अलर्ट जारी कर दिया है। संसद भवन की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। संसद भवन घटनास्थल से ढाई किलोमीटर की दूरी पर है। हाईकोर्ट के आसपास की इमारतों पर सेना के जवान तैनात कर दिए गए हैं।

धमाके में घायल लोगों को समीप के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कम से कम 55 घायल अभी तक राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराए गए हैं। कई घायलों को सफदरजंग अस्पताल, एलएनजेपी और एम् में भी भर्ती कराया गया है। आरएमएल में भर्ती लोगों में आठ की हालत गंभीर है। सफदरजंग अस्पताल का हेल्पलाइन नंबर 011-26707444, आरएमएल अस्पताल का हेल्पलाइन नंबर 011-23744721/ 23348200 / 23404446 / 23743769 / 23404478, एम् का हेल्पलाइन नंबर 011-26588700 है। 
हमारी सरकार, हमारी पुलिस और हमारी सुरक्षा एजेंसियां कितनी बेपरवाह और लापरवाह हैं इसका उदाहरण यदाकदा सामने आता रहता है। आतंकियों ने दिल्ली को एक बार फिर दहला दिया। मौके पर तैनात पुलिस और सुरक्षा एजेंसी वाले भले ही धमाका करने वालों को पहचान पाए हों लेकिन चश्मदीद गवाहों की मानें तो ये लोग सफेद लिवास में आए थे। विस्फोट करने वाले मौके से रफादफा हो गए और दिल्ली के इस वीआईपी इलाके पर पुलिस लाचार खड़ी थी। विस्फोट के बाद सब एकदम हरकत में गए। तुरंत हाई अलर्ट जारी कर दिया गया।

सुरक्षा एजेंसियों ने तो इस विस्फोट के बाद काबिले तारीफ काम किया। विस्फोट होने के 30 मिनट के अंदर ही देश की सबसे बड़ी सुरक्षा एजेंसी एनआईए ने इस धमाके के पीछे लश्कर--तैयबा और इंडियन मुजहिद्दीन का हाथ होने की आशंका जता दी। सवाल यह है कि जब खुफिया एजेंसी 30 मिनट में धमाकों में शामिल होने वालों का नाम उजागर कर सकती है तो हमले से पहले कुछ क्यों नहीं पता लगा पाती? 13 जुलाई को मुंबई में हुए बम धमाकों को 2 महीने पूरे हो गए हैं खुफिया एजेंसियां उसके बारे में कोई सुराग क्यों नहीं लगा पाई।

दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर 3 महीने पहले 25 मई भी धमाका हुआ था। उसके बाद भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का लापरवाह रवैया जारी रहा। सरकार ने भी इस पर अपनी बयानबाजी करते हुए कहा दिया कि हमले के आरोपियों को पकड़कर उन्हें सजा दी जाएगी। ये बातें वही सरकार कर रही है जो पिछले महीनों में हुए बम धमाकों के बारे में कुछ भी सुराग नहीं लगा पाई है। जांच की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को सौंप दी गई है। जिसने अपने गठन के बाद अभी तक किसी भी बड़े हमले के बारे में कोई खुलासा नहीं किया है। लोग अक्सर कहते हैं कि अब दिल्ली दूर नहीं, शायद वहां लगातार हो रहे बम धमाकों के बाद इसे कुछ यूं कहा जाएगा कि अब दिल्ली सेफ नहीं। या यू कहें कि पूरा देश ही सेफ नहीं है।



आतंक की मजबूती है कमजोर कानून
दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर हुए बम विस्फोट ने एक बार फिर आतंकवाद से लड़ने में कानून की कमजोरी और दोषियों को पकड़कर सजा देने के तंत्र की विफलता को जगजाहिर कर दिया है। लचीला रुख और कमजोर कानून आतंकियों को दुस्साहसी बना रहे हैं। ऐसे में कानूनविद फिर सख्त कानून की पैरवी कर रहे हैं।
आतंक के खिलाफ टाडा और पोटा ताकतवर मगर विवादित कानून थे। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तो के साथ उन्हें हरी झंडी भी दे दी थी लेकिन दोनों ही समाप्त हो गए। अब गैरकानूनी गतिविधि रोक अधिनियम लागू है, मगर प्रभावी नहीं दिखता। देश के जाने माने वकील और पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के साथ पोटा को फिर लागू करने की बात कहते हैं। पोटा कानून टाडा को समाप्त कर लाया गया था। कड़े प्रावधानों और दुरुपयोग के कारण ये विवादित हुआ और अंत में निरस्त कर दिया गया।
टाडा बीती सदी के आठवें दशक में बढ़ते आतंकवाद को काबू करने के लिए बना था। उसका सबसे विवादित प्रावधान था वरिष्ठ अधिकारी के सामने की गई अपराध स्वीकृति को न्यायालय में मान्यता दिया जाना। कानून वापस लिए जाने का यह एक बड़ा कारण था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी इसकी तरफदारी करते हैं। तुलसी कहते हैं कि ऐसे प्रावधान होने चाहिए क्योंकि आतंकवाद के मामले में आम आदमी अदालत में गवाही नहीं देता। टाडा और पोटा के बाद महाराष्ट्र में संगठित अपराध से निबटने के लिए मकोका आया। लेकिन घटनाएं नहीं थमीं और मुंबई में आतंकी हमला हुआ। कानून को कड़ा करने की बहस ने इतनी जोर पकड़ी की सरकार आनन फानन में गैरकानूनी गतिविधि कानून में संशोधन ले आई। नए कानून में टाडा और पोटा के प्रावधानों को थोड़ा लचीला कर शामिल किया गया है।
वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी कानूनों की कमी के बजाय उन्हें लागू करने के तंत्र में कमजोरी देखते हैं। वे कहते हैं कि आतंकवादियों में कानून का खौफ नहीं है क्योंकि अगर पकड़ लिए गए तो वर्षो मुकदमा चलेगा। वैसे भी हमारे देश में अपराधियों को दोषी ठहराने की दर दस फीसदी से ज्यादा नहीं है।
भारतीय दंड संहिता और अपराध प्रक्रिया संहिता जब बनी तब आतंकवाद जैसे अपराध की कल्पना नहीं की गई थी इसलिए मूल कानूनों में आतंकवाद से निपटने की क्षमता नहीं है। सबसे पहले संगठित अपराधों से निपटने के लिए 1967 में गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम लाया गया था लेकिन