Saturday, August 13, 2011

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं ?


Tuesday 7 August 2007
सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं ? (भाग-१)

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/08/blog-post_07.html

जब इंटरनेट और ब्लॉग की दुनिया में आया तो सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ पढने को मिला । पहले तो मैंने भी इस पर विश्वास नहीं किया और इसे मात्र बकवास सोच कर खारिज कर दिया, लेकिन एक-दो नहीं कई साईटों पर कई लेखकों ने सोनिया के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है जो कि अभी तक प्रिंट मीडिया में नहीं आया है (और भारत में इंटरनेट कितने और किस प्रकार के लोग उपयोग करते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है) । यह तमाम सामग्री हिन्दी में और विशेषकर "यूनिकोड" में भी पाठकों को सुलभ होनी चाहिये, यही सोचकर मैंने "नेहरू-गाँधी राजवंश" नामक पोस्ट लिखी थी जिस पर मुझे मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली, कुछ ने इसकी तारीफ़ की, कुछ तटस्थ बने रहे और कुछ ने व्यक्तिगत मेल भेजकर गालियाँ भी दीं (मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाः) । यह तो स्वाभाविक ही था, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि कुछ विद्वानों ने मेरे लिखने को ही चुनौती दे डाली और अंग्रेजी से हिन्दी या मराठी से हिन्दी के अनुवाद को एक गैर-लेखकीय कर्म और "नॉन-क्रियेटिव" करार दिया । बहरहाल, कम से कम मैं तो अनुवाद को रचनात्मक कार्य मानता हूँ, और देश की एक प्रमुख हस्ती के बारे में लिखे हुए का हिन्दी पाठकों के लिये अनुवाद पेश करना एक कर्तव्य मानता हूँ (कम से कम मैं इतना तो ईमानदार हूँ ही, कि जहाँ से अनुवाद करूँ उसका उल्लेख, नाम उपलब्ध हो तो नाम और लिंक उपलब्ध हो तो लिंक देता हूँ) ।
पेश है "आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं" की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" में - अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ।
"अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी "रॉ", जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन "रॉ" ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि "रॉ" के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था ।
सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । "रॉ" की नियमित "ब्रीफ़िंग" में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे ("ब्रीफ़िंग" कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी ।
जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह "कैश" चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था ।
राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक... उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि "तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है" । बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।
संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि "मैं भारत की बहू हूँ" और "मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी" आदि वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का....)
(यदि आपको यह अनुवाद पसन्द आया हो तो कृपया अपने मित्रों को भी इस पोस्ट की लिंक प्रेषित करें, ताकि जनता को जागरूक बनाने का यह प्रयास जारी रहे)... समय मिलते ही इसकी अगली कडी़ शीघ्र ही पेश की जायेगी.... आमीन
नोट : सिर्फ़ कोष्ठक में लिखे दो-चार वाक्य मेरे हैं, बाकी का लेख अनुवाद मात्र है ।

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Thursday 9 August 2007
सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-२)

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/08/blog-post_09.html


सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का "धर्मनिरपेक्षता", या "हिन्दू राष्ट्रवाद" या "भारत की बहुलवादी संस्कृति" से कोई लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ, लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन कराने के लिये कैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में एक रैली में उन्होंने कहा था कि "अपनी आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ", बहुत ही उच्च विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ "असुविधाजनक" प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह "त्याग" और "बलिदान" (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं - कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था... और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल... सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर "नामास्खार" आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४ तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद...यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१ में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। "माईनो" मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले "धर्मनिरपेक्ष नेताओं" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के "तीसरे भाग" में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये!

(प्रस्तुत लेख सुश्री कंचन गुप्ता द्वारा दिनांक २३ अप्रैल १९९९ को रेडिफ़.कॉम पर लिखा गया है, बेहद मामूली फ़ेरबदल और कुछ भाषाई जरूरतों के मुताबिक इसे मैंने संकलित, संपादित और अनुवादित किया है। डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखे गये कुछ लेखों का संकलन पूर्ण होते ही अनुवादों की इस कडी़ का तीसरा भाग पेश किया जायेगा।) मित्रों जनजागरण का यह महाअभियान जारी रहे, अंग्रेजी में लिखा हुआ अधिकतर आम लोगों ने नहीं पढा़ होगा इसलिये सभी का यह कर्तव्य बनता है कि महाजाल पर स्थित यह सामग्री हिन्दी पाठकों को भी सुलभ हो, इसलिये इस लेख की लिंक को अपने इष्टमित्रों तक अवश्य पहुँचायें, क्योंकि हो सकता है कि कल को हम एक विदेशी द्वारा शासित होने को अभिशप्त हो जायें !
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Sunday 26 August 2007
आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-३)

Do You Know Sonia Gandhi? (Part-3)


http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/08/know-your-sonia-gandhi-part-3.html

(इस भाग में – सोनिया गाँधी का जन्म, उनका पारिवारिक इतिहास, उनके सम्बन्ध, उनके झूठ, उनके द्वारा कानून से खिलवाड़ आदि शामिल हैं)
सोनिया गाँधी से सम्बन्धित पिछले दोनों अनुवादों में हमने सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ जाना (क्या वाकई?) लेकिन जितना जाना उतने ही प्रश्न दिमागों में उठते गये। उन दोनो पोस्टों पर मुझे ब्लॉग पर और व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे-बुरे मेल प्राप्त हुए, जिसका जिक्र मैंने तीसरी पोस्ट “सोनिया गाँधी की पोस्ट पर उठते सवाल-जवाब” में किया था। और जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ, कि मेरी सोनिया गाँधी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है और ना ही मुझे इस बात का कोई मुगालता है कि मैं कोई बहुत बड़ा “शोधक” हूँ, फ़िर भी सोनिया भक्तों (इसे कॉंग्रेस भक्तों भी पढ़ा जा सकता है) ने ईमेल-हमले लगातार जारी रखे। मैं उनसे सिर्फ़ एक-दो सवाल पूछना चाहता था (लेकिन Anonymous मेल होने के कारण पूछ ना सका), कि इतना हल्ला मचाने वाले ये लोग जानते हैं कि सोनिया गाँधी का जन्म कहाँ हुआ? उनकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कितनी हुई? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे किस परिवार से हैं? इसलिये डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित इस लेख का अनुवाद “सोनिया गाँधी, भाग-३” के रूप में पेश करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ (क्योंकि कई लोगों ने मुझे ईमेल से जवाब देने का मौका नहीं दिया)। बहरहाल, पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है) –

“मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है।

भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं।

पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी।

दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है।

तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है।

कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही।

बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी।

राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।
............ जारी ..... है (भाग-४ शीघ्र ही), जिसमें हम पायेंगे कई अनसुलझे और बेचैन करने वाले प्रश्न.... तब तक प्रिय आलोचकों, "मेरा मेल बॉक्स खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिये..."

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/08/know-your-sonia-gandhi-part-3.html



Monday 27 August 2007
सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-४)

Know Sonia Gandhi (Part-4)

गतांक (सोनिया...भाग-३) से आगे जारी...

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/08/know-your-sonia-gandhi-part-4.html


राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि... मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं.... राजनीति शायद इसी का नाम है...]

Posted by Suresh Chiplunkar at 7:46 PM

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/08/know-your-sonia-gandhi-part-4.html



Monday 8 August 2011
“मालिकों” के विदेश दौरे के बारे में जानने का, नौकरों को कोई हक नहीं है… Sonia Gandhi Illness, Foreign Trips of MPs

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/08/sonia-gandhi-illness-foreign-trips-of.html

यह एक सामान्य सा लोकतांत्रिक नियम है कि जब कभी कोई लोकसभा या राज्यसभा सदस्य किसी विदेश दौरे पर जाते हैं तो उन्हें संसदीय कार्य मंत्रालय को या तो "सूचना" देनी होती है अथवा (कनिष्ठ सांसद जो मंत्री नहीं हैं उन्हें) "अनुमति" लेनी होती है।

इस वर्ष जून माह में जब बाबा रामदेव का आंदोलन उफ़ान पर था, उस समय सोनिया गाँधी अपने परिवार एवं विश्वस्त 11 अन्य साथियों के साथ लन्दन, इटली एवं स्विट्ज़रलैण्ड के प्रवास पर थीं (इस बारे में मीडिया में कई रिपोर्टें आ चुकी हैं)। काले धन एवं स्विस बैंक के मुद्दे पर जब सिविल सोसायटी द्वारा आंदोलन किया जा रहा था, तब "युवराज" लन्दन में अपना जन्मदिन मना रहे थे (Rahul Gandhi Celebrates Birthday in London)। सोनिया एवं राहुल के यह दोनों विदेशी दौरे मीडिया की निगाह में बराबर बने हुए थे (Sonia's Foreign Visit), परन्तु विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र(?) वाली भारत सरकार के लोकसभा सचिवालय को आधिकारिक रूप से इस बात की कोई जानकारी नहीं थी, कि देश की एक सबसे प्रमुख सांसद, NAC एवं UPA की अध्यक्षा तथा अमेठी के सांसद उर्फ़ युवराज "कहाँ" हैं?

यह बात "सूचना के अधिकार" कानून (Right to Information) के तहत माँगी गई एक जानकारी से निकलकर सामने आई है कि जून 2004 (अर्थात जब से UPA सत्ता में आया है तब) से "महारानी" एवं "युवराज" ने लोकसभा सचिवालय को अपनी विदेश यात्राओं के बारे में "सूचित" करना भी जरूरी नहीं समझा है (अनुमति लेना तो बहुत दूर की बात है)। (भला कोई "मालिक", अपने "नौकर" को यह बताने के लिए कैसे बाध्य हो सकता है, कि वह कहाँ जा रहा है… तो फ़िर महारानी और युवराज अपनी "प्रजा" को यह क्यों बताएं?) जब इंडिया टुडे ने लोकसभा सचिवालय के समक्ष RTI लगाकर सूचना चाही कि 14वीं लोकसभा के किन-किन सांसदों ने विदेश यात्राएं की हैं, तब सचिवालय ने "पवित्र परिवार"(?) को छोड़कर सभी सांसदों की विदेश यात्राओं के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई। लोकसभा सचिवालय के उप-सचिव हरीश चन्दर के अनुसार, सचिवालय सभी विदेश यात्राओं, साथ में जाने वाले प्रतिनिधिमण्डलों के अधिकारियों एवं पत्रकारों का पूरा ब्यौरा रखता है, प्रत्येक सांसद का यह कर्तव्य है कि वह अपनी विदेश यात्रा से पहले लोकसभा अध्यक्ष को सूचित करे…"।

इसके पश्चात इंडिया टुडे ने बाकायदा खासतौर पर अगले RTI आवेदन में 14वीं एवं 15वीं लोकसभा के सदस्यों के रूप में, "पवित्र परिवार" की विदेश यात्राओं के बारे में जानकारी चाही। 4 जुलाई 2011 को लोकसभा सचिवालय से जवाब आया, "रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं…"। (नौकर की क्या मजाल, कि वह मालिक से "नियम-कायदे" के बारे में पूछताछ करे या बताये?) इसी प्रकार का RTI आवेदन हिसार के रमेश कुमार ने लगाया था, जिन्हें पहले तो कोई सूचना ही नहीं दी गई… जब उसने केन्द्रीय सूचना आयुक्त (Central Information Commissioner) को "दूसरी अपील" की तब उस कार्यालय ने उस आवेदन को प्रधानमंत्री कार्यालय एवं संसदीय कार्य मंत्रालय को "फ़ारवर्ड" कर दिया। फ़िर पता नहीं कहाँ-कहाँ से घूमते-फ़िरते उस आवेदन का जवाब कैबिनेट सचिवालय की तरफ़ से श्री कुमार को 8 जुलाई 2011 को मिला कि उनके आवेदन को "राष्ट्रीय सलाहकार परिषद" (NAC) को भेज दिया गया है… इसके जवाब में NAC के कार्यालय से कहा गया कि उनके पास सोनिया गाँधी की विदेश यात्राओं के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है…(यानी उनकी "किचन कैबिनेट" को भी नहीं पता??? घनघोर-घटाटोप आश्चर्य!!!)।

फ़िलहाल सोनिया गाँधी कैंसर के ऑपरेशन हेतु अमेरिका के एक अस्पताल में हैं, जहाँ कांग्रेस के खासुलखास नौकरशाह पुलक चटर्जी उनकी सुरक्षा एवं गोपनीयता का विशेष खयाल रखे हुए हैं। विदेशी मीडिया के "पप्पाराजियों" तथा भारतीय मीडिया के "बड़बोले" और "कथित खोजी" पत्रकारों को सोनिया गाँधी के आसपास बहने वाली हवा से भी दूर रखा गया है। हालांकि कोई भी सांसद (या मंत्री) अपनी निजी विदेश यात्राओं पर जाने के लिए स्वतन्त्र है (आम नागरिक की तरह) लेकिन चूंकि सांसद "जनता के सेवक"(??? क्या! सचमुच) हैं, इसलिए कम से कम उन्हें देश में आधिकारिक रूप से बताकर जाना चाहिए। किसी भी शासकीय सेवक से पूछ लीजिये, कि उसे विदेश यात्रा करने से पहले कितनी तरह की जानकारियाँ और "किलो" के भाव से दस्तावेज पेश करने पड़ते हैं… जबकि देश के "भावी प्रधानमंत्री"(?) और "वर्तमान प्रधानमंत्री नियुक्त करने वाली" मैडम, सरेआम नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं? जैसी की अपुष्ट खबरें हैं कि सोनिया गाँधी को कैंसर है (या कि था)। अब कैंसर कोई ऐसी सर्दी-खाँसी जैसी बीमारी तो है नहीं कि एक बार इलाज कर लिया और गायब… कैंसर का इलाज लम्बा चलता है और विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ कई-कई "मीटिंग और सिटिंग" तथा विभिन्न प्रकार की कीमो एवं रेडियो थेरेपी करनी पड़ती है (यहाँ हम यह "मानकर" चल रहे हैं कि सोनिया गाँधी को कैंसर हुआ है, क्योंकि जिस अस्पताल में वे भरती हैं वह एक कैंसर इंस्टीट्यूट है Sloan Kettering Cancer Center, New York)। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले 3-4 वर्षों में सोनिया गाँधी अपने "विश्वासपात्र" डॉक्टर से सलाह लेने कई बार विदेश आई-गई होंगी… क्या उन्हें एक बार भी यह खयाल नहीं आया कि लोकसभा सचिवालय एवं संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित कर दिया जाए? नियमों की ऐसी घोर अवहेलना, सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को नहीं करना चाहिए।

माना कि कांग्रेस को लोकतन्त्र पर कभी भी भरोसा नहीं रहा (सन्दर्भ – चाहे आपातकाल थोपना हो, और चाहे कांग्रेस के दफ़्तरों के परदे बदलने के लिए "हाईकमान" की अनुमति का इन्तज़ार करने वालों का हुजूम हो), परन्तु इसका ये मतलब तो नहीं कि लोकसभा के छोटे-छोटे नियमों का भी पालन न किया जाए? बात सिर्फ़ नियमों की भी नहीं है, असली सवाल यह है कि आखिर "पवित्र परिवार"(?) को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों बरती जाती है? माना कि "पवित्र परिवार" समूचे भारत की जनता को अपना "गुलाम" समझता है (बड़ी संख्या में हैं भी), परन्तु क्या एक लोकतन्त्र में आम जनता को यह जानने का हक नहीं है कि उनके "शासक" कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं, उन्हें क्या बीमारी है, उनके रिश्तेदारियाँ कहाँ-कहाँ और कैसी-कैसी हैं? आदि-आदि…। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों का पूरा "हेल्थ बायोडाटा" नेट और अखबारों में उपलब्ध होता है।

इधर ऐसी उड़ती हुई अपुष्ट खबरें हैं कि सोनिया गाँधी का कैंसर का ऑपरेशन हुआ है (हालांकि अभी पार्टी की ओर से आधिकारिक बयान नहीं आया, और शायद ही आए)। जनता के मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि क्या भारत में ऐसे ऑपरेशन हेतु "सर्वसुविधायुक्त" अस्पताल या उम्दा डॉक्टर नहीं हैं? या फ़िर दुनिया का सबसे दक्ष डॉक्टर मुँहमाँगी फ़ीस पर यहाँ भारत आकर कोई ऑपरेशन नहीं करेगा? यदि गाँधी परिवार आदेश दे, तो दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी जैसे कई कांग्रेसी नेता इतने "सक्षम" हैं कि दुनिया के किसी भी डॉक्टर को "उठवाकर" ले आएं… तो फ़िर विदेश जाकर, गुपचुप तरीके से नाम बदलकर, ऑपरेशन करवाने की क्या जरुरत है, खासकर उस स्थिति में जबकि इलाज पर लगने वाला पैसा देश के करदाताओं के खून-पसीने की कमाई से ही लगने वाला है…परन्तु यह सवाल पूछेगा कौन?
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चलते-चलते :- RTI की इसी सूचना के आधार पर कुछ और चौंकाने वाली जानकारियाँ भी मिली हैं। फ़रवरी 2008 से जून 2011 तक सबसे अधिक बार "निजी" विदेश यात्रा पर गए, टॉप चार सांसद इस प्रकार हैं…

1) मोहम्मद मदनी (रालोद) = फ़रवरी 2008 से अब तक कुल 14 यात्राएं, 116 दिन (सऊदी अरब, बांग्लादेश, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन)

2) एनके सिंह (जद यू) = मई 2008 से अब तक कुल 13 यात्राएं, 92 दिन (अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, ग्रीस, डेनमार्क)

3) बदरुद्दीन अजमल (जी हाँ, वही असम के इत्र वाले, बांग्लादेशी शरणार्थी प्रेमी) = अगस्त 2009 से अब तक कुल 9 यात्राएं, 61 दिन (सऊदी अरब, दुबई)

4) सीताराम येचुरी (सीपीआई-एम) - सितम्बर 2009 से अब तक कुल 8 यात्राएं, 43 दिन (अमेरिका, सीरिया, स्पेन, चीन, बांग्लादेश)

इन सभी में और "पवित्र परिवार" में अन्तर यह है कि ये लोग लोकसभा सचिवालय एवं सम्बन्धित मंत्रालय को सूचित करके विदेश यात्रा पर गये थे…

(आप सोच रहे होंगे कि बार-बार “पवित्र परिवार” क्यों कहा जा रहा है, ऐसा इसलिये है क्योंकि भारतीय मीडियाई भाण्डों के अनुसार यह एक पवित्र परिवार ही है। इस परिवार की “पवित्रता” को बनाए रखना प्रत्येक मीडिया हाउस का “परम कर्तव्य” है… इस परिवार की पवित्रता का आलम यह है कि भ्रष्टाचार की बड़ी से बड़ी आँच इसे छू भी नहीं सकती तथा त्याग-बलिदान की “बेदाग” चादर तो लिपटी हुई है ही… मीडिया को बस इतना करना होता है, कि वह इस परिवार की “पवित्रता” को “मेन्टेन” करके चले…)

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/08/sonia-gandhi-illness-foreign-trips-of.html

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स्रोत :- http://indiatoday.intoday.in/site/story/sonia-gandhi-rahul-gandhi-lok-sabha/1/146474.html?source=IT02082011

सम्पत्ति का हिसाब माँगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है(सन्दर्भ :- राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन)...... Rajiv Gandhi Foundation,Trusts, NGOs and Gandhi Family




Monday 20 June 2011
सम्पत्ति का हिसाब माँगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है…(सन्दर्भ :- राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन)...... Rajiv Gandhi Foundation, Trusts, NGOs and Gandhi Family

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/06/rajiv-gandhi-foundation-trusts-ngos-and.html

जब से बाबा रामदेव और अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के नाम पर कांग्रेस की नाक में दम करना शुरु किया है, तभी से बाबा रामदेव कांग्रेस के विभिन्न मंत्रियों के निशाने पर हैं। आये दिन उन्हें “व्यापारी”, “ढोंगी”, “भ्रष्ट”, “ठग” इत्यादि विशेषणों से नवाज़ा जा रहा है। कांग्रेस के इस खेल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और स्वयंभू बड़े पत्रकारों का वह दल भी शामिल है जिन्हें नियमित रूप से कांग्रेस द्वारा “हफ़्ता” पहुँचाया जाता है, कभी कागज के कोटे के रूप में, कभी प्रेस के लिये मुफ़्त (या सस्ती) जमीन के रूप में तो कभी “हो रहा भारत निर्माण…” के विज्ञापनों के नाम पर…


बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट (Bharat Swabhiman Trust) और दिव्य योगपीठ (Divya Yog Mandir) के हिसाब-किताब और आय-व्यय का ब्यौरा माँगने में यह स्वनामधन्य और कथित “खोजी पत्रकार”(?) सबसे आगे रहे। इन पत्रकारों की “स्वामिभक्ति” को देखते हुए बाबा रामदेव ने अपने ट्रस्ट की सम्पत्ति घोषित कर दी, साथ ही यह भी बता दिया कि अन्य सभी जानकारी रजिस्ट्रार के दफ़्तर, आयकर विभाग एवं अन्य सभी सरकारी विभागों से प्राप्त की जा सकती है। ये बात और है कि “खोजी पत्रकारों” की, उन दफ़्तरों में जाकर कुछ काम-धाम करने की मंशा कभी नहीं थी, उनका असली काम था “कीचड़ उछालना”, “बदनाम करना” और “सनसनी फ़ैलाना”, इन तीनों कामों में बड़े-बड़े पत्रकार अपने करियर के शुरुआती दिनों से ही माहिर रहे हैं और उन्होंने अपने “मालिक” पर हुए हमले का करारा जवाब बाबा रामदेव को दिया भी… ठीक उसी प्रकार, जैसे उनके मालिक को जूता दिखाने भर से गुलामों ने उस बेचारे की धुनाई कर दी, जो बेचारा चाहता तो उतने समय में चार जूते मार भी सकता था। ऐसी प्रेस कान्फ़्रेंसों में अक्सर “गुलामों” को ही आगे-आगे बैठाया जाता है ताकि “असुविधाजनक” प्रश्नों को सफ़ाई से टाला (टलवाया) जा सके…।

खैर… बात हो रही थी सम्पत्ति का हिसाब माँगने की…। शायद इन बड़े पत्रकारों और स्वनामधन्य “सबसे तेज” चैनलों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे कभी यह पता लगाएं कि आज की तारीख में सोनिया गाँधी कितने फ़ाउण्डेशनों, कितने ट्रस्टों, कितने फ़ण्डों की अध्यक्ष, “मानद अध्यक्ष”(?), “ट्रस्टी”, “बोर्ड सदस्य” अथवा लाभान्वितों में हैं। सोनिया गाँधी के “निजी मनोरंजन क्लब” (यानी National Advisory Commission – NAC) में जो एक से बढ़कर एक “NGO धुरंधर” बैठे हैं, कभी उनकी सम्पत्ति और उन्हें मिलने वाले देशी-विदेशी अनुदानों के बारे में जानकारी निकालें, तो आँखें फ़ट जाएंगी, दिमाग हिल जाएगा और कलेजा अन्दर धँस जाएगा। इन पत्रकारों(?) ने कभी यह जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि सोनिया गाँधी “अप्रत्यक्ष रूप से” उनमें से कितने NGOs की मालकिन हैं, उन NGOs की सम्पत्ति कितनी है, उन्हें कितना सरकारी अनुदान, कितना निजी अनुदान और कितना विदेशी अनुदान प्राप्त होता है? लेकिन बाबा रामदेव की सम्पत्ति के बारे में चिल्लाचोट करना उनका फ़र्ज़ बनता था…

ऐसा नहीं है कि किसी ने भी सोनिया गाँधी के “मालिकाना हक” वाले इन फ़ाउण्डेशनों और ट्रस्टों के हिसाब-किताब और सम्पत्ति के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। सूचना का अधिकार से सम्बन्धित बहुत से स्वयंसेवी समूहों, कुछ “असली खोजी पत्रकारों” एवं कुछ स्वतन्त्र पत्रकारों ने कोशिश की। परन्तु आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पिछले 3-4 साल से “माथाफ़ोड़ी” करने के बावजूद अभी तक कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी, कारण – केन्द्रीय सूचना आयुक्त ने यह निर्णय दिया है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन (Rajiv Gandhi Foundation) तथा जवाहरलाल मेमोरियल फ़ण्ड (Jawaharlal Memorial Fund) जैसे संस्थान “सूचना के अधिकार” कानून के तहत अपनी सूचनाएं देने के लिये बाध्य नहीं हैं। मामला अभी भी हाइकोर्ट तक पहुँचा है और RTI के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने “सूचना आयुक्त के अड़ियल रवैये” के बावजूद हार नहीं मानी है। RGF के बारे में सूचना का अधिकार माँगने पर अधिकारी ने यह जवाब देकर आवेदनकर्ता को टरका दिया कि “राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन सूचना देने के लिये बाध्य नहीं है। यह फ़ाउण्डेशन एक “सार्वजनिक उपक्रम” नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस फ़ाउण्डेशन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलता है, न ही सरकार की इसमें कोई भागीदारी है और न ही इसके ट्रस्टी बोर्ड के चयन/नियुक्ति में सरकार का कोई दखल होता है… अतः इसे सूचना का अधिकार के कार्यक्षेत्र से बाहर रखा जाता है…”।

उल्लेखनीय है कि 21 जून 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री के “आदर्शों एवं सपनों”(?) को साकार रूप देने तथा देशहित में इसका लाभ बच्चों, महिलाओं एवं समाज के वंचित वर्ग तक पहुँचाने के लिये राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की गई थी।

RTI कार्यकर्ता श्री षन्मुगा पात्रो ने सिर्फ़ इतना जानना चाहा था कि RGF द्वारा वर्तमान में कितने प्रोजेक्ट्स और कहाँ-कहाँ पर जनोपयोगी कार्य किया जा रहा है? परन्तु श्री पात्रो को कोई जवाब नहीं मिला, तब उन्होंने सूचना आयुक्त के पैनल में अपील की। आवेदन पर विचार करने बैठी आयुक्तों की पूर्ण बेंच, जिसमें एमएम अंसारी, एमएल शर्मा और सत्यानन्द मिश्रा शामिल थे, ने इस बात को स्वीकार किया कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन (RGF) की कुल औसत आय में केन्द्र सरकार का हिस्सा 4% से कम है, लेकिन फ़िर भी इसे “सरकारी अनुदान प्राप्त” संस्था नहीं माना जा सकता। इस निर्णय के जवाब में अन्य RTI कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की घोषणा केन्द्र सरकार के वित्त मंत्री द्वारा बजट भाषण में की गई थी। सरकार ने इस फ़ाउण्डेशन के समाजसेवा कार्यों के लिये अपनी तरफ़ से एक फ़ण्ड भी स्थापित किया था। इसी प्रकार राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन जिस इमारत से अपना मुख्यालय संचालित करता है वह भूमि भी उसे सरकार द्वारा कौड़ियों के मोल भेंट की गई थी। शहरी विकास मंत्रालय ने 28 दिसम्बर 1995 को इस फ़ाउण्डेशन के सेवाकार्यों(?) को देखते हुए जमीन और पूरी बिल्डिंग मुफ़्त कर दी, जबकि आज की तारीख में इस इमारत के किराये का बाज़ार मूल्य ही काफ़ी ज्यादा है, क्या इसे सरकारी अनुदान नहीं माना जाना चाहिये? परन्तु यह तर्क और तथ्य भी “खारिज” कर दिया गया।

इस सम्बन्ध में यह सवाल भी उठता है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को तो सरकार से आर्थिक मदद, जमीन और इमारत मिली है, फ़िर भी उसे सूचना के अधिकार के तहत नहीं माना जा रहा, जबकि ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर ऐसी कई सहकारी समितियाँ हैं जो सरकार से फ़ूटी कौड़ी भी नहीं पातीं, फ़िर भी उन्हें RTI के दायरे में रखा गया है। यहाँ तक कि कुछ पेढ़ियाँ और समितियाँ तो आम जनता से सीधा सम्बन्ध भी नहीं रखतीं फ़िर भी वे RTI के दायरे में हैं, लेकिन राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन नहीं है। क्या इसलिये कि यह फ़ाउण्डेशन देश के सबसे “पवित्र परिवार”(???) से सम्बन्धित है?

1991 में राजीव गाँधी के निधन के पश्चात तत्कालीन उपराष्ट्रपति ने राजीव गाँधी के सपनों को साकार करने और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये एक ट्रस्ट के गठन का प्रस्ताव दिया और जनता से इस ट्रस्ट को मुक्त-हस्त से दान देने की अपील की। 1991-92 के बजट भाषण में वित्तमंत्री ने इसकी घोषणा की और इस फ़ाउण्डेशन को अनुदान के रूप में 100 करोड़ रुपये दिये (1991 के समय के 100 करोड़, अब कितने हुए?)। इसी प्रकार के दो ट्रस्टों (फ़ण्ड) की स्थापना, एक बार आज़ादी के तुरन्त बाद 24 जनवरी 1948 को नेहरु ने “नेशनल रिलीफ़ फ़ण्ड” का गठन किया था तथा दूसरी बार चीन युद्ध के समय 5 नवम्बर 1962 को “नेशनल डिफ़ेंस फ़ण्ड” की स्थापना भी संसद में बजट भाषण के दौरान ही की गई और इसमें भी सरकार ने अपनी तरफ़ से कुछ अंशदान मिलाया और बाकी का आम जनता से लिया गया। आश्चर्य की बात है कि उक्त दोनों फ़ण्ड, अर्थात नेशनल रिलीफ़ फ़ण्ड और नेशनल डिफ़ेंस फ़ण्ड को “सार्वजनिक हित” का मानकर RTI के दायरे में रखा गया है, परन्तु राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को नहीं…।

राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को सरकार द्वारा नाममात्र के शुल्क पर 9500 वर्ग फ़ीट की जगह पर एक बंगला, दिल्ली के राजेन्द्र प्रसाद रोड पर दिया गया है। इस बंगले की न तो लाइसेंस फ़ीस जमा की गई है, न ही इसका कोई प्रापर्टी टैक्स भरा गया है। RGF को 1991 से ही FCRA (विदेशी मुद्रा विनियमन कानून 1976) के तहत छूट मिली हुई है, एवं इस फ़ाउण्डेशन को दान देने वालों को भी आयकर की धारा 80G के तहत छूट मिलती है, इसी प्रकार इस फ़ाउण्डेशन के नाम तले जो भी उपकरण इत्यादि आयात किये जाते हैं उन्हें भी साइंस एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च संगठन (SIRO) के तहत 1997 से छूट मिलती है एवं उस सामान अथवा उपकरण की कीमत पर कस्टम्स एवं सेण्ट्रल एक्साइज़ ड्यूटी में छूट का प्रावधान किया गया है… आखिर इतनी मेहरबानियाँ क्यों?

हालांकि गत 4 वर्ष के संघर्ष के पश्चात अब 2 मई 2011 को दिल्ली हाइकोर्ट ने इस सिलसिले में केन्द्र सरकार को नोटिस भेजकर पूछा है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को RTI के दायरे में क्यों न लाया जाए? उल्लेखनीय है कि हाल ही में मुम्बई में रिलायंस एनर्जी को भी RTI के दायरे में लाया गया है, इसके पीछे याचिकाकर्ताओं और आवेदन लगाने वालों का तर्क भी वही था कि चूंकि रिलायंस एनर्जी (Reliance Energy), आम जनता से सम्बन्धित रोजमर्रा के काम (बिजली सप्लाय) देखती है, इसे सरकार से अनुदान भी मिलता है, इसे सस्ती दरों पर ज़मीन भी मिली हुई है… तो यह जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिये। अन्ततः महाराष्ट्र सरकार ने जनदबाव में रिलायंस एनर्जी को RTI के दायरे में लाया, अब देखना है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन और इस जैसे तमाम ट्रस्ट, जिस पर गाँधी परिवार कुण्डली जमाए बैठा है, कब RTI के दायरे में आते हैं। जब राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन सारी सरकारी मेहरबानियाँ, छूट, कर-लाभ इत्यादि ले ही रहा है तो फ़िर सूचना के अधिकार कानून के तहत सारी सूचनाएं सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?

बाबा रामदेव के पीछे तो सारी सरकारी एजेंसियाँ हाथ-पाँव-मुँह धोकर पड़ गई थीं, क्या राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन, जवाहरलाल मेमोरियल ट्रस्ट इत्यादि की आज तक कभी किसी एजेंसी ने जाँच की है? स्वाभाविक है कि ऐसा सम्भव ही नहीं है… क्योंकि जहाँ एक ओर दूसरों की सम्पत्ति का हिसाब मांगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है… वहीं दूसरी ओर अपनी सम्पत्ति को कॉमनवेल्थ, आदर्श, 2G और KG गैस बेसिन जैसे "पुण्य-कार्यों" के जरिये ठिकाने लगाने का अधिकार भी उसी के पास सुरक्षित है… पिछले 60 वर्षों से…
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नोट :-
1) यह बात भी देखने वाली है कि बाबा रामदेव ने अपने कितने रिश्तेदारों को अपने ट्रस्ट में जोड़ा और लाभान्वित किया और राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन जैसे ट्रस्टों से गाँधी परिवार के कितने रिश्तेदार जुड़े और लाभान्वित हुए…

2) हाल ही में 8 जून से 11 जून 2011 तक गाँधी परिवार के सभी प्रमुख सदस्य, श्री सुमन दुबे एवं राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन के कुछ अन्य सदस्य स्विटज़रलैण्ड की यात्रा पर गये थे, जिनमें से कुछ ने खुद को "फ़ाइनेंशियल एडवाइज़र" घोषित किया था… है ना मजेदार बात?

3) श्री सुमन दुबे के पारिवारिक समारोह में शामिल होने ही राहुल गाँधी केरल गये थे जहाँ उन्हें सबरीमाला मन्दिर में हुई भगदड़ की सूचना मिली थी, लेकिन घायलों/मृतकों को देखने जाने की बजाय युवराज छुट्टी मनाने का आनन्द लेते रहे थे…

Posted by Suresh Chiplunkar at 1:13 PM

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/06/rajiv-gandhi-foundation-trusts-ngos-and.html

दिग्विजय सिंह ' दिग्गीराजा '



http://bhandafodu.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%AF

दिग्विजय सिंह गद्दारों का वंशज :ह्त्या का आरोपी !!

मनुष्य को जैसे संस्कार अपने पुरखों से मिलते हैं ,उसके अनुरूप ही उसका स्वभाव ,चरित्र और विचार बन जाते हैं .यह एक निर्विवाद सत्य है .और दिग्विजय के ऊपर पूरी तरह से लागू होती है .दिग्विजय खुद को प्रथ्वी राज चौहान का वंशज बताता है .लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है .दिग्विजय क्षत्रिओं की एक उपजाति "खीची "से सम्बंधित है .इसका विवरण "खीची इतिहास संग्रह "में मिलता है .इसके लेखक A .H .Nizami और G .S .Khichi है .पुस्तक का संपादन R .P .Purohit ने किया है .किताब "खिची शोध संस्थान जोधपुर "से प्रकाशित हुई थी .एक और पुस्तक "Survay of khichii History "में खीचियों के बारे में जानकारी मिलती है .खिची धन लेकर किसी राजा के लिए युद्ध करते थे .आज दिग्विजय खुद को मध्य प्रदेश में गुना जिला के एक छोटी सी रियासत "राघोगढ़ "का राजा कहता है .उसके चमचे उसे दिग्गी राजा पुकारते है .
1 -दिग्विजय का पूर्वज कौन था
पुस्तक के अनुसार दिग्विजय के हाथों जो रियासत मिली एक "गरीब दास "नामके सैनिक को अकबर ने दी थी .जब राजपुताना और मालवा के सभी क्षत्रिय राणा प्रताप के साथ हो रहे थे .गरीब दास अकबर के पास चला गया .अकबर ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर मालवा के सूबेदार को हुक्म भेजा की गरीब दास को एक परगना यानि पांच गाँव दे दिए जाएँ . गरीब दास की मौत के बाद उसके पुत्र "बलवंत सिंह (1770 -1797 ) ने इसवी 1777 में बसंत पंचमी के दिन एक गढ़ी की नींव रखी और उसका नाम अपने कुल देवता "राघोजी "के नाम पर "राघोगढ़ "रख दिया था .
कर्नल टाड के इतिहास के अनुसार बलवंत सिंह ने 1797 तक राज किया .और अंगरेजों से दोस्ती बढ़ाई.जब सन 1778 में प्रथम मराठा युद्ध हुआ तो बलवंत सिंह ने अंगरेजी फ़ौज की मदद की थी
इसका उल्लेख जनरल Gadred ने "Section from State Papers .Maratha Volume I Page 204 में किया है .बलवंत सिंह की इस सेवा के बदले कम्पनी सरकार ने Captain fielding की तरफ से बलदेव सिंह को पत्र भेजा ,जिसमे लिखा था कंपनी बहादुर की तरफ से यह परगना जो बालामेटमें है उसका किला राघोगढ़ तुम्हें प्रदान किया जाता है और उसके साथ के गावों को अपना राज्य समझो .यदि सिंधिया सरकार किसी प्रकार का दखल करे तो इसकी सूचना मुझे दो ..
बाद में जब 1818 में बलवंत सिंह का नाती अजीत सिंह (1818 -1857 )गद्दी पर बैठा तो अंगरेजों के प्रति विद्रोह होने लगे था ,अजीत सिंह ने ग्वालियर के रेजिडेंट को पत्र भेजा कि,आजकल महाराज सिंधिया बगावत की तय्यारी कर रहे हैं .उनके साथ झाँसी और दूसरी रियासत के राजा भी बगावत का झंडा खड़ा कर रहे हैं .इसलिए इन बागियों को सजा देने के लिए जल्दी से अंगरेजी फ़ौज भेजिए ,उस पत्र का जवाब गवालियर के रेजिडेंट A .Sepoyrs ने इस तरह दिया "आप कंपनी की फ़ौज की मदद करो और बागियों साथ नहीं दो .आप हमारे दोस्त हो ,अगर सिंधिया फ़ौज येतो उस से युद्ध करो .कंपनी की फ़ौज निकल चुकी है .
लेकिन सन 1856 में एक दुर्घटना में अजीत सिघ की मौत हो गयी .उसके बाद 1857 में उसका लड़का "जय मंगल सिंह "(1857 -1900 )गद्दी पर बैठा इसके बाद "विक्रमजीत सिंह राजा बना (1900 -1902 (.लेकिन अंग्रेज किसी कारण से उस से नाराज हो गए .और उसे गद्दी से उतार सिरोंज परिवार के एक युवक "मदरूप सिंह "को राजा बना दिया जिसका नाम "बहादुर सिंह "रख दिया गया ( 1902 -1945 )अंगरेजों की इस मेहरबानी के लिए बहादुर सिंह ने अंगरेजी सरकार का धन्यवाद दिया और कहा मैं वाइसराय का आभारी हूँ .मैं वादा करता हूँ कि सरकार का वफादार रहूँगा .मेरी यही इच्छा है कि अंगरेजी सरकार के लिए लड़ते हुए ही मेरी जान निकल जाये .
इसी अंगरेज भक्त गद्दार का लड़का "बलभद्र सिंह "हुआ जो दिग्विजय का बाप है .बलभद्र का जन्म 1914 में हुआ था और इसके बेटे दिग्विजय का जन्म 28 फरवरी 1947 को इन्दौर में हुआ था .
बलभद्र सिंह ने मध्य भारत (पूर्व मध्य प्रदेश )की विधान सभा का चुनाव हिन्दू महा सभा की सिट से लड़ा था .और कांग्रेस के उम्मीदवार जादव को हराया था .सन 1969 में दिग्विजय ने भी नगर पालिका चुनाव कांग्रेस के विरुद्ध लड़ा था .और जीत कर अध्यक्ष बन गया था .
लेकिन इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तारी से बचने लिए जब दिग्विजय अपने समाधी "अर्जुन सिघ "के पास गया तो उसने कांग्रस में आने की सलाह दी .और कहा यदि जागीर बचाना है तो कांग्रेस में आ जाओ .
इस तरह दिग्विजय का पूरा वंश अवसरवाद ,खुशामद खोरी .और अंगरेजों सेवा करने लगा है
इसी कारण से जब दिग्विजय उज्जैन गया था तो वहां के भाजयुमो के अध्यक्ष "धनञ्जय शर्मा "ने सबके सामने गद्दार करार दिया था .ओर सबूत के लिए एक सी डी बी पत्रकारों को बांटी थी (पत्रिका शुक्रवार 22 जुलाई 2011 भोपाल )
2 -दिग्विजय ने कांग्रेसी नेत्री की हत्या करवायी !
अभी तक अधिकांश लोग इस बात का रहस्य नहीं समझ पा रहे थे कि दिग्विजय R .S .S और हिदुओं से क्यों चिढ़ता है .अभी अभी इसका कारण पता चला है .यद्यपि यह घटना पुरानी है .इसके अनुसार 14 फरवरी 1997 को रत के करीब 11 बजे दिग्विजय उसके भी लक्ष्मण सिंह और कुछ दुसरे लोगों ने "सरला मिश्रा "नामकी एक कांग्रेसी नेत्री की कोई ज्वलन शील पदार्थ डाल कर हत्या कर दी थी .और महिला को उसी हालत में जलता छोड़कर भाग गए थे .इतने समय के बाद यह मामला समाज सेवी और बी जे पी के पूर्व पार्षद महेश गर्ग ने फिर अदालत में पहुंचा दिया है और सी .जे .एम् श्री आर .जी सिंह के समक्ष ,दिग्विजय सिंह ,उसके भाई लक्षमण सिंह ,तत्कालीन टी आई एस.एम् जैदी ,नायब तहसीलदार आर .के.तोमर ,तहसीलदार डी.के. सत्पथी ,डा .योगीराज शर्मा .ऍफ़.एस.एल के यूनिट प्रभारी हर्ष शर्मा और नौकर सुभाष के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 ,201 .212 ,218 ,120 बी ,और 461 अधीन मामला दर्ज करने के आदेश देने के लिए आवेदन कर दिया है .फरियादी महेश गर्ग ने धारा 156 .3 यह भी निवेदन भी किया है कि उक्त सभी आरोपियों के विरुद्ध जल्दी कार्यवाही कि जाये .इसपर सी. जे. एम् महोदय ने सुनवाई की तारीख 28 जुलाई तय कर दी है .यही कारण है कि दिग्विजय सभी हिन्दुओं का गालियाँ देता है (दैनिक जागरण 23 जुलाई 2011 भोपाल )
हम सब जानते है कि आपसी विवाह सम्बन्ध करते समय परिवार का खानदान देखा जाता है .नियोजक किसी को नौकरी देते समय आवेदक की पारिवारिक पृष्ठभूमि देख लेते है .यहांतक जानवरों की भी नस्ल देखी जाती है .
फिर गद्दारों की संतान गद्दार देश भक्त कैसे हो सकते हैं .विदेशी अंगरेजों के चमचे विदेशी सोनिया चमचागिरी क्यों न करेगा .ऐसा व्यक्ति कुत्ते से भी बदतर है ,कुत्ता अपनो को नहीं काटता है .इसने तो कांग्रेसी महिला नेत्री की निर्दयता पूर्वक हत्या करा दी .


http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raghogarh.html





प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 2:00 PM 9 टिप्पणियाँ
लेबल: गद्दार, दिग्विजय
Saturday, July 2, 2011
दिग्विजय की चड्डी ढीली क्यों ?

दिग्विजय सिंह अक्सर आर.एस.एस. ,बी.जे.पी और अन्य हिंदूवादी संगठनों को गलियां क्यों देता है ,बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का विरोध क्यों करता है ?राहुल गंदी की तारीफें करके सोनिया की चापलूसी क्यों करता है ?यह ऐसे सवाल हैं ,जो लोगों के मन में उठते रहते हैं .परेक बात सब लोग जानते हैं कि सोनिया .मनमोहन ,दिग्विजय ,अहमद पटेल ,विलास राव ,शीलादीक्षित ,शहीद बलवा ,और हसन अली सब एक ही थैले कि चट्ते बट्टे है,इन सबका विदेशों में अरबों रूपया जमा है .
लोग यह भी जानते हैं कि दिग्विजय एक चालाक ,और मक्कार व्यक्ति है .और राजनीति का घाघ खिलाडी है .उसे एक तीर से कई शिकार करने का अभ्यास है .अंगरेजी क़ी कहावत है ,कि यदि किसी औरत को पटाना हो ,तो उसके कुत्ते तक की तारीफ़ करो .इसी लिए दिग्विजय हर तरह से सोनिया को खुश करता रहता है .क्योंकि असल सत्ता उसी के पास है .वर्ना एक विदेशी विधवा सिवाय भ्रष्टाचार और महगाई के आलावा क्या पैदा कर सकती है .आप सब ने देखा है कि जैसे जैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन तेज होता जा रहा है यह सब एकजुट होने लगे हैं ,और सोनिया कि शरण में आ रहे है .जैसे कुत्तों के पिल्ले अपनी माँ के पास सिमट जाते हैं .
मुझे लगता है कि दिग्विजय की चमचागिरी के पीछे यही कारण होना चाहिए ,दिग्विजय ने अपने शासनकाल में मध्य प्रदेश को चौपट कर दिया था .इसके समय भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था .वैसे तो इसने कई घोटाले किये थे .लेकिन ताजा कर्जा घोटाला (loan scam )सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया है .दिग्विजय सन 1994 से 2000 तक मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री रहा .इसने "State Industrial Development Corporation "के माध्यम से कुछ औद्योगिक समूहों को सात सौ उन्नीस (719 )करोड़ रूपया बिना किसी जमानत ,या शर्त के कर्जा दे दिया था .और कर्जा लेने वालों से कोई जमानत (security )भी नहीं ली .यह सब दिग्विजय के मित्र थे .जब सन 2005 कर्जे की न तो किश्त जमा हुई ,और न ब्याज ही जमा हुआ तो बी. जे. पी की सरकार का माथा ठनका .उस समय कारपोरेशन का मेनेजिंग डायरेक्टर S .R .Mohanty था .जो एक I .A .S अधिकारी था .सरकार ने इस मामले की (EOW ) Economic Offences Wing से जाँच की तो पता चला कि यह कर्जा दिग्विजय ने उद्योगपतिओं को ICD योजना अर्थात "Inter Corporate Deposit "के तहत दिया था .इस घोटाले में उस समय के कुछ कांग्रेसी नेता ,और मोहंती के आलावा 35 अफसरों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर दर्ज हो गयी .( इंडियन एक्सप्रेस 5 फरवरी 2011 ) बाद में मोहंती जबलपुर हाई कोर्ट गया .जहाँ उसको किसी तकनीकी कारण से थोड़ी सी राहत मिल गयी .लेकिन मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया (एन ड़ी टी.वी 6 फरवरी 2011 )मामले कि गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके दो सदस्यों की एक बेंच बना दी ,जिसमे एक Chief Judicial Magistrate और एक Additional Session Judge को रखा गया है .क्योंकि अब वह कर्जा जो 719 करोड़ का था ब्याज मिलाकर 2200 करोड़ का हो गया है .
बी.जे. पी .मध्य प्रदेश के प्रवक्ता श्री नरोत्तम मिश्र ने अदालत से इस केस को प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटने की अपील की है .दूसरी तरफ मुख्य आरोपी मोहंती खुले आम दिग्विजय को जिम्मेदार बता रहा है .उस समय वह "Health Secratary "था .दिग्विजय ने जिन 29 उद्योग पतियोंको कर्जा दिया था उनके कुछ नाम इस प्रकार है -
ई एन बी -प्रफुल महेश्वरी -417 .55
अल्पाइन -सतीश भंडारी -275 .56
रुईया -टी बी रूइया -271 .91
ईशर-गुरुचरण -155 .43
सोम समूह -140 .57
इसकी काफी बड़ी सूचीहै जो ,पत्रिका ,भोपाल 24 दिसंबर 2010 में प्रकाशित हुई थी इसका शीर्षक था "कर्ज लेकर भूल गए :जनता का धन उद्योगपतियों की जेब में "
अब जैसे जैसे सुनवाई के दिन पास आते जा रहे हैं ,दिविजय की चड्डी ढीली होती जा रही है .वह बौखला कर सरे बी.जे.पी ओर संघ को गलियां देने लगा है .उसे भी यह भी डर है की कहीं बाबा रामदेव या अन्ना हजारे इस मूद्दे को देंगे तो सोनिया के साथ सभी अन्दर हो जायेंगे .क्योंकि चोर चोर मोसेरे भाई होते है .यद्यपि मिडिया ने इस घोटाले को अधिक महत्त्व नहीं दिया .फिर भी मैं अपने सभी ब्लोगर बंधुओं से अनुरोध करता हूँ कि,इस घोटाले की बात सबको पहुंचा दें .ताकि दिग्विजय की असलियत लोगों को पता चले .और कोई सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी कर सके .खबर की लिंक भी दी जा रही है -.
http://www.ndtv.com/article/india/loan%20-scam-another%20-ias-under-scanner%20-83683




प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 9:21 PM 5 टिप्पणियाँ
लेबल: दिग्विजय
Thursday, June 30, 2011
दिग्विजय सिंह का भंडाफोड़ !!

दिग्विजय सिंह अपराधियों ,औरातान्कवादियों से हमदर्दी रखता है ,यह उसके सभी अखबारों ,और टी.वी. में दिए गए बयानों से साबित होता है .जो व्यक्ति ओसामा को "ओसामा जी " और बाबा रामदेव को "ठग "और अन्ना हजारे को "धोखेबाज "कहता हो आप उसकी मानसिकता के बारे में खुद अंदाजा कर सकते है .इस बात में कोई शक नहीं है कि जिस व्यक्ति के जैसे विचार होते हैं ,वह वैसी ही नीति अपनाता है .वैसे तो दिग्विजय हिन्दू संगठनों को आतंकवादी ,अपराधी कहता है ,तो उसका मुंह नहीं थकता है.


लेकिन जब उसे मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री का पद मिला तो उसने चुन चुन कर कई ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया था जो अपराधी थे ,या जिनकी अपराधिक प्रष्ठभूमि थी .वैसे गिग्विजय को कांग्रेस से कोई लेनादेना नहीं था .उसके पूर्वज अंग्रेजों के पिट्ठू थे .और गुना जिला में एक छोटी सी रियासत राघौगढ़ के जमींदार थे .वही ठसक दिग्विजय में भरी हुई थी .दिग्विजय को कांग्रेस में लाने वाले उसके समधी अर्जुन सिंह थे .उस समय लोग एम् .पी कांग्रेस को "समधी कांग्रेस "कहते थे .सता पते ही दिग्विजय ने ईमानदार और निष्ठावान कायकर्ताओं को निकाल दिया और सन 1988 में पार्टी के "पुनर्गठन "के बहाने अपने लोगों को पार्टी में भर दिया जो अपराधी थे .उसी दिन से मध्य प्रदेश कांग्रेस का अपराधीकरण शुरू हो गया था .जो उस समय के अखबारों में छपा था .उनका कुछ नमूना दे रहे हैं -
पार्टी में अपने ही लोगों को भर दिया ,और पुराने निष्ठावान कांगरेसियों कि उपेक्षा करके उनको निकाल दिया.
1 -इंदिरा गांधी को समर्पित ,दुर्दिनों के साथियों को गड्ढे में धकेला गया. कांग्रेस प्राइवेट लिमिटेड बन गई (दैनिक भास्कर .14 जन 1988 )
2 -बुरे दिनों के साथी पुनर्गठन के नाम पर निकले गए.(दैनिक भास्कर .16 जन 1988 )
3 -प्रदेश कार्यकारिणी की उपेक्षा .(भास्कर 18 जन .1988 )
बाद में जब 15 सितम्बर 1988 को पचमढ़ी में कांग्रेस की कार्यकारिणी की सभा हुई तो उसमे यह मुद्दा यथा था .और प्रताव पारित हुआ और सोनिया ने कहा था की कि 1978 से 1980 तक जिन लोगों ने काग्रेस के आंदोलनों में सक्रीय कम किया था ,उन्हीं को कंरेस में रखा जायेगा .लेकिन दिग्विजय से उस प्रस्ताव की अनदेखी करते हुए जिन लोगों को ऊंचे ऊँचे पदों पर बिठा दिया उनमेसे कुछ लोगों के नाम दिए जा रहे है .और दिग्विजय की नीतियों के बारे में कुछ जानकारी दी जा रही है .कांग्रेस कार्यालय की फाइलों से प्राप्त हुई है .
1 -दिनांक 27 -28 मार्च 1986 को दिग्विजय ने हेक जिलों से युवकों को बुलालर एक दल बनाया .जिसमे करीब 700 लोग चुने गए .और दल में शामिल होने की अंतिम तारीख 31 मार्च 1986 रखी थी .फिर उनके 22 सेल बना कर जंगल में ट्रेनिंग के लिए भेजा .इनमे अधिकांश लोग ऐसे थे ,जो खुले आम इंदिरा और राजीव को गालियाँ देते थे .इनका काम फसाद कराना था.
2 -जगतपाल को कांग्रेस कमिटी का जनेअल सेक्रेटरी मनोनीत किया ,जिसने 10 लाख रूपों का गबन किया.
3 -भोपाल गैस कांड के अपराधी .यूनियन कार्बाइड के अपराधियों और उनके साथियों को संरक्षण दिया .
4 -जब सन 1985 में मंदसौर के एक कसबे "सिंगौरी "में साम्प्रदायिक डंडे हुए ,तो दिग्विजय ने एक प्रेस नोट से दंगा और भड़का दिया .जिस से कई लोग मारे गए.
5 -ठाकुर हरबंस सिंह नामके व्यक्ति को कांग्रेस सेवादल का चेयर मेन बना दिया ,जिस पर धोखा घडी ,गबन और अन्य कई मामले चल रहे थे .
अ -केस .न. 1650 /84 धारा 378 (c ) C R P C
ब-केस स .298 /82 धारा 420
इसके आलावा हरबंस के निवास स्थान सेवनी पर इनकम टेक्स ने छापा मारा था और लाखों रूपया बरामद किया था .
6 -कप्तान सिंह ठाकुर .दिग्विजय ने इसे बीस सूत्री प्रोग्राम का जनरल सेक्रेटरी और Coordinator बना दिया था ,यह मैनपुरी से एक लड़की भगा कर लाया था .और उसे घर में रख लिया .फिर Willingdon हॉस्पिटल की एक नर्स को भगा लाया ,जो दिल्ली के कनाट प्लेस में रहती थी .यही नहीं इसने पूर्व राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के फर्जी हस्ताक्षर बनाकर रेलवे में नौकरी ले ली थी .बाद में सच्चाई सामने आने से नौकरी से निकाल दिया था .उसके इन्हीं गुणों के कारण दिग्विजय ने उसे महत्वपूर्ण पद दिया था .और उसे पसंद करता था .
7 -सदरुद्दीन अंसारी .दिग्विजय ने इसे Vice President बना दिया था .यह कांग्रेस में होकर भी "जमाअतुल उलमा "का भी उपाध्यक्ष था. उसका लड़का निजामुद्दीन अंसारी कुख्यात अपराधी था .और भोपाल में उसपर कई मुकदमे दर्ज हैं .सन 1985 में इसी ने अपने लोगों के साथ मंदसौर में दंगे करवाए थे.
यह तो थोड़े से नमूने हैं जो विस्तार भय से लिखे हैं .उपलब्ध फाइलों में ऐसे बहुत प्रमाण हैं ,जिससे दिग्विजय के अपराधियों के साठगाँठ होने के सबूतहै .
आज भले दिग्विजय राहुल को प्रधान मंत्री बनाने की बातें करके , सोनिया की चापलूसी कर रहा है और खुद को इंदिरा और सोनिया का भक्त बता रहा है .लेकिन दिग्विजय के ईमान का कोई भरोसा नहीं है .इसके सबूत के लिए रायपुर से प्रकाशित अखबार की हेडिंग का हवाला दिया जा रहा है .
"प्रदेश के वरिष्ठ नेता ,रोकते रहे ,और कहा कि इंदिरा और राजीव को गालियाँ देने वालों को जिम्मेदारी देना मेरी भूल है .इंदिरा" को अंतर्राष्ट्रीय वेश्या ",और सोनिया को "फ़ोरेन माल "कहने वाले प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारी "देशबंधु रायपुर .30 अगस्त 1992 ).
(नोट -दिग्विजय के भक्त कांग्रेसी विचार करें !!)
दिग्विजय सिंह सम्बन्धी इन तीनों लेखों को पढ़ने वाले सभी पाठको से अनुरोध है कि ,यह जानकारी मुझे कांग्रेस के एक निष्ठावान और वरिष्ठ पदाधिकारी ने दी है .जिसमे कुछ अखबारों से कुछ कांग्रेस दफ्तर की फाइलों से ली गयी है .आज भी यह व्यक्ति कांग्रेस के प्रति समर्पित हैं .लेकिन उन्हों ने दिग्विजय कि जनविरोधी नीतियों का विरोध किया था ,और दिग्विजय को सचेत किया था .उनकी बात न मानने के कारण मध्य प्रदेश से कांग्रेस का सफाया हो गया था.इनके पास इतने सबूत हैं जिस से सोनिया भी फस सकती है ,दिग्विजय क्या चीज है .मैंने वह फायलें खुद देखी है .उनका परिचय इस प्रकार है -
R.M.Bhatanagar
Ex.Chairman (Minister staus),ExOffice Secratary,(1978-1993) Secretary cum Personnel Officer,
34.Good Shefard Colony,Banjari Chauraha Kolar Road-BHOPAL.M.P.


चूँकि उनपर दो बार हमला हो चूका है वह अपना मोबाईल नंबर नहीं दे रहे हैं .इन लेखों के बाद उन्होंने अपनी तरफ से यह भी लिखने को कहा है जो उन्होंने अखबारों को पहले भी लिख दिया था."सत्यापन -मैं शपथ पूर्वक सत्यापत करता हूँ कि उल्लेखित जानकारी मेरे निजी ज्ञान तथा उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सत्य है "
अब जिसे चाहिए उन से संपर्क करे .या मेरे मेल से सूचित करे .Em-satyawadi44@gmail.com






प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 9:32 PM 9 टिप्पणियाँ
लेबल: दिग्विजय
Wednesday, June 29, 2011
दिग्विजय सिंह का पर्दाफाश !

दिग्विजय सिंह की हालत उस व्यक्ति की तरह है जो खुद तो मल मूत्र के गड्ढे में पड़ा हो और दूसरों के साफ़ कपड़ों में दाग तलाश करता हो .आज दिग्विजय हरेक के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहा है.और खुद को भ्रस्ताचार से मुक्त होनेका ढिढोरा पीट रहा है .एक समय यही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार को ,जरूरी ,और जायज कहता था.यही नहीं भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा दिलवाने की वकालत भी करता था.दिग्विजय ने अपने मंत्री मंडल में ऐसे लोग भर लिए थे जो भ्रस्ताचार को उचित मानते थे .दिग्विजय ने कहा था कि"वर्त्तमान राजनीतिक व्यवस्था में हमें भ्रष्टाचार कि परिभाषा बदलनी होगी .मैं जो भी करता हूँ पार्टी के लिए करता हूँ "(राज्य की नई दुनिया .भोपाल 28 फरवरी 2001 )
यही नहीं सोनिया भी दिग्विजय के इन विचारों का समर्थन करती थी. 14 दिसंबर 1998 को राष्ट्रीय सम्मलेन मेंप्रदेश के गृहमंत्री हरबंस सिंह ने सोनिया से कहा कि मैं मुख्य मंत्री के आदेश से पार्टी के लिए धन जमा कर रहा हूँ .सोनिया ने उसकी तारीफ कि थी (नव भारत भोपाल 15 दिसंबर 1998 )उसके बाद सन 1990 से 1993 तक दिग्विजय के आदेश से हरबंस सिंह ने 100 -100 रुपये के कूपन बेच कर लोगों से रुपये वसूले .और लाखों रूपया इकठे किये .लेकिन रूपया पार्टी के खाते में जमा करने कि जगह जेब में रख लिए .यहांतक कांग्रस कार्यालय के खर्चे के लिए बहार से कर्जा लेना पड़ा था. (हिन्दुस्तान टाइम्स नई दिल्ली .7 मार्च 1993 )
दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में जो घोटाले ,गबन ,आर्थिक अनियमितताएं हुई थी ,उनके बारे में महा लेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्र्ट में कहा था कि प्रतिमाह लगभग 70 लाख की हेराफेरी मुख्य मंत्री द्वारा कि गयी है .जिसकी पुष्टि समाचारों ने भी की है .जैसे -
1 -मध्य प्रदेश की तेरह सिंचाई परियोजनाओं में सब अदूरी हैं ,एक हेक्टर जमीं भी सिंचित नहीं हुई ,24 अरब रूपया खर्च होने पर सिर्फ 12 हेक्टर जमीन सिंचित हुई .(नव भारत 4 जून 2000 ) सिंचाई योजना में घोटाला .(नव भारत 17 जुलाई 1999 )
2 -राजिव गांधीराष्ट्रीय पेयजल मिशन के तहत 15400 ग्रामीण बसाहटों में केवल 90 बसाहटों में पानी की व्यवस्था हो सकी .याकि कुल 8 .5 %काम किया गया .बाकी रूपया हड़प लिया गया. (नव भारत .भोपाल 18 जुलाई 1999 )
3 -घोटालों के कारण कुएं भी क्म खुदे और मकान भी क्म बने .(नव भारत .7 मई 1999 )
4 -मास्टर रोल घोटाले के दोषियों को बहाल कर दिया गया .(नव भारत 4 मई 1999 )
5 -करोंड़ों के सड़क घोटाला करने वाले निलंबित अफसरों को मुख्य मंत्री ने राजनीतिक दवाब के कारण काम पर ले लिया .और उनपर कार्यवाही रोक दी (दैनिक भास्कर .8 मई 1999 )
इसके अलावा दिग्विजय ने अपने पद का नाजायज दुरपयोग करते हुए .अपने परिवार के लोगों ,रिश्तेदारों ,और हितेषियो को जो लाभ पहुँचाया और सरकारी धन को हड़प किया था .उसकी जानकारी दिग्विजय की गुप्त रिपोर्ट में से हमें मिली है .इस रिपोर्ट के अनुसार -
1 -दिग्विजय्ने मुख्य मंत्री रहते हुए अपनी पत्नी ,अपनी नाबालिग पुत्री मंदाकिनी (आयु 12 साल )मृणालिनी (आयु 9 साल )और हरीश चंडोक और बलभद्र के नाम से एक फर्जी कंपनी बनायीं जिसका नाम "Gwalior Coal "था और इस फर्जी कंपनी के नाम पर करोड़ों रूपया लोन लिया था .और रूपया हड़प करके कंपनी बंद कर दी थी .
2 -संजय सागर Forest Cultivation Project चला कर जमीनों पर कब्ज़ा करके करोड़ों रुपये कमाए .
3 -दिग्विजय अपने गाँव राघौगढ़ और उसके किले को अपनी जायदाद मानता है .इसलिए उसने किले की चट्टानों को कटवा कर .और पहाड़ी के टीलों को खुदवा कर पत्थर मिटटी बिकवा कर करोड़ों रूपया अपनी जेब में डाल लिया .और कोई टेक्स नहीं दिया.
4 -दिग्विजय और उसके छोटे भी लक्षमण ने एक गुजरात के व्यवसायी दिनेश पटेल और रणछोड़ सिंह पटेल के साथ मिलकर एक फर्जी कंपनी बनायी .जिसका नाम "Maruti Limited "था इस कंपनी के बहाने दिग्विजय ने राघौगढ़ की ज़मीन और जंगल पर कब्ज़ा कर लिया.और जमीनों को बेचकर रूपया कमाया .बाद में इस फर्जी कंपनी के नाम पर State Bank विजयपुर की ब्रांच अपने प्रभाव से से कर्जा भी दिलवा दिया .यह फर्जी कंपनी गुना स्थित Fertiliser Plant के प्रबंधकों पर ठेका देने पर दवाब देने लगी .लेकिन गुना फर्टीलाइजर प्रबंधकों ने जन मन कर दिया तो दिग्विजय के गुंडे मारा पीटी और तोड़फोड़ करने लगे .जिस से कई लोग जख्मी हो गए .गुना थाने में दिग्विजय के लोगों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर भी दर्ज है .केस संख्या .63 /84 धारा 379
5 -अपने भी के नाम पर गुना में एक सोयाबीन का प्लांट लगाने के बहाने बैंक से आठ लाख रूपया लोन लिया ,और कोई प्लांट नहीं बनाया .सारा रूपया हड़प कर गया.
6 -अपने गाँव राघौ गढ़ में अपने महल में कारपेट बनाने की कंपनी के बहाने सरकार से सब्सिडी लेकर रूपया जेब में भर लिया .कोई कंपनी नहीं बनायी .
7 -दिग्विजय ने एक गरीब कोटवार (एक पिछड़ी जाति) की जमीन पर अवैध कब्ज़ा कर लिया .और उसकी ज़मीन पर Stone Crusher लगा दिया फिर पांच Dumper के लिए लोन ले लिया .और रूपया हड़प कर लिया.
8 -गुना में श्वेत क्रान्ति के बहाने अपने एक रिश्तेदार के नाम से डेयरी बना दी और बैंक से 8 लाख रूपया लोन ले लिया .लेकिन डेयरी नहीं बनवाई और रूपया हड़प कर गया .
यह तो कुछ थोड़े से ही नमूने हैं ,जो उन फाइलों से जल्दी जल्दी निकले जा सके हैं .दिग्विजय के भ्रष्टाचार के और भी सबूत है ,जो किसी समर्थ और सक्षम व्यक्ति को दिए जा सकते हैं ,जो दिग्विजय का सामना करने को तय्यार हो .ऐसी करीब 30 -40 फाइलें हैं
मेरा सिर्फ यही कहना है की भ्रष्टाचार कैसा भी हो अपराध होता है .चाहे एक हजार का हो ,चाहे एक करोड़ का .यदि कोई संगठन व्यवस्था करा सके तो उन महोदय का टी वी पर दिग्विजय से मुकाबला करवा दिया जा सकता है .
मेरा कांग्रेसियों से अनुरोध है कि दिग्विजय से सावधान रहें ,यह किसी का सगा नहीं है .आज यह जिस राहुल की तारीफ़ में ज़मीन असमान एक कर रहा है .एक दिन उसी राहुल के लिए संकट पैदा कर देगा.
आप लोग भी इस लेख को अपने मित्रों तक भेजने का कष्ट करें .इस विषय के अंतिम एपिसोड में मैं उन महोदय का परिचय भी दूंगा जिन से औरभी जानकारियाँ मिल सकती हैं .तब तक आप तीसरे एपिसोड की प्रतीक्षा करें









प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 4:30 PM 7 टिप्पणियाँ
लेबल: दिग्विजय
Tuesday, June 28, 2011
दिग्विजय सिंह बेनकाब !

दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी राजा अपने हिन्दू विरोधी विचारों ,और बेतुके बयानों के लिए जाने जाते हैं .सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि दिग्गी को सभी हिन्दू संगठनों से घोर एलर्जी है .चाहे वह आर एस एस हो या बी जे पी .चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे .दिग्गी कि नजर में वे सब लोग आतंकवादी और भ्रष्ट हैं ,जो भ्रष्टाचार का विरोध करता हो .लोग यह भी जानते हैं कि दिग्गी ने मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री की कुर्सी फिर से हथियाने के लिए चापलूसी और खुशामदखोरी की हदें पर कर दी हैं .
अपनी इसी स्वामीभक्ति के कारण वह पार्टी के महामंत्री और उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी बनाये गए है .कान्ग्रेसिओं की नजर में दिग्गी एक वरिष्ठ .निष्ठावान ,और पार्टी के प्रति समर्पित नेता हैं .
लेकिन यदि कोई यह कहे कि दस सालतक मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रहते हुए ,दिग्गी ने खुद कांग्रस को चूना लगाया ,भोपाल स्थित कांग्रेस के कार्यालय "जवाहर भवन 'को फर्जी ट्रस्ट बनाकर अपने क़ब्जे में कर लिया ,भवन से लगी हुई दुकानों का किराया हड़प कर लिया ,अदालत में झूठा शपथ पत्र दिया ,अपने लोगों को फर्जी कंपनिया बना कर रुपयों का घोटाला किया ,पार्टी में अपराधियों को संरक्षण दिया .तो कांग्रेसी ऐसा कहने वाले को फ़ौरन आर एस एस का आदमी कह देंगे ,और अगर कोई यह कहे कि दिग्विजय सिंह सार्वजनिक रूप से इंदिरा गाँधी को "राजनीतिक वेश्या "और सोनिया को "फोरेन"यानी विदेशी कहता था ,तो कांग्रेसी उस व्यक्ति को बाबा रामदेव ,या अन्ना हजारे का चमचा कह देंगे .
लेकिन यह सब आरोप किसी संघी या बाबा रामदेव के आदमी ने नहीं ,बल्कि मध्य प्रदेश कांगेस पार्टी के चेयर मेन Chairman ने लगाये हैं जो सन 1978 से 1993 तक पार्टी में बने रहे .और उनको Minister Status का दर्जा प्राप्त था .यही नहीं ,यह व्यक्ति राजीव गांधी के काफी निकट थे .इनके कार्यकाल में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह एम् .पी में मुख्य मंत्री रहे .इन महोदय का नाम श्री आर. एम् .भटनागर है .आज इनकी आयु 76 के लगभग है .भटनागर जी ने दिग्विजय पर जो भी आरोप लगाये हैं .वह उन्होंने शपथ पूर्वक बताये हैं .जिनकी पुष्टि ,अखबारों ,विधानसभा के रिकार्ड ,और प्रमाणिक गुप्त दस्तावेजों से होती है .यही श्री भटनागर ने इसकी सूचना Top Secret पत्र दिनांक 9 अगस्त 1998 और दिनांक 29 सितम्बर 2001 को सोनिया को देदी थी .यह खबर इंदौर से साप्ताहिक "स्पुतनिक "ने अपने अंक 42 वर्ष 47 औरदिनांक 31 जनवरी -6 फरवरी के अखबार में विस्तार में छापी थी .,
अब हम दिग्विजय के कुछ कारनामों का सप्रमाण एक एक करके भंडा फोड़ेंगे जैसे 1 .जवाहर भवन की संपत्ति हड़प करना ,2 .अपने लोगों को नाजायज फायदा पंहुचाना ,3 .अपराधियों को संरक्षण देना ,4 इंदिरा गाँधी के लिए वेश्या कहना .
1 -जवाहर भवन की संपत्ति गबन करना
दिग्विजय सिंह ने पहला घोटाला कांग्रेस की सम्पति को हड़प करने का किया था .सन 2006 से पूर्व म.प्र काग्रेस कमेटी का मुख्य कार्यालय लोक निर्माण विभाग के एक शेड में कहता था. बादमे मद्य प्रदेश कांग्रेस कमिटी को अपना भवन बनाने हेतु म.प्र. आवास और पर्यावरण विभाग ने आदेश क्र. 3308 /4239 दिनांक 30 /11 /74 और पुनर्स्थापित आदेश दिनांक 30 अगस्त 1980 तथा आदेश दिनांक 20 /11 81 द्वारा रोशन पूरा भोपाल के नुजूल शीट क्रमांक 3 प्लाट 7 में 5140 वर्ग फुट जमीं बिना प्रीमियम के एक रूपया वार्षिक भूभाट लेकर स्थायी पट्टे पर आवंटित कर दिया था .और उस भूखंड का विधिवत कब्ज़ा कांग्रस कमिटी को नुजूल से लेकर 23 /11 81 को सौप दिया .भवन निर्माण हेतु सदस्यों और किरायेदारों से जो रुपया जमा हुआ उस से तीन मंजली ईमारत बनायीं गयी .जिसमे दो बड़े हाल और साथ में 59 दुकानें भी थीं .इस भवन का नाम "जवाहर भवन शोपिंग कोम्प्लेक्स "रखा गया. इस भवन की भूमि पूजा तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह ने 16 अगस्त 1984 को की थी.और उद्घाटन राजीव गाँधी ने किया था. निर्माण हेतु सदस्यों के चंदे से 29 .84 लाख और किराये से 66 .78 लाख जमा हुए थे. और कराए की राशी से पार्टी का खर्च चलने की बात कही गयी थी .
बबाद में दिग्विजय सिंह ने 19 /12 /85 को एक फर्जी ट्रस्ट बनाकर उस भवन पर कब्ज़ा कर लिया .यद्यपि उस ट्रस्ट का नाम "कांग्रेस कमिटी ट्रस्ट "था लेकिन उसका कांग्रेस से कोई सम्बन्ध नहीं था .दिग्विजय ने अनुभागीय अधिकारी (तहसीलदार )के समक्ष शपथपत्र देकर कहा की यह ट्रस्ट पुण्यार्थ है. और जवाहर भवन की सारी चल अचल सम्पति इसी ट्रस्ट की है .इस तरह कांग्रस दिग्विजय की किरायेदार बन गई .देखिये
(देशबंधु दिनांक 6 दिसंबर 1998 ) दिग्विजय ने उस ट्रस्ट का खुद को अध्यक्ष बना दिया .उक्त ट्रस्ट में निम्न पदाधिकारी थे.
अध्यक्ष -दिग्विजयसिंह पुत्र बलभद्र सिंह 2 .मोतीलाल वोरा ट्रस्टी 3 .जगत पाल सिंह मेनेजिंग ट्रस्टी .
इस ट्रस्ट के विरुद्ध न्यायालय अनुभागीय अधिकारी तहसील हुजुर भोपाल में एक जनहित याचिका भी दर्ज कीगयी थी. जो प्रकरण संख्या 04 बी -113 /85 -86 दिनांक 12 जुलाई 88 में दर्ज हुआ था. बाद में यह मामला श्री आर .एम् .भटनागर ने विधान सभा में भी उठवाया.म.प्र. विधान सभा के प्रश्न संख्या 9 (क्रमांक 579 )दिनांक 23 फरवरी 96 को उक्त ट्रस्ट के बारे में श्री करण सिंह ने यह सवाल किया था .क्या राज्यमंत्री धार्मिक न्यास यह बताने का कष्ट करेंगे की इस ट्रस्ट के पंजीयन के समय तक कितनी बार ट्रस्टियों के नाम बदले गए हैं ?जैसा की भटनागर ने 24 दिसंबर 98 को प्रश्न किया था .और पंजीयक से शिकायत की थी ?
इस पर विधान सभा में राज्यमंत्री धार्मिक न्यास श्री धनेन्द्र साहू ने उत्तर दिया था कि अबतक उक्त ट्रस्ट के ट्रस्टी चार बार बदले गए हैं और ट्रस्ट के भवन कि दुकाने पट्टे पर नहीं बल्कि किराये पर दी गयीं है. और इसकी अनुमति भी नहीं ली गयी थी .यही नहीं उक्त ट्रस्ट कि औडिट रिपोर्ट भी 31 मार्च 2000 तक नहीं दी गयी है .
इसके बाद दिग्विजय सिंह ने दुकानों से प्राप्त कराए क़ी पार्टी को न देकर अपने निजी काम में लगाना सुरु कर दिया .जिसकी खबर इंदौर से प्रकाशित "Free Press Journal "ने दिनांक 5 नवम्बर 1986 को इस हेडिंग से प्रकाशित की थी."Digvijay accused of misusing party funds "
श्री भटनागर ने बताया कि जवाहर भवन की 59 दुकानों से मिलाने वाले किराये से प्रति माह दो तीन लाख रुपये कि जगह सिर्फ मुश्किल 65000 /- ही जमा होते थे .इस प्रकार अकेले 10 सालों में करोड़ों का घपला किया गया है. उक्त ट्रस्ट का खाता पंजाब नॅशनल बैंक की भोपाल टी .टी. नगर ब्रांच में थी .जिसका खता नुम्बर 19371 है. खाते से पता चला कि 1 अप्रेल 2001 से 26 मार्च 2003 तक ट्रस्ट से "एक करोड़ ,इक्कीस लाख ,एक हजार छे सौ उनचास "रुपये नकले गए थे. जिसमे सेल्फ के नाम से 162739 /- दिग्विजय ने निकला था .बैंक का लोकर भी थी .जिसमे कई मूल्यवान वस्तुएं भी थी जो भेंट में मिली थी .असके आलावा नकद राशी भी थी .भटनागर ने बताया कि उस समय खाते में ग्यारह करोड़ राशी थी .लोकर कि दो चाभियाँ थी .एक जगतपाल सिह के पास ,और दूसरी दिग्विजय के पास थी .जब जगतपाल कि मौत होजाने के बाद लोकर खोला गया तो उसकी कीमती चीजे गायब थी .और खाते से 9 करोड़ रुपयों का कोई हिसाब नहीं मिला,देखिये साप्ताहिक पत्र इंदौर से प्रकाशित"स्पुतनिक "दिनांक 31 जनवरी 2005 .
इसी पत्र में yah भी लिखा है कि दिग्विजय से ट्रस्ट से सेल्फ के नाम से 65000 /- निकाला था .और अपने मित्र राधा किशन मालवीय को स्कोर्पियो खरीदने को दिया था .बाद में उस गाड़ी को को शाजापुर में दुर्घटना ग्रस्त बता दिया था.आज भी जवाहर भवन दिग्विजय के कब्जे में है .श्री भटनागर ने इसकी शिकायत सोनिया को 31 जनवरी 2005 लिखित में शपथ पूर्वक कर दी थी .और मांग कि थी कि दिग्विजय से कांग्रेस की सम्पति वापस करवाई जाये .और उसे राजनीतिक सन्यास पर भेज दिया जाये .
वास्तव में दिग्विजय ऐसा व्यक्ति है जिसने खुद कांग्रेस को चूना लगाकर करोड़ों रुपये हड़प लिए .मेरे पास कई सबूत हैं .यदि कोई मित्र यह जानकारी बाबा राम देव या अन्ना हजारे तक पहुंचा दे तो यह दस्तावेज उनको भेजे जा सकते है .
अगले एपिसोड में दिग्विजय के आर्थिक घोटालों का भंडा फोड़ किया जायेगा .आप अवश्य पढ़िए .!



Saturday, June 18, 2011
दिग्गीराजा की शतरंजी चाल !

http://bhandafodu.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE

आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो दिग्विजय सिंह और उसके हिन्दू विरोधी बेतुके बयानों के बारे में नहीं जनता होगा .द्प्ग्विजय को लोग दिग्गी राजा के नाम से भी पुकारते हैं .दिग्गी राजनीति में घाघ ,कुटिल ,और दावपेचों में निपुण है .एक बार उसने कहा था कि मई आजतक चुनाव वोटों से नहीं ,बल्कि मेनेजमेंट से जीतता आया हूँ .अगर हम दिग्गी को राजनीति का कीड़ा कहें तो गलत नहीं होगा .आज दिग्गी कि नजर फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है .
कहावत है कि यदि किसी को रिवोल्वर का लाइसेंस चाहिए उसे तोप का लाइसेंस मांगना चाहिए .इसी लिए दिग्गी राहुल को प्रधानमंत्री बनवाना चाहता है .और राहुल उर्फ़ Raul Vinci गन्दी को हर तरह से योग्य साबित करने की जुगाड़ लगा रहा है .सही है इतने समय में राहुल ने वह सब गुण हासिल कर लिए हैं ,जो एक सच्चे कांग्रेसी में होना चाहिए .दिग्गी के अनुसार राहुल चरित्रवान है ,कुंवारा युवक है ,उसके पास कालाधन नहीं है .और हर तरह से बेदाग है .
हम भी यही कहते हैं ,लेकिन कुछ दुष्ट झूठे लोग राहुल के बारे में कुछ और बताते है -जैसे

1 -राहुल चरित्रवान है !
राहुल गन्दी का चरित्र इतनी उच्च कोटि का है ,कि जब अमेठी के एक कांग्रेसी बलदेव सिंह की लड़की "सुकन्या "राहुल के दर्शन करने वहां के रेस्ट हाउस में गयी ,तो राहुल और उसके विदेशी दोस्तों ने उसकी पूजा की थी .लोग सामूहिक बलात्कार की झूठी बातें करते है .तब से सुकन्या और उसकी माँ स्मिता देवी जमीन में समा गए .कि उन्होंने राहुल जैसे महान व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगाया था .जिसने भी यह घटना इस साईट में दी है वह जरुर आर एस एस का आदमी होगा .आओ इस साईट को खोल कर देखिये -

http://www.scribd.com/doc/45330117/rahul

2 -राहुल भ्रष्टाचार से मुक्त है !
इसी तरह यह बात भी झूठ और निराधार है ,कि राहुल के पास काला धन है उसके पास तो खाने को भी रुपये नहीं है ,बेचारा इतना भोला है कि ,अपनी माँ के बाप का और नानी का नाम भी नहीं जनता ,ऐसा व्यक्ति ही देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए राहुल कि .जो भी बेनामी संपत्ति इस साईट में बताई गयी हैं सब संघ वालों का षडयंत्र है .अप इस लिंक को पढ़कर संघ को गालियाँ जरुर दीजिये !

http://www.haindavakeralam.com/HKPage.aspx?PageID=12594

3 -युवक है ,कुंवारा है
कुछ लोगों कि आदत होती है कि,किसी सीधे साधे युवक पर अनर्गल आक्षेप लगाते रहते हैं .जो लोग कहते है कि राहुल ने वेरोनिका नामकी स्पेनिश लड़की से गुप्त रूप से शादी कर ली है .और हनी मून भी केरल में मन लिया है ,वे लोग जरुर बाबा रामदेव के चमचे हैं .या बी जे पी के लोग है .यह साईट किसी हिन्दू आतंकी ने बनाई है .लोग अंधे जो यह नहीं जानते कि राहुल ब्रह्मचारी है .अब इस साईट के बारे में हम क्या करें ?

http://planet6oclock.com/planet6oclock/content/rahul-gandhis-spanish-girlfriend-veronica-images-video

4 -राहुल के पास कालाधन नहीं है
हम चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं ,कि राहुल के पास एक रूपया भी बेनामी नहीं है .अप तलाश कर के देख लो सिर्फ एक चवन्नी होगी .को गांधी बाबा ने अपने लिए कांग्रेस कि सदस्यता के लिए रख ली थी .शायद वही राहुल के पास होगी .अब इन कलमुहे लोगों को क्या कहे जो कहते है कि ,राहुल के पास अरबों की सम्पति है .जिसे निकालने के लिए कई रामदेव और कई अन्ना हजारे लग जायेंगे .फिर भी अप इस साईट को देखिये ताकि बाबा का मुंह बंद हो सके .आर एस एस की यह खुराफात लगती !

http://karsewak.blogspot.com/2007/01/rahul-gandu-his-gf-making-money-in.html

5-राहुल बेदाग है
लगता है कि,अमेरिका की पुलिस दारु के नशे में रहती है ,जभी तो उसने राहुल गाँधी को अवैध रूप से डालर लेजाते हुए गिरफ्तार कर लिया .बिचारी मम्मी सोनिया को अटल बिहारी जैसे संघी से राहुल को छुड़वाने के लिए पैर पड़ना पड़ा .ऍफ़ बी आई को पता नहीं था कि आगे यही स्मगलर भारत का प्रधानमंत्री बनेगा .और अमेरिका से हाथ फैला फैला कर कर्जा मांगता रहेगा .कि अमेरिका कंगाल हो जाएगी .अगर ऐसा भारत में हुआ होता तो कांग्रेसी उन पुलिस वालों को संघ के लोग बताकर तिहाड़ में ठूंस देते .राहुल तो पैदायशी बेदाग है .जिस ने यह साईट बनाई है ,उसे अपने दिमाग का इलाज करवा लेना चाहिए .हम तो फिर भी राहुल को प्रधानमंत्री बनवा कर रहेंगे ,चाहे देश जाये गड्ढे में !

http://planet6oclock.com/planet6oclock/content/rahul-gandhi-fbi-news-was-rahul-gandhi-arrested-or-detained-usa-2011

बेचारे दिग्गी क्या करें ?उनकी नजर में राहुल द्वारा टुकड़ों पर है .शायद फिर से राहुल खैरात में मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवा रहे .असल में डौगी विजय अपनी नस्ल का नाम कर रहे है ,वह है पूंछ हिलाना ,और दूसरों पर भौंकते रहना .वह अपना कम करे ,हम अपना काम करंगे !!
दिग्गी राजा के बारे में और जानकारी अगली पोस्ट में देंगे ,जरूर पढ़िए !

नेहरू-गाँधी राजवंश (?









Wednesday 18 April 2007
नेहरू-गाँधी राजवंश (?)



http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/04/blog-post_18.html

आजकल जबसे "बबुआ" राहुल गाँधी ने राजनीति में आकर अपने बयान देना शुरू कर दिया है, तब से "नेहरू राजवंश" नामक शब्द बार-बार आ रहा है । नेहरू राजवंश अर्थात Nehru Dynasty... इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में विभिन्न साईटों और ग्रुप्स में बहुत चर्चा हुई है....बहुत दिनों से सोच रहा था कि इसका हिन्दी में अनुवाद करूँ या नहीं, गूगल बाबा पर भी खोजा, लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद कहीं नहीं मिला, इसलिये फ़िर सोचा कि हिन्दी के पाठकों को इन महत्वपूर्ण सूचनाओं से महरूम क्यों रखा जाये. यह जानकारियाँ यहाँ, यहाँ तथा और भी कई जगहों पर उपलब्ध हैं मुख्य समस्या थी कि इसे कैसे संयोजित करूँ, क्योंकि सामग्री बहुत ज्यादा है और टुकडों-टुकडों में है, फ़िर भी मैने कोशिश की है इसका सही अनुवाद करने की और उसे तारतम्यता के साथ पठनीय बनाने की...जाहिर है कि यह सारी सामग्री अनुवाद भर है, इसमें मेरा सिर्फ़ यही योगदान है... हालांकि मैने लगभग सभी सन्दर्भों (references) का उल्लेख करने की कोशिश की है, ताकि लोग इसे वहाँ जाकर अंग्रेजी में पढ सकें, लेकिन हिन्दी में पढने का मजा कुछ और ही है... बाकी सब पाठकों की मर्जी...हजारों-हजार पाठकों ने इसे अंग्रेजी में पढ ही रखा होगा, लेकिन जो नहीं पढ़ पाये हैं और वह भी हिन्दी में, तो उनके लिये यह पेश है...


"नेहरू-गाँधी राजवंश (?) की असलियत"...इसको पढने से हमें यह समझ में आता है कि कैसे सत्ता शिखरों पर सडाँध फ़ैली हुई है और इतिहास को कैसे तोडा-मरोडा जा सकता है, कैसे आम जनता को सत्य से वंचित रखा जा सकता है । हम इतिहास के बारे में उतना ही जानते हैं जितना कि वह हमें सत्ताधीशों द्वारा बताया जाता है, समझाया जाता है (बल्कि कहना चाहिये पीढी-दर-पीढी गले उतारा जाता है) । फ़िर एक समय आता है जब हम उसे ही सच समझने लगते हैं क्योंकि वाद-विवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं छोडी जाती । हमारे वामपंथी मित्र इस मामले में बडे़ पहुँचे हुए उस्ताद हैं, यह उनसे सीखना चाहिये कि कैसे किताबों में फ़ेरबदल करके अपनी विचारधारा को कच्चे दिमागों पर थोपा जाये, कैसे जेएनयू और आईसीएचआर जैसी संस्थाओं पर कब्जा करके वहाँ फ़र्जी विद्वान भरे जायें और अपना मनचाहा इतिहास लिखवाया जाये..कैसे मीडिया में अपने आदमी भरे जायें और हिन्दुत्व, भारत, भारतीय संस्कृति को गरियाया जाये...ताकि लोगों को असली और सच्ची बात कभी पता ही ना चले... हम और आप तो इस खेल में कहीं भी नहीं हैं, एक पुर्जे मात्र हैं जिसकी कोई अहमियत नहीं (सिवाय एक ब्लोग लिखने और भूल जाने के)...तो किस्सा-ए-गाँधी परिवार शुरु होता है साहेबान...शुरुआत होती है "गंगाधर" (गंगाधर नेहरू नहीं), यानी मोतीलाल नेहरू के पिता से । नेहरू उपनाम बाद में मोतीलाल ने खुद लगा लिया था, जिसका शाब्दिक अर्थ था "नहर वाले", वरना तो उनका नाम होना चाहिये था "मोतीलाल धर", लेकिन जैसा कि इस खानदान की नाम बदलने की आदत थी उसी के मुताबिक उन्होंने यह किया । रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज की किताब "ए लैम्प फ़ॉर इंडिया - द स्टोरी ऑफ़ मदाम पंडित" में उस तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा है, जिसके अनुसार गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान था, जिसका असली नाम गयासुद्दीन गाजी था. लोग सोचेंगे कि यह खोज कैसे हुई ?

दरअसल नेहरू ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफ़र के समय) में नगर कोतवाल थे. अब इतिहासकारों ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफ़र के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था..और खोजबीन पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला (मेहदी हुसैन की पुस्तक : बहादुरशाह जफ़र और १८५७ का गदर, १९८७ की आवृत्ति), रिकॉर्ड मिलता भी कैसे, क्योंकि गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था "गयासुद्दीन गाजी" । जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था,तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था (जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं), अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे, जो हिन्दू राजाओं (पृथ्वीराज चौहान ने) ने मुसलमान आक्रांताओं को जीवित छोडकर की थी, इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया, लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाकों मे चले गये थे । उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ़ कूच कर गया...हमने यह कैसे जाना ? नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोक कर पूछताछ की थी, लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं, बल्कि कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया... बाकी तो इतिहास है ही । यह "धर" उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है, और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह "दर" या "डार" हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है । लेकिन मोतीलाल ने नेहरू नाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे । इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ़ यही है कि हमें पता चले कि "खानदानी" लोग क्या होते हैं । कहा जाता है कि आदमी और घोडे़ को उसकी नस्ल से पहचानना चाहिये, प्रत्येक व्यक्ति और घोडा अपनी नस्लीय विशेषताओं के हिसाब से ही व्यवहार करता है, संस्कार उसमें थोडा सा बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उसका मूल स्वभाव आसानी से बदलता नहीं है.... फ़िलहाल गाँधी-नेहरू परिवार पर फ़ोकस...


अपनी पुस्तक "द नेहरू डायनेस्टी" में लेखक के.एन.राव (यहाँ उपलब्ध है) लिखते हैं....ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल की एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का नाम था, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी । कमला शुरु से ही इन्दिरा के फ़िरोज से विवाह के खिलाफ़ थीं... क्यों ? यह हमें नहीं बताया जाता...लेकिन यह फ़िरोज गाँधी कौन थे ? फ़िरोज उस व्यापारी के बेटे थे, जो "आनन्द भवन" में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था...नाम... बताता हूँ.... पहले आनन्द भवन के बारे में थोडा सा... आनन्द भवन का असली नाम था "इशरत मंजिल" और उसके मालिक थे मुबारक अली... मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक अली के यहाँ काम करते थे...खैर...हममें से सभी जानते हैं कि राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं... और अधिकतर परिवारों में दादा और पिता का नाम ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, बजाय नाना या मामा के... तो फ़िर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था.... किसी को मालूम है ? नहीं ना... ऐसा इसलिये है, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब खान, एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाय करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में... नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया... फ़िरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था "घांदी" (गाँधी नहीं)... घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था...विवाह से पहले फ़िरोज गाँधी ना होकर फ़िरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था...हमें बताया जाता है कि राजीव गाँधी पहले पारसी थे... यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है । इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं । शांति निकेतन में पढते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था... अब आप खुद ही सोचिये... एक तन्हा जवान लडकी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पडी़ हुई हों... थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी, और विपरीत लिंग की ओर क्यों ना आकर्षित होगी ? इसी बात का फ़ायदा फ़िरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फ़ुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली (नाम रखा "मैमूना बेगम") । नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए, लेकिन अब क्या किया जा सकता था...जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने ताबडतोड नेहरू को बुलाकर समझाया, राजनैतिक छवि की खातिर फ़िरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले.. यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये, बजाय धर्म बदलने के सिर्फ़ नाम बदला जाये... तो फ़िरोज खान (घांदी) बन गये फ़िरोज गाँधी । और विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक कहीं नहीं किया, और वे महात्मा भी कहलाये...खैर... उन दोनों (फ़िरोज और इन्दिरा) को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुनः वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया, ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक (?) का भ्रम बना रहे । इस बारे में नेहरू के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक "रेमेनिसेन्सेस ऑफ़ थे नेहरू एज" (पृष्ट ९४ पैरा २) (अब भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) में लिखते हैं कि "पता नहीं क्यों नेहरू ने सन १९४२ में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी, जबकि उस समय यह अवैधानिक था, कानूनी रूप से उसे "सिविल मैरिज" होना चाहिये था" । यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फ़िरोज अलग हो गये थे, हालाँकि तलाक नहीं हुआ था । फ़िरोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे, और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे । तंग आकर नेहरू ने फ़िरोज का "तीन मूर्ति भवन" मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फ़िरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बडी़ राहत मिली थी । १९६० में फ़िरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी, जबकि वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे । अपुष्ट सूत्रों, कुछ खोजी पत्रकारों और इन्दिरा गाँधी के फ़िरोज से अलगाव के कारण यह तथ्य भी स्थापित हुआ कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी (या श्रीमती फ़िरोज खान) का दूसरा बेटा अर्थात संजय गाँधी, फ़िरोज की सन्तान नहीं था, संजय गाँधी एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस का बेटा था । संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था, अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था । ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था (इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था) । अब संयोग पर संयोग देखिये... संजय गाँधी का विवाह "मेनका आनन्द" से हुआ... कहाँ... मोहम्मद यूनुस के घर पर (है ना आश्चर्य की बात)... मोहम्मद यूनुस की पुस्तक "पर्सन्स, पैशन्स एण्ड पोलिटिक्स" में बालक संजय का इस्लामी रीतिरिवाजों के मुताबिक खतना बताया गया है, हालांकि उसे "फ़िमोसिस" नामक बीमारी के कारण किया गया कृत्य बताया गया है, ताकि हम लोग (आम जनता) गाफ़िल रहें.... मेनका जो कि एक सिख लडकी थी, संजय की रंगरेलियों की वजह से गर्भवती हो गईं थीं और फ़िर मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी, फ़िर उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर "मानेका" किया गया, क्योंकि इन्दिरा गाँधी को "मेनका" नाम पसन्द नहीं था (यह इन्द्रसभा की नृत्यांगना टाईप का नाम लगता था), पसन्द तो मेनका, मोहम्मद यूनुस को भी नहीं थी क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम लडकी संजय के लिये देख रखी थी । फ़िर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं, क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ़ एक तौलिये में विज्ञापन किया था । आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गाँधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कृत्यों पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने की छूट दी । ऐसा प्रतीत होता है कि शायद संजय गाँधी को उसके असली पिता का नाम मालूम हो गया था और यही इन्दिरा की कमजोर नस थी, वरना क्या कारण था कि संजय के विशेष नसबन्दी अभियान (जिसका मुसलमानों ने भारी विरोध किया था) के दौरान उन्होंने चुप्पी साधे रखी, और संजय की मौत के तत्काल बाद काफ़ी समय तक वे एक चाभियों का गुच्छा खोजती रहीं थी, जबकि मोहम्मद यूनुस संजय की लाश पर दहाडें मार कर रोने वाले एकमात्र बाहरी व्यक्ति थे...। (संजय गाँधी के तीन अन्य मित्र कमलनाथ, अकबर अहमद डम्पी और विद्याचरण शुक्ल, ये चारों उन दिनों "चाण्डाल चौकडी" कहलाते थे... इनकी रंगरेलियों के किस्से तो बहुत मशहूर हो चुके हैं जैसे कि अंबिका सोनी और रुखसाना सुलताना [अभिनेत्री अमृता सिंह की माँ] के साथ इन लोगों की विशेष नजदीकियाँ....)एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ २०६ पर लिखते हैं - "१९४८ में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था । वह संस्कृत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृति की अच्छी जानकार थी । नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था, नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये । मथाई के शब्दों में - एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा, वह बहुत ही जवान, खूबसूरत और दिलकश थी - । एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये, नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया, और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं, किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर १९४९ में बेंगलूर के एक कॉन्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया । उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कॉन्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं, पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया ।

मथाई लिखते हैं - मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफ़ी कोशिश की, लेकिन कॉन्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस, जो कि एक विदेशी महिला थी, बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा.....लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कैथोलिक संस्कारों में बडा करूँ, चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो.... लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था.... खैर... हम बात कर रहे थे राजीव गाँधी की...जैसा कि हमें मालूम है राजीव गाँधी ने, तूरिन (इटली) की महिला सानिया माईनो से विवाह करने के लिये अपना तथाकथित पारसी धर्म छोडकर कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया था । राजीव गाँधी बन गये थे रोबेर्तो और उनके दो बच्चे हुए जिसमें से लडकी का नाम था "बियेन्का" और लडके का "रॉल" । बडी ही चालाकी से भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिये राजीव-सोनिया का हिन्दू रीतिरिवाजों से पुनर्विवाह करवाया गया और बच्चों का नाम "बियेन्का" से बदलकर प्रियंका और "रॉल" से बदलकर राहुल कर दिया गया... बेचारी भोली-भाली आम जनता !

प्रधानमन्त्री बनने के बाद राजीव गाँधी ने लन्दन की एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में अपने-आप को पारसी की सन्तान बताया था, जबकि पारसियों से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था, क्योंकि वे तो एक मुस्लिम की सन्तान थे जिसने नाम बदलकर पारसी उपनाम रख लिया था । हमें बताया गया है कि राजीव गाँधी केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक थे, यह अर्धसत्य है... ये तो सच है कि राजीव केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे, लेकिन उन्हें वहाँ से बिना किसी डिग्री के निकलना पडा था, क्योंकि वे लगातार तीन साल फ़ेल हो गये थे... लगभग यही हाल सानिया माईनो का था...हमें यही बताया गया है कि वे भी केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्नातक हैं... जबकि सच्चाई यह है कि सोनिया स्नातक हैं ही नहीं, वे केम्ब्रिज में पढने जरूर गईं थीं लेकिन केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में नहीं । सोनिया गाँधी केम्ब्रिज में अंग्रेजी सीखने का एक कोर्स करने गई थी, ना कि विश्वविद्यालय में (यह बात हाल ही में लोकसभा सचिवालय द्वारा माँगी गई जानकारी के तहत खुद सोनिया गाँधी ने मुहैया कराई है, उन्होंने बडे ही मासूम अन्दाज में कहा कि उन्होंने कब यह दावा किया था कि वे केम्ब्रिज की स्नातक हैं, अर्थात उनके चमचों ने यह बेपर की उडाई थी)। क्रूरता की हद तो यह थी कि राजीव का अन्तिम संस्कार हिन्दू रीतिरिवाजों के तहत किया गया, ना ही पारसी तरीके से ना ही मुस्लिम तरीके से । इसी नेहरू खानदान की भारत की जनता पूजा करती है, एक इटालियन महिला जिसकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह इस खानदान की बहू है आज देश की सबसे बडी पार्टी की कर्ताधर्ता है और "रॉल" को भारत का भविष्य बताया जा रहा है । मेनका गाँधी को विपक्षी पार्टियों द्वारा हाथोंहाथ इसीलिये लिया था कि वे नेहरू खानदान की बहू हैं, इसलिये नहीं कि वे कोई समाजसेवी या प्राणियों पर दया रखने वाली हैं....और यदि कोई सानिया माइनो की तुलना मदर टेरेसा या एनीबेसेण्ट से करता है तो उसकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है और हिन्दुस्तान की बदकिस्मती पर सिर धुनना ही होगा...

यह अनुवाद सिर्फ़ इसीलिये किया गया है कि जो बात बरसों पहले से ही अंग्रेजी में उपलब्ध है, उसे हिन्दी में भी अनुवादित भी होना चाहिये.... यह करने के पीछे उद्देश्य किसी का दिल दुखाना नहीं है, ना ही अपने चिठ्ठे की टीआरपी बढाने का है... हाँ यह स्वार्थ जरूर है कि यदि पाठकों को अनुवाद पसन्द आया तो इस क्षेत्र में भी हाथ आजमाया जाये और इस गरीब की झोली में थोडा़ सा नावां-पत्ता आ गिरे.... (नीले रंग से इटैलिक किये हुए शब्द मेरे हैं, बाकी सब अनुवाद है)
Posted by Suresh Chiplunkar at 3:43 PM


blog.sureshchiplunkar.com/2007/04/blog-post_18.html



Sunday 23 December 2007
सोनियाजी ऐसी भी क्या दुश्मनी!!!

Sonia Gandhi Amitabh Bachchan Rivalry

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/12/sonia-gandhi-amitabh-bachchan-rivalry.html
आमतौर पर एक सामाजिक मान्यता है कि भले ही आप किसी परिवार में मांगलिक अवसरों पर उपस्थित न हो सकें तो चलेगा, लेकिन उस परिवार की गमी में अवश्य शामिल होना चाहिये, चाहे उस परिवार से आपका कितना ही मनमुटाव क्यों ना हो... अमिताभ बच्चन की माँ अर्थात तेजी बच्चन के अन्तिम संस्कार में गाँधी परिवार का एक भी सदस्य मौजूद नहीं था, जबकि भैरोंसिंह शेखावत अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसमें शामिल हुए।

उल्लेखनीय है कि तेजी बच्चन एक संभ्रांत सिख परिवार की बेटी थीं, जिन्होंने अपने परिवार के भारी विरोध के बावजूद उस जमाने में एक कायस्थ से प्रेम विवाह किया। हालांकि उनके दबंग व्यक्तित्व को रेखांकित करने के लिये यही एक तथ्य काफ़ी है, लेकिन इसके भी परे उन्होंने अपने बच्चों अमिताभ और अजिताभ को बेहतर संस्कार दिये और उन्हें एक मृदुभाषी और संस्कारित व्यक्ति बनाया।

तेजी बच्चन के स्व.इन्दिरा गाँधी से व्यक्तिगत सम्बन्ध रहे और उन्होंने हमेशा राजीव गाँधी को अपने पुत्र के समान माना और स्नेह दिया। जब सोनिया माइनो से राजीव का विवाह तय हुआ उस समय सोनिया को भारतीय संस्कारों और परम्पराओं की जानकारी देने के लिये इंदिरा गाँधी ने तेजी से ही अनुरोध किया था, और एक तरह से तात्कालिक रूप से सोनिया का कन्या पक्ष बच्चन परिवार ही था, और चूँकि भारतीय पद्धति से विवाह (देखें लिंक दिखावे के लिये ही सही) हो रहा था इसलिये “कन्यादान” जैसी रस्म भी बच्चन परिवार ने ही निभाई थी। दो परिवारों के बीच इतने “प्रगाढ़” सम्बन्ध होने के बावजूद ऐसा क्या हो गया कि अब सोनिया एक महत्वपूर्ण शोक के अवसर पर नदारद रहीं। क्या राजनीति और अहं की परछाईयाँ इतनी लम्बी होती हैं कि व्यक्ति अपने सामान्य नैतिक व्यवहार तक भूल जाता है? क्या बच्चन परिवार ने गाँधी परिवार का इतना बुरा कर दिया है कि इस मौके पर भी कम से कम राहुल गाँधी को उपस्थित रहने का निर्देश भी सोनिया नहीं दे सकीं? अब तक तो बच्चन परिवार की ओर से शालीन बर्ताव के कारण यह पता नहीं चल सका है कि इन दोनों परिवारों में मनमुटाव की ऐसी स्थिति क्यों और कैसे बनी (अब तक तो यही देखने में आया है कि अमिताभ के खिलाफ़ आयकर विभाग को सतत काम पर लगाया गया, जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता “दोहरे लाभ पद” वाले मामले में कुर्बान करनी पड़ी) लेकिन एक बार बीच में राहुल के मुँह से निकल गया था कि “बच्चन परिवार ने हमारे साथ विश्वासघात किया है”... हो सकता है कि ऐसी कोई बात हो भी, लेकिन भारतीय संस्कृति में और इतने बड़े सार्वजनिक पद पर रहने के कारण सोनिया का यह फ़र्ज बनता था कि अपने “दुश्मन” के यहाँ इस अवसर पर उपस्थित रहतीं, या परिवार के किसी सदस्य को भेजतीं, और नहीं तो कम से कम एक बयान जारी करके अखबारों में ही संवेदना प्रकट कर देतीं, लेकिन शायद “इटली” के संस्कार भारतीय बहू(?) पर भारी पड़ गये.... ऐसी भी क्या दुश्मनी!!!