Saturday, August 13, 2011

सम्पत्ति का हिसाब माँगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है(सन्दर्भ :- राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन)...... Rajiv Gandhi Foundation,Trusts, NGOs and Gandhi Family




Monday 20 June 2011
सम्पत्ति का हिसाब माँगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है…(सन्दर्भ :- राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन)...... Rajiv Gandhi Foundation, Trusts, NGOs and Gandhi Family

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/06/rajiv-gandhi-foundation-trusts-ngos-and.html

जब से बाबा रामदेव और अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के नाम पर कांग्रेस की नाक में दम करना शुरु किया है, तभी से बाबा रामदेव कांग्रेस के विभिन्न मंत्रियों के निशाने पर हैं। आये दिन उन्हें “व्यापारी”, “ढोंगी”, “भ्रष्ट”, “ठग” इत्यादि विशेषणों से नवाज़ा जा रहा है। कांग्रेस के इस खेल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और स्वयंभू बड़े पत्रकारों का वह दल भी शामिल है जिन्हें नियमित रूप से कांग्रेस द्वारा “हफ़्ता” पहुँचाया जाता है, कभी कागज के कोटे के रूप में, कभी प्रेस के लिये मुफ़्त (या सस्ती) जमीन के रूप में तो कभी “हो रहा भारत निर्माण…” के विज्ञापनों के नाम पर…


बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट (Bharat Swabhiman Trust) और दिव्य योगपीठ (Divya Yog Mandir) के हिसाब-किताब और आय-व्यय का ब्यौरा माँगने में यह स्वनामधन्य और कथित “खोजी पत्रकार”(?) सबसे आगे रहे। इन पत्रकारों की “स्वामिभक्ति” को देखते हुए बाबा रामदेव ने अपने ट्रस्ट की सम्पत्ति घोषित कर दी, साथ ही यह भी बता दिया कि अन्य सभी जानकारी रजिस्ट्रार के दफ़्तर, आयकर विभाग एवं अन्य सभी सरकारी विभागों से प्राप्त की जा सकती है। ये बात और है कि “खोजी पत्रकारों” की, उन दफ़्तरों में जाकर कुछ काम-धाम करने की मंशा कभी नहीं थी, उनका असली काम था “कीचड़ उछालना”, “बदनाम करना” और “सनसनी फ़ैलाना”, इन तीनों कामों में बड़े-बड़े पत्रकार अपने करियर के शुरुआती दिनों से ही माहिर रहे हैं और उन्होंने अपने “मालिक” पर हुए हमले का करारा जवाब बाबा रामदेव को दिया भी… ठीक उसी प्रकार, जैसे उनके मालिक को जूता दिखाने भर से गुलामों ने उस बेचारे की धुनाई कर दी, जो बेचारा चाहता तो उतने समय में चार जूते मार भी सकता था। ऐसी प्रेस कान्फ़्रेंसों में अक्सर “गुलामों” को ही आगे-आगे बैठाया जाता है ताकि “असुविधाजनक” प्रश्नों को सफ़ाई से टाला (टलवाया) जा सके…।

खैर… बात हो रही थी सम्पत्ति का हिसाब माँगने की…। शायद इन बड़े पत्रकारों और स्वनामधन्य “सबसे तेज” चैनलों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे कभी यह पता लगाएं कि आज की तारीख में सोनिया गाँधी कितने फ़ाउण्डेशनों, कितने ट्रस्टों, कितने फ़ण्डों की अध्यक्ष, “मानद अध्यक्ष”(?), “ट्रस्टी”, “बोर्ड सदस्य” अथवा लाभान्वितों में हैं। सोनिया गाँधी के “निजी मनोरंजन क्लब” (यानी National Advisory Commission – NAC) में जो एक से बढ़कर एक “NGO धुरंधर” बैठे हैं, कभी उनकी सम्पत्ति और उन्हें मिलने वाले देशी-विदेशी अनुदानों के बारे में जानकारी निकालें, तो आँखें फ़ट जाएंगी, दिमाग हिल जाएगा और कलेजा अन्दर धँस जाएगा। इन पत्रकारों(?) ने कभी यह जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि सोनिया गाँधी “अप्रत्यक्ष रूप से” उनमें से कितने NGOs की मालकिन हैं, उन NGOs की सम्पत्ति कितनी है, उन्हें कितना सरकारी अनुदान, कितना निजी अनुदान और कितना विदेशी अनुदान प्राप्त होता है? लेकिन बाबा रामदेव की सम्पत्ति के बारे में चिल्लाचोट करना उनका फ़र्ज़ बनता था…

ऐसा नहीं है कि किसी ने भी सोनिया गाँधी के “मालिकाना हक” वाले इन फ़ाउण्डेशनों और ट्रस्टों के हिसाब-किताब और सम्पत्ति के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। सूचना का अधिकार से सम्बन्धित बहुत से स्वयंसेवी समूहों, कुछ “असली खोजी पत्रकारों” एवं कुछ स्वतन्त्र पत्रकारों ने कोशिश की। परन्तु आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पिछले 3-4 साल से “माथाफ़ोड़ी” करने के बावजूद अभी तक कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी, कारण – केन्द्रीय सूचना आयुक्त ने यह निर्णय दिया है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन (Rajiv Gandhi Foundation) तथा जवाहरलाल मेमोरियल फ़ण्ड (Jawaharlal Memorial Fund) जैसे संस्थान “सूचना के अधिकार” कानून के तहत अपनी सूचनाएं देने के लिये बाध्य नहीं हैं। मामला अभी भी हाइकोर्ट तक पहुँचा है और RTI के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने “सूचना आयुक्त के अड़ियल रवैये” के बावजूद हार नहीं मानी है। RGF के बारे में सूचना का अधिकार माँगने पर अधिकारी ने यह जवाब देकर आवेदनकर्ता को टरका दिया कि “राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन सूचना देने के लिये बाध्य नहीं है। यह फ़ाउण्डेशन एक “सार्वजनिक उपक्रम” नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस फ़ाउण्डेशन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलता है, न ही सरकार की इसमें कोई भागीदारी है और न ही इसके ट्रस्टी बोर्ड के चयन/नियुक्ति में सरकार का कोई दखल होता है… अतः इसे सूचना का अधिकार के कार्यक्षेत्र से बाहर रखा जाता है…”।

उल्लेखनीय है कि 21 जून 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री के “आदर्शों एवं सपनों”(?) को साकार रूप देने तथा देशहित में इसका लाभ बच्चों, महिलाओं एवं समाज के वंचित वर्ग तक पहुँचाने के लिये राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की गई थी।

RTI कार्यकर्ता श्री षन्मुगा पात्रो ने सिर्फ़ इतना जानना चाहा था कि RGF द्वारा वर्तमान में कितने प्रोजेक्ट्स और कहाँ-कहाँ पर जनोपयोगी कार्य किया जा रहा है? परन्तु श्री पात्रो को कोई जवाब नहीं मिला, तब उन्होंने सूचना आयुक्त के पैनल में अपील की। आवेदन पर विचार करने बैठी आयुक्तों की पूर्ण बेंच, जिसमें एमएम अंसारी, एमएल शर्मा और सत्यानन्द मिश्रा शामिल थे, ने इस बात को स्वीकार किया कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन (RGF) की कुल औसत आय में केन्द्र सरकार का हिस्सा 4% से कम है, लेकिन फ़िर भी इसे “सरकारी अनुदान प्राप्त” संस्था नहीं माना जा सकता। इस निर्णय के जवाब में अन्य RTI कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की घोषणा केन्द्र सरकार के वित्त मंत्री द्वारा बजट भाषण में की गई थी। सरकार ने इस फ़ाउण्डेशन के समाजसेवा कार्यों के लिये अपनी तरफ़ से एक फ़ण्ड भी स्थापित किया था। इसी प्रकार राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन जिस इमारत से अपना मुख्यालय संचालित करता है वह भूमि भी उसे सरकार द्वारा कौड़ियों के मोल भेंट की गई थी। शहरी विकास मंत्रालय ने 28 दिसम्बर 1995 को इस फ़ाउण्डेशन के सेवाकार्यों(?) को देखते हुए जमीन और पूरी बिल्डिंग मुफ़्त कर दी, जबकि आज की तारीख में इस इमारत के किराये का बाज़ार मूल्य ही काफ़ी ज्यादा है, क्या इसे सरकारी अनुदान नहीं माना जाना चाहिये? परन्तु यह तर्क और तथ्य भी “खारिज” कर दिया गया।

इस सम्बन्ध में यह सवाल भी उठता है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को तो सरकार से आर्थिक मदद, जमीन और इमारत मिली है, फ़िर भी उसे सूचना के अधिकार के तहत नहीं माना जा रहा, जबकि ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर ऐसी कई सहकारी समितियाँ हैं जो सरकार से फ़ूटी कौड़ी भी नहीं पातीं, फ़िर भी उन्हें RTI के दायरे में रखा गया है। यहाँ तक कि कुछ पेढ़ियाँ और समितियाँ तो आम जनता से सीधा सम्बन्ध भी नहीं रखतीं फ़िर भी वे RTI के दायरे में हैं, लेकिन राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन नहीं है। क्या इसलिये कि यह फ़ाउण्डेशन देश के सबसे “पवित्र परिवार”(???) से सम्बन्धित है?

1991 में राजीव गाँधी के निधन के पश्चात तत्कालीन उपराष्ट्रपति ने राजीव गाँधी के सपनों को साकार करने और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये एक ट्रस्ट के गठन का प्रस्ताव दिया और जनता से इस ट्रस्ट को मुक्त-हस्त से दान देने की अपील की। 1991-92 के बजट भाषण में वित्तमंत्री ने इसकी घोषणा की और इस फ़ाउण्डेशन को अनुदान के रूप में 100 करोड़ रुपये दिये (1991 के समय के 100 करोड़, अब कितने हुए?)। इसी प्रकार के दो ट्रस्टों (फ़ण्ड) की स्थापना, एक बार आज़ादी के तुरन्त बाद 24 जनवरी 1948 को नेहरु ने “नेशनल रिलीफ़ फ़ण्ड” का गठन किया था तथा दूसरी बार चीन युद्ध के समय 5 नवम्बर 1962 को “नेशनल डिफ़ेंस फ़ण्ड” की स्थापना भी संसद में बजट भाषण के दौरान ही की गई और इसमें भी सरकार ने अपनी तरफ़ से कुछ अंशदान मिलाया और बाकी का आम जनता से लिया गया। आश्चर्य की बात है कि उक्त दोनों फ़ण्ड, अर्थात नेशनल रिलीफ़ फ़ण्ड और नेशनल डिफ़ेंस फ़ण्ड को “सार्वजनिक हित” का मानकर RTI के दायरे में रखा गया है, परन्तु राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को नहीं…।

राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को सरकार द्वारा नाममात्र के शुल्क पर 9500 वर्ग फ़ीट की जगह पर एक बंगला, दिल्ली के राजेन्द्र प्रसाद रोड पर दिया गया है। इस बंगले की न तो लाइसेंस फ़ीस जमा की गई है, न ही इसका कोई प्रापर्टी टैक्स भरा गया है। RGF को 1991 से ही FCRA (विदेशी मुद्रा विनियमन कानून 1976) के तहत छूट मिली हुई है, एवं इस फ़ाउण्डेशन को दान देने वालों को भी आयकर की धारा 80G के तहत छूट मिलती है, इसी प्रकार इस फ़ाउण्डेशन के नाम तले जो भी उपकरण इत्यादि आयात किये जाते हैं उन्हें भी साइंस एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च संगठन (SIRO) के तहत 1997 से छूट मिलती है एवं उस सामान अथवा उपकरण की कीमत पर कस्टम्स एवं सेण्ट्रल एक्साइज़ ड्यूटी में छूट का प्रावधान किया गया है… आखिर इतनी मेहरबानियाँ क्यों?

हालांकि गत 4 वर्ष के संघर्ष के पश्चात अब 2 मई 2011 को दिल्ली हाइकोर्ट ने इस सिलसिले में केन्द्र सरकार को नोटिस भेजकर पूछा है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को RTI के दायरे में क्यों न लाया जाए? उल्लेखनीय है कि हाल ही में मुम्बई में रिलायंस एनर्जी को भी RTI के दायरे में लाया गया है, इसके पीछे याचिकाकर्ताओं और आवेदन लगाने वालों का तर्क भी वही था कि चूंकि रिलायंस एनर्जी (Reliance Energy), आम जनता से सम्बन्धित रोजमर्रा के काम (बिजली सप्लाय) देखती है, इसे सरकार से अनुदान भी मिलता है, इसे सस्ती दरों पर ज़मीन भी मिली हुई है… तो यह जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिये। अन्ततः महाराष्ट्र सरकार ने जनदबाव में रिलायंस एनर्जी को RTI के दायरे में लाया, अब देखना है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन और इस जैसे तमाम ट्रस्ट, जिस पर गाँधी परिवार कुण्डली जमाए बैठा है, कब RTI के दायरे में आते हैं। जब राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन सारी सरकारी मेहरबानियाँ, छूट, कर-लाभ इत्यादि ले ही रहा है तो फ़िर सूचना के अधिकार कानून के तहत सारी सूचनाएं सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?

बाबा रामदेव के पीछे तो सारी सरकारी एजेंसियाँ हाथ-पाँव-मुँह धोकर पड़ गई थीं, क्या राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन, जवाहरलाल मेमोरियल ट्रस्ट इत्यादि की आज तक कभी किसी एजेंसी ने जाँच की है? स्वाभाविक है कि ऐसा सम्भव ही नहीं है… क्योंकि जहाँ एक ओर दूसरों की सम्पत्ति का हिसाब मांगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है… वहीं दूसरी ओर अपनी सम्पत्ति को कॉमनवेल्थ, आदर्श, 2G और KG गैस बेसिन जैसे "पुण्य-कार्यों" के जरिये ठिकाने लगाने का अधिकार भी उसी के पास सुरक्षित है… पिछले 60 वर्षों से…
====== ========

नोट :-
1) यह बात भी देखने वाली है कि बाबा रामदेव ने अपने कितने रिश्तेदारों को अपने ट्रस्ट में जोड़ा और लाभान्वित किया और राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन जैसे ट्रस्टों से गाँधी परिवार के कितने रिश्तेदार जुड़े और लाभान्वित हुए…

2) हाल ही में 8 जून से 11 जून 2011 तक गाँधी परिवार के सभी प्रमुख सदस्य, श्री सुमन दुबे एवं राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन के कुछ अन्य सदस्य स्विटज़रलैण्ड की यात्रा पर गये थे, जिनमें से कुछ ने खुद को "फ़ाइनेंशियल एडवाइज़र" घोषित किया था… है ना मजेदार बात?

3) श्री सुमन दुबे के पारिवारिक समारोह में शामिल होने ही राहुल गाँधी केरल गये थे जहाँ उन्हें सबरीमाला मन्दिर में हुई भगदड़ की सूचना मिली थी, लेकिन घायलों/मृतकों को देखने जाने की बजाय युवराज छुट्टी मनाने का आनन्द लेते रहे थे…

Posted by Suresh Chiplunkar at 1:13 PM

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/06/rajiv-gandhi-foundation-trusts-ngos-and.html

दिग्विजय सिंह ' दिग्गीराजा '



http://bhandafodu.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%AF

दिग्विजय सिंह गद्दारों का वंशज :ह्त्या का आरोपी !!

मनुष्य को जैसे संस्कार अपने पुरखों से मिलते हैं ,उसके अनुरूप ही उसका स्वभाव ,चरित्र और विचार बन जाते हैं .यह एक निर्विवाद सत्य है .और दिग्विजय के ऊपर पूरी तरह से लागू होती है .दिग्विजय खुद को प्रथ्वी राज चौहान का वंशज बताता है .लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है .दिग्विजय क्षत्रिओं की एक उपजाति "खीची "से सम्बंधित है .इसका विवरण "खीची इतिहास संग्रह "में मिलता है .इसके लेखक A .H .Nizami और G .S .Khichi है .पुस्तक का संपादन R .P .Purohit ने किया है .किताब "खिची शोध संस्थान जोधपुर "से प्रकाशित हुई थी .एक और पुस्तक "Survay of khichii History "में खीचियों के बारे में जानकारी मिलती है .खिची धन लेकर किसी राजा के लिए युद्ध करते थे .आज दिग्विजय खुद को मध्य प्रदेश में गुना जिला के एक छोटी सी रियासत "राघोगढ़ "का राजा कहता है .उसके चमचे उसे दिग्गी राजा पुकारते है .
1 -दिग्विजय का पूर्वज कौन था
पुस्तक के अनुसार दिग्विजय के हाथों जो रियासत मिली एक "गरीब दास "नामके सैनिक को अकबर ने दी थी .जब राजपुताना और मालवा के सभी क्षत्रिय राणा प्रताप के साथ हो रहे थे .गरीब दास अकबर के पास चला गया .अकबर ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर मालवा के सूबेदार को हुक्म भेजा की गरीब दास को एक परगना यानि पांच गाँव दे दिए जाएँ . गरीब दास की मौत के बाद उसके पुत्र "बलवंत सिंह (1770 -1797 ) ने इसवी 1777 में बसंत पंचमी के दिन एक गढ़ी की नींव रखी और उसका नाम अपने कुल देवता "राघोजी "के नाम पर "राघोगढ़ "रख दिया था .
कर्नल टाड के इतिहास के अनुसार बलवंत सिंह ने 1797 तक राज किया .और अंगरेजों से दोस्ती बढ़ाई.जब सन 1778 में प्रथम मराठा युद्ध हुआ तो बलवंत सिंह ने अंगरेजी फ़ौज की मदद की थी
इसका उल्लेख जनरल Gadred ने "Section from State Papers .Maratha Volume I Page 204 में किया है .बलवंत सिंह की इस सेवा के बदले कम्पनी सरकार ने Captain fielding की तरफ से बलदेव सिंह को पत्र भेजा ,जिसमे लिखा था कंपनी बहादुर की तरफ से यह परगना जो बालामेटमें है उसका किला राघोगढ़ तुम्हें प्रदान किया जाता है और उसके साथ के गावों को अपना राज्य समझो .यदि सिंधिया सरकार किसी प्रकार का दखल करे तो इसकी सूचना मुझे दो ..
बाद में जब 1818 में बलवंत सिंह का नाती अजीत सिंह (1818 -1857 )गद्दी पर बैठा तो अंगरेजों के प्रति विद्रोह होने लगे था ,अजीत सिंह ने ग्वालियर के रेजिडेंट को पत्र भेजा कि,आजकल महाराज सिंधिया बगावत की तय्यारी कर रहे हैं .उनके साथ झाँसी और दूसरी रियासत के राजा भी बगावत का झंडा खड़ा कर रहे हैं .इसलिए इन बागियों को सजा देने के लिए जल्दी से अंगरेजी फ़ौज भेजिए ,उस पत्र का जवाब गवालियर के रेजिडेंट A .Sepoyrs ने इस तरह दिया "आप कंपनी की फ़ौज की मदद करो और बागियों साथ नहीं दो .आप हमारे दोस्त हो ,अगर सिंधिया फ़ौज येतो उस से युद्ध करो .कंपनी की फ़ौज निकल चुकी है .
लेकिन सन 1856 में एक दुर्घटना में अजीत सिघ की मौत हो गयी .उसके बाद 1857 में उसका लड़का "जय मंगल सिंह "(1857 -1900 )गद्दी पर बैठा इसके बाद "विक्रमजीत सिंह राजा बना (1900 -1902 (.लेकिन अंग्रेज किसी कारण से उस से नाराज हो गए .और उसे गद्दी से उतार सिरोंज परिवार के एक युवक "मदरूप सिंह "को राजा बना दिया जिसका नाम "बहादुर सिंह "रख दिया गया ( 1902 -1945 )अंगरेजों की इस मेहरबानी के लिए बहादुर सिंह ने अंगरेजी सरकार का धन्यवाद दिया और कहा मैं वाइसराय का आभारी हूँ .मैं वादा करता हूँ कि सरकार का वफादार रहूँगा .मेरी यही इच्छा है कि अंगरेजी सरकार के लिए लड़ते हुए ही मेरी जान निकल जाये .
इसी अंगरेज भक्त गद्दार का लड़का "बलभद्र सिंह "हुआ जो दिग्विजय का बाप है .बलभद्र का जन्म 1914 में हुआ था और इसके बेटे दिग्विजय का जन्म 28 फरवरी 1947 को इन्दौर में हुआ था .
बलभद्र सिंह ने मध्य भारत (पूर्व मध्य प्रदेश )की विधान सभा का चुनाव हिन्दू महा सभा की सिट से लड़ा था .और कांग्रेस के उम्मीदवार जादव को हराया था .सन 1969 में दिग्विजय ने भी नगर पालिका चुनाव कांग्रेस के विरुद्ध लड़ा था .और जीत कर अध्यक्ष बन गया था .
लेकिन इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तारी से बचने लिए जब दिग्विजय अपने समाधी "अर्जुन सिघ "के पास गया तो उसने कांग्रस में आने की सलाह दी .और कहा यदि जागीर बचाना है तो कांग्रेस में आ जाओ .
इस तरह दिग्विजय का पूरा वंश अवसरवाद ,खुशामद खोरी .और अंगरेजों सेवा करने लगा है
इसी कारण से जब दिग्विजय उज्जैन गया था तो वहां के भाजयुमो के अध्यक्ष "धनञ्जय शर्मा "ने सबके सामने गद्दार करार दिया था .ओर सबूत के लिए एक सी डी बी पत्रकारों को बांटी थी (पत्रिका शुक्रवार 22 जुलाई 2011 भोपाल )
2 -दिग्विजय ने कांग्रेसी नेत्री की हत्या करवायी !
अभी तक अधिकांश लोग इस बात का रहस्य नहीं समझ पा रहे थे कि दिग्विजय R .S .S और हिदुओं से क्यों चिढ़ता है .अभी अभी इसका कारण पता चला है .यद्यपि यह घटना पुरानी है .इसके अनुसार 14 फरवरी 1997 को रत के करीब 11 बजे दिग्विजय उसके भी लक्ष्मण सिंह और कुछ दुसरे लोगों ने "सरला मिश्रा "नामकी एक कांग्रेसी नेत्री की कोई ज्वलन शील पदार्थ डाल कर हत्या कर दी थी .और महिला को उसी हालत में जलता छोड़कर भाग गए थे .इतने समय के बाद यह मामला समाज सेवी और बी जे पी के पूर्व पार्षद महेश गर्ग ने फिर अदालत में पहुंचा दिया है और सी .जे .एम् श्री आर .जी सिंह के समक्ष ,दिग्विजय सिंह ,उसके भाई लक्षमण सिंह ,तत्कालीन टी आई एस.एम् जैदी ,नायब तहसीलदार आर .के.तोमर ,तहसीलदार डी.के. सत्पथी ,डा .योगीराज शर्मा .ऍफ़.एस.एल के यूनिट प्रभारी हर्ष शर्मा और नौकर सुभाष के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 ,201 .212 ,218 ,120 बी ,और 461 अधीन मामला दर्ज करने के आदेश देने के लिए आवेदन कर दिया है .फरियादी महेश गर्ग ने धारा 156 .3 यह भी निवेदन भी किया है कि उक्त सभी आरोपियों के विरुद्ध जल्दी कार्यवाही कि जाये .इसपर सी. जे. एम् महोदय ने सुनवाई की तारीख 28 जुलाई तय कर दी है .यही कारण है कि दिग्विजय सभी हिन्दुओं का गालियाँ देता है (दैनिक जागरण 23 जुलाई 2011 भोपाल )
हम सब जानते है कि आपसी विवाह सम्बन्ध करते समय परिवार का खानदान देखा जाता है .नियोजक किसी को नौकरी देते समय आवेदक की पारिवारिक पृष्ठभूमि देख लेते है .यहांतक जानवरों की भी नस्ल देखी जाती है .
फिर गद्दारों की संतान गद्दार देश भक्त कैसे हो सकते हैं .विदेशी अंगरेजों के चमचे विदेशी सोनिया चमचागिरी क्यों न करेगा .ऐसा व्यक्ति कुत्ते से भी बदतर है ,कुत्ता अपनो को नहीं काटता है .इसने तो कांग्रेसी महिला नेत्री की निर्दयता पूर्वक हत्या करा दी .


http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raghogarh.html





प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 2:00 PM 9 टिप्पणियाँ
लेबल: गद्दार, दिग्विजय
Saturday, July 2, 2011
दिग्विजय की चड्डी ढीली क्यों ?

दिग्विजय सिंह अक्सर आर.एस.एस. ,बी.जे.पी और अन्य हिंदूवादी संगठनों को गलियां क्यों देता है ,बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का विरोध क्यों करता है ?राहुल गंदी की तारीफें करके सोनिया की चापलूसी क्यों करता है ?यह ऐसे सवाल हैं ,जो लोगों के मन में उठते रहते हैं .परेक बात सब लोग जानते हैं कि सोनिया .मनमोहन ,दिग्विजय ,अहमद पटेल ,विलास राव ,शीलादीक्षित ,शहीद बलवा ,और हसन अली सब एक ही थैले कि चट्ते बट्टे है,इन सबका विदेशों में अरबों रूपया जमा है .
लोग यह भी जानते हैं कि दिग्विजय एक चालाक ,और मक्कार व्यक्ति है .और राजनीति का घाघ खिलाडी है .उसे एक तीर से कई शिकार करने का अभ्यास है .अंगरेजी क़ी कहावत है ,कि यदि किसी औरत को पटाना हो ,तो उसके कुत्ते तक की तारीफ़ करो .इसी लिए दिग्विजय हर तरह से सोनिया को खुश करता रहता है .क्योंकि असल सत्ता उसी के पास है .वर्ना एक विदेशी विधवा सिवाय भ्रष्टाचार और महगाई के आलावा क्या पैदा कर सकती है .आप सब ने देखा है कि जैसे जैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन तेज होता जा रहा है यह सब एकजुट होने लगे हैं ,और सोनिया कि शरण में आ रहे है .जैसे कुत्तों के पिल्ले अपनी माँ के पास सिमट जाते हैं .
मुझे लगता है कि दिग्विजय की चमचागिरी के पीछे यही कारण होना चाहिए ,दिग्विजय ने अपने शासनकाल में मध्य प्रदेश को चौपट कर दिया था .इसके समय भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था .वैसे तो इसने कई घोटाले किये थे .लेकिन ताजा कर्जा घोटाला (loan scam )सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया है .दिग्विजय सन 1994 से 2000 तक मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री रहा .इसने "State Industrial Development Corporation "के माध्यम से कुछ औद्योगिक समूहों को सात सौ उन्नीस (719 )करोड़ रूपया बिना किसी जमानत ,या शर्त के कर्जा दे दिया था .और कर्जा लेने वालों से कोई जमानत (security )भी नहीं ली .यह सब दिग्विजय के मित्र थे .जब सन 2005 कर्जे की न तो किश्त जमा हुई ,और न ब्याज ही जमा हुआ तो बी. जे. पी की सरकार का माथा ठनका .उस समय कारपोरेशन का मेनेजिंग डायरेक्टर S .R .Mohanty था .जो एक I .A .S अधिकारी था .सरकार ने इस मामले की (EOW ) Economic Offences Wing से जाँच की तो पता चला कि यह कर्जा दिग्विजय ने उद्योगपतिओं को ICD योजना अर्थात "Inter Corporate Deposit "के तहत दिया था .इस घोटाले में उस समय के कुछ कांग्रेसी नेता ,और मोहंती के आलावा 35 अफसरों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर दर्ज हो गयी .( इंडियन एक्सप्रेस 5 फरवरी 2011 ) बाद में मोहंती जबलपुर हाई कोर्ट गया .जहाँ उसको किसी तकनीकी कारण से थोड़ी सी राहत मिल गयी .लेकिन मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया (एन ड़ी टी.वी 6 फरवरी 2011 )मामले कि गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके दो सदस्यों की एक बेंच बना दी ,जिसमे एक Chief Judicial Magistrate और एक Additional Session Judge को रखा गया है .क्योंकि अब वह कर्जा जो 719 करोड़ का था ब्याज मिलाकर 2200 करोड़ का हो गया है .
बी.जे. पी .मध्य प्रदेश के प्रवक्ता श्री नरोत्तम मिश्र ने अदालत से इस केस को प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटने की अपील की है .दूसरी तरफ मुख्य आरोपी मोहंती खुले आम दिग्विजय को जिम्मेदार बता रहा है .उस समय वह "Health Secratary "था .दिग्विजय ने जिन 29 उद्योग पतियोंको कर्जा दिया था उनके कुछ नाम इस प्रकार है -
ई एन बी -प्रफुल महेश्वरी -417 .55
अल्पाइन -सतीश भंडारी -275 .56
रुईया -टी बी रूइया -271 .91
ईशर-गुरुचरण -155 .43
सोम समूह -140 .57
इसकी काफी बड़ी सूचीहै जो ,पत्रिका ,भोपाल 24 दिसंबर 2010 में प्रकाशित हुई थी इसका शीर्षक था "कर्ज लेकर भूल गए :जनता का धन उद्योगपतियों की जेब में "
अब जैसे जैसे सुनवाई के दिन पास आते जा रहे हैं ,दिविजय की चड्डी ढीली होती जा रही है .वह बौखला कर सरे बी.जे.पी ओर संघ को गलियां देने लगा है .उसे भी यह भी डर है की कहीं बाबा रामदेव या अन्ना हजारे इस मूद्दे को देंगे तो सोनिया के साथ सभी अन्दर हो जायेंगे .क्योंकि चोर चोर मोसेरे भाई होते है .यद्यपि मिडिया ने इस घोटाले को अधिक महत्त्व नहीं दिया .फिर भी मैं अपने सभी ब्लोगर बंधुओं से अनुरोध करता हूँ कि,इस घोटाले की बात सबको पहुंचा दें .ताकि दिग्विजय की असलियत लोगों को पता चले .और कोई सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी कर सके .खबर की लिंक भी दी जा रही है -.
http://www.ndtv.com/article/india/loan%20-scam-another%20-ias-under-scanner%20-83683




प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 9:21 PM 5 टिप्पणियाँ
लेबल: दिग्विजय
Thursday, June 30, 2011
दिग्विजय सिंह का भंडाफोड़ !!

दिग्विजय सिंह अपराधियों ,औरातान्कवादियों से हमदर्दी रखता है ,यह उसके सभी अखबारों ,और टी.वी. में दिए गए बयानों से साबित होता है .जो व्यक्ति ओसामा को "ओसामा जी " और बाबा रामदेव को "ठग "और अन्ना हजारे को "धोखेबाज "कहता हो आप उसकी मानसिकता के बारे में खुद अंदाजा कर सकते है .इस बात में कोई शक नहीं है कि जिस व्यक्ति के जैसे विचार होते हैं ,वह वैसी ही नीति अपनाता है .वैसे तो दिग्विजय हिन्दू संगठनों को आतंकवादी ,अपराधी कहता है ,तो उसका मुंह नहीं थकता है.


लेकिन जब उसे मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री का पद मिला तो उसने चुन चुन कर कई ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया था जो अपराधी थे ,या जिनकी अपराधिक प्रष्ठभूमि थी .वैसे गिग्विजय को कांग्रेस से कोई लेनादेना नहीं था .उसके पूर्वज अंग्रेजों के पिट्ठू थे .और गुना जिला में एक छोटी सी रियासत राघौगढ़ के जमींदार थे .वही ठसक दिग्विजय में भरी हुई थी .दिग्विजय को कांग्रेस में लाने वाले उसके समधी अर्जुन सिंह थे .उस समय लोग एम् .पी कांग्रेस को "समधी कांग्रेस "कहते थे .सता पते ही दिग्विजय ने ईमानदार और निष्ठावान कायकर्ताओं को निकाल दिया और सन 1988 में पार्टी के "पुनर्गठन "के बहाने अपने लोगों को पार्टी में भर दिया जो अपराधी थे .उसी दिन से मध्य प्रदेश कांग्रेस का अपराधीकरण शुरू हो गया था .जो उस समय के अखबारों में छपा था .उनका कुछ नमूना दे रहे हैं -
पार्टी में अपने ही लोगों को भर दिया ,और पुराने निष्ठावान कांगरेसियों कि उपेक्षा करके उनको निकाल दिया.
1 -इंदिरा गांधी को समर्पित ,दुर्दिनों के साथियों को गड्ढे में धकेला गया. कांग्रेस प्राइवेट लिमिटेड बन गई (दैनिक भास्कर .14 जन 1988 )
2 -बुरे दिनों के साथी पुनर्गठन के नाम पर निकले गए.(दैनिक भास्कर .16 जन 1988 )
3 -प्रदेश कार्यकारिणी की उपेक्षा .(भास्कर 18 जन .1988 )
बाद में जब 15 सितम्बर 1988 को पचमढ़ी में कांग्रेस की कार्यकारिणी की सभा हुई तो उसमे यह मुद्दा यथा था .और प्रताव पारित हुआ और सोनिया ने कहा था की कि 1978 से 1980 तक जिन लोगों ने काग्रेस के आंदोलनों में सक्रीय कम किया था ,उन्हीं को कंरेस में रखा जायेगा .लेकिन दिग्विजय से उस प्रस्ताव की अनदेखी करते हुए जिन लोगों को ऊंचे ऊँचे पदों पर बिठा दिया उनमेसे कुछ लोगों के नाम दिए जा रहे है .और दिग्विजय की नीतियों के बारे में कुछ जानकारी दी जा रही है .कांग्रेस कार्यालय की फाइलों से प्राप्त हुई है .
1 -दिनांक 27 -28 मार्च 1986 को दिग्विजय ने हेक जिलों से युवकों को बुलालर एक दल बनाया .जिसमे करीब 700 लोग चुने गए .और दल में शामिल होने की अंतिम तारीख 31 मार्च 1986 रखी थी .फिर उनके 22 सेल बना कर जंगल में ट्रेनिंग के लिए भेजा .इनमे अधिकांश लोग ऐसे थे ,जो खुले आम इंदिरा और राजीव को गालियाँ देते थे .इनका काम फसाद कराना था.
2 -जगतपाल को कांग्रेस कमिटी का जनेअल सेक्रेटरी मनोनीत किया ,जिसने 10 लाख रूपों का गबन किया.
3 -भोपाल गैस कांड के अपराधी .यूनियन कार्बाइड के अपराधियों और उनके साथियों को संरक्षण दिया .
4 -जब सन 1985 में मंदसौर के एक कसबे "सिंगौरी "में साम्प्रदायिक डंडे हुए ,तो दिग्विजय ने एक प्रेस नोट से दंगा और भड़का दिया .जिस से कई लोग मारे गए.
5 -ठाकुर हरबंस सिंह नामके व्यक्ति को कांग्रेस सेवादल का चेयर मेन बना दिया ,जिस पर धोखा घडी ,गबन और अन्य कई मामले चल रहे थे .
अ -केस .न. 1650 /84 धारा 378 (c ) C R P C
ब-केस स .298 /82 धारा 420
इसके आलावा हरबंस के निवास स्थान सेवनी पर इनकम टेक्स ने छापा मारा था और लाखों रूपया बरामद किया था .
6 -कप्तान सिंह ठाकुर .दिग्विजय ने इसे बीस सूत्री प्रोग्राम का जनरल सेक्रेटरी और Coordinator बना दिया था ,यह मैनपुरी से एक लड़की भगा कर लाया था .और उसे घर में रख लिया .फिर Willingdon हॉस्पिटल की एक नर्स को भगा लाया ,जो दिल्ली के कनाट प्लेस में रहती थी .यही नहीं इसने पूर्व राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के फर्जी हस्ताक्षर बनाकर रेलवे में नौकरी ले ली थी .बाद में सच्चाई सामने आने से नौकरी से निकाल दिया था .उसके इन्हीं गुणों के कारण दिग्विजय ने उसे महत्वपूर्ण पद दिया था .और उसे पसंद करता था .
7 -सदरुद्दीन अंसारी .दिग्विजय ने इसे Vice President बना दिया था .यह कांग्रेस में होकर भी "जमाअतुल उलमा "का भी उपाध्यक्ष था. उसका लड़का निजामुद्दीन अंसारी कुख्यात अपराधी था .और भोपाल में उसपर कई मुकदमे दर्ज हैं .सन 1985 में इसी ने अपने लोगों के साथ मंदसौर में दंगे करवाए थे.
यह तो थोड़े से नमूने हैं जो विस्तार भय से लिखे हैं .उपलब्ध फाइलों में ऐसे बहुत प्रमाण हैं ,जिससे दिग्विजय के अपराधियों के साठगाँठ होने के सबूतहै .
आज भले दिग्विजय राहुल को प्रधान मंत्री बनाने की बातें करके , सोनिया की चापलूसी कर रहा है और खुद को इंदिरा और सोनिया का भक्त बता रहा है .लेकिन दिग्विजय के ईमान का कोई भरोसा नहीं है .इसके सबूत के लिए रायपुर से प्रकाशित अखबार की हेडिंग का हवाला दिया जा रहा है .
"प्रदेश के वरिष्ठ नेता ,रोकते रहे ,और कहा कि इंदिरा और राजीव को गालियाँ देने वालों को जिम्मेदारी देना मेरी भूल है .इंदिरा" को अंतर्राष्ट्रीय वेश्या ",और सोनिया को "फ़ोरेन माल "कहने वाले प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारी "देशबंधु रायपुर .30 अगस्त 1992 ).
(नोट -दिग्विजय के भक्त कांग्रेसी विचार करें !!)
दिग्विजय सिंह सम्बन्धी इन तीनों लेखों को पढ़ने वाले सभी पाठको से अनुरोध है कि ,यह जानकारी मुझे कांग्रेस के एक निष्ठावान और वरिष्ठ पदाधिकारी ने दी है .जिसमे कुछ अखबारों से कुछ कांग्रेस दफ्तर की फाइलों से ली गयी है .आज भी यह व्यक्ति कांग्रेस के प्रति समर्पित हैं .लेकिन उन्हों ने दिग्विजय कि जनविरोधी नीतियों का विरोध किया था ,और दिग्विजय को सचेत किया था .उनकी बात न मानने के कारण मध्य प्रदेश से कांग्रेस का सफाया हो गया था.इनके पास इतने सबूत हैं जिस से सोनिया भी फस सकती है ,दिग्विजय क्या चीज है .मैंने वह फायलें खुद देखी है .उनका परिचय इस प्रकार है -
R.M.Bhatanagar
Ex.Chairman (Minister staus),ExOffice Secratary,(1978-1993) Secretary cum Personnel Officer,
34.Good Shefard Colony,Banjari Chauraha Kolar Road-BHOPAL.M.P.


चूँकि उनपर दो बार हमला हो चूका है वह अपना मोबाईल नंबर नहीं दे रहे हैं .इन लेखों के बाद उन्होंने अपनी तरफ से यह भी लिखने को कहा है जो उन्होंने अखबारों को पहले भी लिख दिया था."सत्यापन -मैं शपथ पूर्वक सत्यापत करता हूँ कि उल्लेखित जानकारी मेरे निजी ज्ञान तथा उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सत्य है "
अब जिसे चाहिए उन से संपर्क करे .या मेरे मेल से सूचित करे .Em-satyawadi44@gmail.com






प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 9:32 PM 9 टिप्पणियाँ
लेबल: दिग्विजय
Wednesday, June 29, 2011
दिग्विजय सिंह का पर्दाफाश !

दिग्विजय सिंह की हालत उस व्यक्ति की तरह है जो खुद तो मल मूत्र के गड्ढे में पड़ा हो और दूसरों के साफ़ कपड़ों में दाग तलाश करता हो .आज दिग्विजय हरेक के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहा है.और खुद को भ्रस्ताचार से मुक्त होनेका ढिढोरा पीट रहा है .एक समय यही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार को ,जरूरी ,और जायज कहता था.यही नहीं भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा दिलवाने की वकालत भी करता था.दिग्विजय ने अपने मंत्री मंडल में ऐसे लोग भर लिए थे जो भ्रस्ताचार को उचित मानते थे .दिग्विजय ने कहा था कि"वर्त्तमान राजनीतिक व्यवस्था में हमें भ्रष्टाचार कि परिभाषा बदलनी होगी .मैं जो भी करता हूँ पार्टी के लिए करता हूँ "(राज्य की नई दुनिया .भोपाल 28 फरवरी 2001 )
यही नहीं सोनिया भी दिग्विजय के इन विचारों का समर्थन करती थी. 14 दिसंबर 1998 को राष्ट्रीय सम्मलेन मेंप्रदेश के गृहमंत्री हरबंस सिंह ने सोनिया से कहा कि मैं मुख्य मंत्री के आदेश से पार्टी के लिए धन जमा कर रहा हूँ .सोनिया ने उसकी तारीफ कि थी (नव भारत भोपाल 15 दिसंबर 1998 )उसके बाद सन 1990 से 1993 तक दिग्विजय के आदेश से हरबंस सिंह ने 100 -100 रुपये के कूपन बेच कर लोगों से रुपये वसूले .और लाखों रूपया इकठे किये .लेकिन रूपया पार्टी के खाते में जमा करने कि जगह जेब में रख लिए .यहांतक कांग्रस कार्यालय के खर्चे के लिए बहार से कर्जा लेना पड़ा था. (हिन्दुस्तान टाइम्स नई दिल्ली .7 मार्च 1993 )
दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में जो घोटाले ,गबन ,आर्थिक अनियमितताएं हुई थी ,उनके बारे में महा लेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्र्ट में कहा था कि प्रतिमाह लगभग 70 लाख की हेराफेरी मुख्य मंत्री द्वारा कि गयी है .जिसकी पुष्टि समाचारों ने भी की है .जैसे -
1 -मध्य प्रदेश की तेरह सिंचाई परियोजनाओं में सब अदूरी हैं ,एक हेक्टर जमीं भी सिंचित नहीं हुई ,24 अरब रूपया खर्च होने पर सिर्फ 12 हेक्टर जमीन सिंचित हुई .(नव भारत 4 जून 2000 ) सिंचाई योजना में घोटाला .(नव भारत 17 जुलाई 1999 )
2 -राजिव गांधीराष्ट्रीय पेयजल मिशन के तहत 15400 ग्रामीण बसाहटों में केवल 90 बसाहटों में पानी की व्यवस्था हो सकी .याकि कुल 8 .5 %काम किया गया .बाकी रूपया हड़प लिया गया. (नव भारत .भोपाल 18 जुलाई 1999 )
3 -घोटालों के कारण कुएं भी क्म खुदे और मकान भी क्म बने .(नव भारत .7 मई 1999 )
4 -मास्टर रोल घोटाले के दोषियों को बहाल कर दिया गया .(नव भारत 4 मई 1999 )
5 -करोंड़ों के सड़क घोटाला करने वाले निलंबित अफसरों को मुख्य मंत्री ने राजनीतिक दवाब के कारण काम पर ले लिया .और उनपर कार्यवाही रोक दी (दैनिक भास्कर .8 मई 1999 )
इसके अलावा दिग्विजय ने अपने पद का नाजायज दुरपयोग करते हुए .अपने परिवार के लोगों ,रिश्तेदारों ,और हितेषियो को जो लाभ पहुँचाया और सरकारी धन को हड़प किया था .उसकी जानकारी दिग्विजय की गुप्त रिपोर्ट में से हमें मिली है .इस रिपोर्ट के अनुसार -
1 -दिग्विजय्ने मुख्य मंत्री रहते हुए अपनी पत्नी ,अपनी नाबालिग पुत्री मंदाकिनी (आयु 12 साल )मृणालिनी (आयु 9 साल )और हरीश चंडोक और बलभद्र के नाम से एक फर्जी कंपनी बनायीं जिसका नाम "Gwalior Coal "था और इस फर्जी कंपनी के नाम पर करोड़ों रूपया लोन लिया था .और रूपया हड़प करके कंपनी बंद कर दी थी .
2 -संजय सागर Forest Cultivation Project चला कर जमीनों पर कब्ज़ा करके करोड़ों रुपये कमाए .
3 -दिग्विजय अपने गाँव राघौगढ़ और उसके किले को अपनी जायदाद मानता है .इसलिए उसने किले की चट्टानों को कटवा कर .और पहाड़ी के टीलों को खुदवा कर पत्थर मिटटी बिकवा कर करोड़ों रूपया अपनी जेब में डाल लिया .और कोई टेक्स नहीं दिया.
4 -दिग्विजय और उसके छोटे भी लक्षमण ने एक गुजरात के व्यवसायी दिनेश पटेल और रणछोड़ सिंह पटेल के साथ मिलकर एक फर्जी कंपनी बनायी .जिसका नाम "Maruti Limited "था इस कंपनी के बहाने दिग्विजय ने राघौगढ़ की ज़मीन और जंगल पर कब्ज़ा कर लिया.और जमीनों को बेचकर रूपया कमाया .बाद में इस फर्जी कंपनी के नाम पर State Bank विजयपुर की ब्रांच अपने प्रभाव से से कर्जा भी दिलवा दिया .यह फर्जी कंपनी गुना स्थित Fertiliser Plant के प्रबंधकों पर ठेका देने पर दवाब देने लगी .लेकिन गुना फर्टीलाइजर प्रबंधकों ने जन मन कर दिया तो दिग्विजय के गुंडे मारा पीटी और तोड़फोड़ करने लगे .जिस से कई लोग जख्मी हो गए .गुना थाने में दिग्विजय के लोगों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर भी दर्ज है .केस संख्या .63 /84 धारा 379
5 -अपने भी के नाम पर गुना में एक सोयाबीन का प्लांट लगाने के बहाने बैंक से आठ लाख रूपया लोन लिया ,और कोई प्लांट नहीं बनाया .सारा रूपया हड़प कर गया.
6 -अपने गाँव राघौ गढ़ में अपने महल में कारपेट बनाने की कंपनी के बहाने सरकार से सब्सिडी लेकर रूपया जेब में भर लिया .कोई कंपनी नहीं बनायी .
7 -दिग्विजय ने एक गरीब कोटवार (एक पिछड़ी जाति) की जमीन पर अवैध कब्ज़ा कर लिया .और उसकी ज़मीन पर Stone Crusher लगा दिया फिर पांच Dumper के लिए लोन ले लिया .और रूपया हड़प कर लिया.
8 -गुना में श्वेत क्रान्ति के बहाने अपने एक रिश्तेदार के नाम से डेयरी बना दी और बैंक से 8 लाख रूपया लोन ले लिया .लेकिन डेयरी नहीं बनवाई और रूपया हड़प कर गया .
यह तो कुछ थोड़े से ही नमूने हैं ,जो उन फाइलों से जल्दी जल्दी निकले जा सके हैं .दिग्विजय के भ्रष्टाचार के और भी सबूत है ,जो किसी समर्थ और सक्षम व्यक्ति को दिए जा सकते हैं ,जो दिग्विजय का सामना करने को तय्यार हो .ऐसी करीब 30 -40 फाइलें हैं
मेरा सिर्फ यही कहना है की भ्रष्टाचार कैसा भी हो अपराध होता है .चाहे एक हजार का हो ,चाहे एक करोड़ का .यदि कोई संगठन व्यवस्था करा सके तो उन महोदय का टी वी पर दिग्विजय से मुकाबला करवा दिया जा सकता है .
मेरा कांग्रेसियों से अनुरोध है कि दिग्विजय से सावधान रहें ,यह किसी का सगा नहीं है .आज यह जिस राहुल की तारीफ़ में ज़मीन असमान एक कर रहा है .एक दिन उसी राहुल के लिए संकट पैदा कर देगा.
आप लोग भी इस लेख को अपने मित्रों तक भेजने का कष्ट करें .इस विषय के अंतिम एपिसोड में मैं उन महोदय का परिचय भी दूंगा जिन से औरभी जानकारियाँ मिल सकती हैं .तब तक आप तीसरे एपिसोड की प्रतीक्षा करें









प्रस्तुतकर्ता बी एन शर्मा पर 4:30 PM 7 टिप्पणियाँ
लेबल: दिग्विजय
Tuesday, June 28, 2011
दिग्विजय सिंह बेनकाब !

दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी राजा अपने हिन्दू विरोधी विचारों ,और बेतुके बयानों के लिए जाने जाते हैं .सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि दिग्गी को सभी हिन्दू संगठनों से घोर एलर्जी है .चाहे वह आर एस एस हो या बी जे पी .चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे .दिग्गी कि नजर में वे सब लोग आतंकवादी और भ्रष्ट हैं ,जो भ्रष्टाचार का विरोध करता हो .लोग यह भी जानते हैं कि दिग्गी ने मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री की कुर्सी फिर से हथियाने के लिए चापलूसी और खुशामदखोरी की हदें पर कर दी हैं .
अपनी इसी स्वामीभक्ति के कारण वह पार्टी के महामंत्री और उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी बनाये गए है .कान्ग्रेसिओं की नजर में दिग्गी एक वरिष्ठ .निष्ठावान ,और पार्टी के प्रति समर्पित नेता हैं .
लेकिन यदि कोई यह कहे कि दस सालतक मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रहते हुए ,दिग्गी ने खुद कांग्रस को चूना लगाया ,भोपाल स्थित कांग्रेस के कार्यालय "जवाहर भवन 'को फर्जी ट्रस्ट बनाकर अपने क़ब्जे में कर लिया ,भवन से लगी हुई दुकानों का किराया हड़प कर लिया ,अदालत में झूठा शपथ पत्र दिया ,अपने लोगों को फर्जी कंपनिया बना कर रुपयों का घोटाला किया ,पार्टी में अपराधियों को संरक्षण दिया .तो कांग्रेसी ऐसा कहने वाले को फ़ौरन आर एस एस का आदमी कह देंगे ,और अगर कोई यह कहे कि दिग्विजय सिंह सार्वजनिक रूप से इंदिरा गाँधी को "राजनीतिक वेश्या "और सोनिया को "फोरेन"यानी विदेशी कहता था ,तो कांग्रेसी उस व्यक्ति को बाबा रामदेव ,या अन्ना हजारे का चमचा कह देंगे .
लेकिन यह सब आरोप किसी संघी या बाबा रामदेव के आदमी ने नहीं ,बल्कि मध्य प्रदेश कांगेस पार्टी के चेयर मेन Chairman ने लगाये हैं जो सन 1978 से 1993 तक पार्टी में बने रहे .और उनको Minister Status का दर्जा प्राप्त था .यही नहीं ,यह व्यक्ति राजीव गांधी के काफी निकट थे .इनके कार्यकाल में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह एम् .पी में मुख्य मंत्री रहे .इन महोदय का नाम श्री आर. एम् .भटनागर है .आज इनकी आयु 76 के लगभग है .भटनागर जी ने दिग्विजय पर जो भी आरोप लगाये हैं .वह उन्होंने शपथ पूर्वक बताये हैं .जिनकी पुष्टि ,अखबारों ,विधानसभा के रिकार्ड ,और प्रमाणिक गुप्त दस्तावेजों से होती है .यही श्री भटनागर ने इसकी सूचना Top Secret पत्र दिनांक 9 अगस्त 1998 और दिनांक 29 सितम्बर 2001 को सोनिया को देदी थी .यह खबर इंदौर से साप्ताहिक "स्पुतनिक "ने अपने अंक 42 वर्ष 47 औरदिनांक 31 जनवरी -6 फरवरी के अखबार में विस्तार में छापी थी .,
अब हम दिग्विजय के कुछ कारनामों का सप्रमाण एक एक करके भंडा फोड़ेंगे जैसे 1 .जवाहर भवन की संपत्ति हड़प करना ,2 .अपने लोगों को नाजायज फायदा पंहुचाना ,3 .अपराधियों को संरक्षण देना ,4 इंदिरा गाँधी के लिए वेश्या कहना .
1 -जवाहर भवन की संपत्ति गबन करना
दिग्विजय सिंह ने पहला घोटाला कांग्रेस की सम्पति को हड़प करने का किया था .सन 2006 से पूर्व म.प्र काग्रेस कमेटी का मुख्य कार्यालय लोक निर्माण विभाग के एक शेड में कहता था. बादमे मद्य प्रदेश कांग्रेस कमिटी को अपना भवन बनाने हेतु म.प्र. आवास और पर्यावरण विभाग ने आदेश क्र. 3308 /4239 दिनांक 30 /11 /74 और पुनर्स्थापित आदेश दिनांक 30 अगस्त 1980 तथा आदेश दिनांक 20 /11 81 द्वारा रोशन पूरा भोपाल के नुजूल शीट क्रमांक 3 प्लाट 7 में 5140 वर्ग फुट जमीं बिना प्रीमियम के एक रूपया वार्षिक भूभाट लेकर स्थायी पट्टे पर आवंटित कर दिया था .और उस भूखंड का विधिवत कब्ज़ा कांग्रस कमिटी को नुजूल से लेकर 23 /11 81 को सौप दिया .भवन निर्माण हेतु सदस्यों और किरायेदारों से जो रुपया जमा हुआ उस से तीन मंजली ईमारत बनायीं गयी .जिसमे दो बड़े हाल और साथ में 59 दुकानें भी थीं .इस भवन का नाम "जवाहर भवन शोपिंग कोम्प्लेक्स "रखा गया. इस भवन की भूमि पूजा तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह ने 16 अगस्त 1984 को की थी.और उद्घाटन राजीव गाँधी ने किया था. निर्माण हेतु सदस्यों के चंदे से 29 .84 लाख और किराये से 66 .78 लाख जमा हुए थे. और कराए की राशी से पार्टी का खर्च चलने की बात कही गयी थी .
बबाद में दिग्विजय सिंह ने 19 /12 /85 को एक फर्जी ट्रस्ट बनाकर उस भवन पर कब्ज़ा कर लिया .यद्यपि उस ट्रस्ट का नाम "कांग्रेस कमिटी ट्रस्ट "था लेकिन उसका कांग्रेस से कोई सम्बन्ध नहीं था .दिग्विजय ने अनुभागीय अधिकारी (तहसीलदार )के समक्ष शपथपत्र देकर कहा की यह ट्रस्ट पुण्यार्थ है. और जवाहर भवन की सारी चल अचल सम्पति इसी ट्रस्ट की है .इस तरह कांग्रस दिग्विजय की किरायेदार बन गई .देखिये
(देशबंधु दिनांक 6 दिसंबर 1998 ) दिग्विजय ने उस ट्रस्ट का खुद को अध्यक्ष बना दिया .उक्त ट्रस्ट में निम्न पदाधिकारी थे.
अध्यक्ष -दिग्विजयसिंह पुत्र बलभद्र सिंह 2 .मोतीलाल वोरा ट्रस्टी 3 .जगत पाल सिंह मेनेजिंग ट्रस्टी .
इस ट्रस्ट के विरुद्ध न्यायालय अनुभागीय अधिकारी तहसील हुजुर भोपाल में एक जनहित याचिका भी दर्ज कीगयी थी. जो प्रकरण संख्या 04 बी -113 /85 -86 दिनांक 12 जुलाई 88 में दर्ज हुआ था. बाद में यह मामला श्री आर .एम् .भटनागर ने विधान सभा में भी उठवाया.म.प्र. विधान सभा के प्रश्न संख्या 9 (क्रमांक 579 )दिनांक 23 फरवरी 96 को उक्त ट्रस्ट के बारे में श्री करण सिंह ने यह सवाल किया था .क्या राज्यमंत्री धार्मिक न्यास यह बताने का कष्ट करेंगे की इस ट्रस्ट के पंजीयन के समय तक कितनी बार ट्रस्टियों के नाम बदले गए हैं ?जैसा की भटनागर ने 24 दिसंबर 98 को प्रश्न किया था .और पंजीयक से शिकायत की थी ?
इस पर विधान सभा में राज्यमंत्री धार्मिक न्यास श्री धनेन्द्र साहू ने उत्तर दिया था कि अबतक उक्त ट्रस्ट के ट्रस्टी चार बार बदले गए हैं और ट्रस्ट के भवन कि दुकाने पट्टे पर नहीं बल्कि किराये पर दी गयीं है. और इसकी अनुमति भी नहीं ली गयी थी .यही नहीं उक्त ट्रस्ट कि औडिट रिपोर्ट भी 31 मार्च 2000 तक नहीं दी गयी है .
इसके बाद दिग्विजय सिंह ने दुकानों से प्राप्त कराए क़ी पार्टी को न देकर अपने निजी काम में लगाना सुरु कर दिया .जिसकी खबर इंदौर से प्रकाशित "Free Press Journal "ने दिनांक 5 नवम्बर 1986 को इस हेडिंग से प्रकाशित की थी."Digvijay accused of misusing party funds "
श्री भटनागर ने बताया कि जवाहर भवन की 59 दुकानों से मिलाने वाले किराये से प्रति माह दो तीन लाख रुपये कि जगह सिर्फ मुश्किल 65000 /- ही जमा होते थे .इस प्रकार अकेले 10 सालों में करोड़ों का घपला किया गया है. उक्त ट्रस्ट का खाता पंजाब नॅशनल बैंक की भोपाल टी .टी. नगर ब्रांच में थी .जिसका खता नुम्बर 19371 है. खाते से पता चला कि 1 अप्रेल 2001 से 26 मार्च 2003 तक ट्रस्ट से "एक करोड़ ,इक्कीस लाख ,एक हजार छे सौ उनचास "रुपये नकले गए थे. जिसमे सेल्फ के नाम से 162739 /- दिग्विजय ने निकला था .बैंक का लोकर भी थी .जिसमे कई मूल्यवान वस्तुएं भी थी जो भेंट में मिली थी .असके आलावा नकद राशी भी थी .भटनागर ने बताया कि उस समय खाते में ग्यारह करोड़ राशी थी .लोकर कि दो चाभियाँ थी .एक जगतपाल सिह के पास ,और दूसरी दिग्विजय के पास थी .जब जगतपाल कि मौत होजाने के बाद लोकर खोला गया तो उसकी कीमती चीजे गायब थी .और खाते से 9 करोड़ रुपयों का कोई हिसाब नहीं मिला,देखिये साप्ताहिक पत्र इंदौर से प्रकाशित"स्पुतनिक "दिनांक 31 जनवरी 2005 .
इसी पत्र में yah भी लिखा है कि दिग्विजय से ट्रस्ट से सेल्फ के नाम से 65000 /- निकाला था .और अपने मित्र राधा किशन मालवीय को स्कोर्पियो खरीदने को दिया था .बाद में उस गाड़ी को को शाजापुर में दुर्घटना ग्रस्त बता दिया था.आज भी जवाहर भवन दिग्विजय के कब्जे में है .श्री भटनागर ने इसकी शिकायत सोनिया को 31 जनवरी 2005 लिखित में शपथ पूर्वक कर दी थी .और मांग कि थी कि दिग्विजय से कांग्रेस की सम्पति वापस करवाई जाये .और उसे राजनीतिक सन्यास पर भेज दिया जाये .
वास्तव में दिग्विजय ऐसा व्यक्ति है जिसने खुद कांग्रेस को चूना लगाकर करोड़ों रुपये हड़प लिए .मेरे पास कई सबूत हैं .यदि कोई मित्र यह जानकारी बाबा राम देव या अन्ना हजारे तक पहुंचा दे तो यह दस्तावेज उनको भेजे जा सकते है .
अगले एपिसोड में दिग्विजय के आर्थिक घोटालों का भंडा फोड़ किया जायेगा .आप अवश्य पढ़िए .!



Saturday, June 18, 2011
दिग्गीराजा की शतरंजी चाल !

http://bhandafodu.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE

आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो दिग्विजय सिंह और उसके हिन्दू विरोधी बेतुके बयानों के बारे में नहीं जनता होगा .द्प्ग्विजय को लोग दिग्गी राजा के नाम से भी पुकारते हैं .दिग्गी राजनीति में घाघ ,कुटिल ,और दावपेचों में निपुण है .एक बार उसने कहा था कि मई आजतक चुनाव वोटों से नहीं ,बल्कि मेनेजमेंट से जीतता आया हूँ .अगर हम दिग्गी को राजनीति का कीड़ा कहें तो गलत नहीं होगा .आज दिग्गी कि नजर फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है .
कहावत है कि यदि किसी को रिवोल्वर का लाइसेंस चाहिए उसे तोप का लाइसेंस मांगना चाहिए .इसी लिए दिग्गी राहुल को प्रधानमंत्री बनवाना चाहता है .और राहुल उर्फ़ Raul Vinci गन्दी को हर तरह से योग्य साबित करने की जुगाड़ लगा रहा है .सही है इतने समय में राहुल ने वह सब गुण हासिल कर लिए हैं ,जो एक सच्चे कांग्रेसी में होना चाहिए .दिग्गी के अनुसार राहुल चरित्रवान है ,कुंवारा युवक है ,उसके पास कालाधन नहीं है .और हर तरह से बेदाग है .
हम भी यही कहते हैं ,लेकिन कुछ दुष्ट झूठे लोग राहुल के बारे में कुछ और बताते है -जैसे

1 -राहुल चरित्रवान है !
राहुल गन्दी का चरित्र इतनी उच्च कोटि का है ,कि जब अमेठी के एक कांग्रेसी बलदेव सिंह की लड़की "सुकन्या "राहुल के दर्शन करने वहां के रेस्ट हाउस में गयी ,तो राहुल और उसके विदेशी दोस्तों ने उसकी पूजा की थी .लोग सामूहिक बलात्कार की झूठी बातें करते है .तब से सुकन्या और उसकी माँ स्मिता देवी जमीन में समा गए .कि उन्होंने राहुल जैसे महान व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगाया था .जिसने भी यह घटना इस साईट में दी है वह जरुर आर एस एस का आदमी होगा .आओ इस साईट को खोल कर देखिये -

http://www.scribd.com/doc/45330117/rahul

2 -राहुल भ्रष्टाचार से मुक्त है !
इसी तरह यह बात भी झूठ और निराधार है ,कि राहुल के पास काला धन है उसके पास तो खाने को भी रुपये नहीं है ,बेचारा इतना भोला है कि ,अपनी माँ के बाप का और नानी का नाम भी नहीं जनता ,ऐसा व्यक्ति ही देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए राहुल कि .जो भी बेनामी संपत्ति इस साईट में बताई गयी हैं सब संघ वालों का षडयंत्र है .अप इस लिंक को पढ़कर संघ को गालियाँ जरुर दीजिये !

http://www.haindavakeralam.com/HKPage.aspx?PageID=12594

3 -युवक है ,कुंवारा है
कुछ लोगों कि आदत होती है कि,किसी सीधे साधे युवक पर अनर्गल आक्षेप लगाते रहते हैं .जो लोग कहते है कि राहुल ने वेरोनिका नामकी स्पेनिश लड़की से गुप्त रूप से शादी कर ली है .और हनी मून भी केरल में मन लिया है ,वे लोग जरुर बाबा रामदेव के चमचे हैं .या बी जे पी के लोग है .यह साईट किसी हिन्दू आतंकी ने बनाई है .लोग अंधे जो यह नहीं जानते कि राहुल ब्रह्मचारी है .अब इस साईट के बारे में हम क्या करें ?

http://planet6oclock.com/planet6oclock/content/rahul-gandhis-spanish-girlfriend-veronica-images-video

4 -राहुल के पास कालाधन नहीं है
हम चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं ,कि राहुल के पास एक रूपया भी बेनामी नहीं है .अप तलाश कर के देख लो सिर्फ एक चवन्नी होगी .को गांधी बाबा ने अपने लिए कांग्रेस कि सदस्यता के लिए रख ली थी .शायद वही राहुल के पास होगी .अब इन कलमुहे लोगों को क्या कहे जो कहते है कि ,राहुल के पास अरबों की सम्पति है .जिसे निकालने के लिए कई रामदेव और कई अन्ना हजारे लग जायेंगे .फिर भी अप इस साईट को देखिये ताकि बाबा का मुंह बंद हो सके .आर एस एस की यह खुराफात लगती !

http://karsewak.blogspot.com/2007/01/rahul-gandu-his-gf-making-money-in.html

5-राहुल बेदाग है
लगता है कि,अमेरिका की पुलिस दारु के नशे में रहती है ,जभी तो उसने राहुल गाँधी को अवैध रूप से डालर लेजाते हुए गिरफ्तार कर लिया .बिचारी मम्मी सोनिया को अटल बिहारी जैसे संघी से राहुल को छुड़वाने के लिए पैर पड़ना पड़ा .ऍफ़ बी आई को पता नहीं था कि आगे यही स्मगलर भारत का प्रधानमंत्री बनेगा .और अमेरिका से हाथ फैला फैला कर कर्जा मांगता रहेगा .कि अमेरिका कंगाल हो जाएगी .अगर ऐसा भारत में हुआ होता तो कांग्रेसी उन पुलिस वालों को संघ के लोग बताकर तिहाड़ में ठूंस देते .राहुल तो पैदायशी बेदाग है .जिस ने यह साईट बनाई है ,उसे अपने दिमाग का इलाज करवा लेना चाहिए .हम तो फिर भी राहुल को प्रधानमंत्री बनवा कर रहेंगे ,चाहे देश जाये गड्ढे में !

http://planet6oclock.com/planet6oclock/content/rahul-gandhi-fbi-news-was-rahul-gandhi-arrested-or-detained-usa-2011

बेचारे दिग्गी क्या करें ?उनकी नजर में राहुल द्वारा टुकड़ों पर है .शायद फिर से राहुल खैरात में मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवा रहे .असल में डौगी विजय अपनी नस्ल का नाम कर रहे है ,वह है पूंछ हिलाना ,और दूसरों पर भौंकते रहना .वह अपना कम करे ,हम अपना काम करंगे !!
दिग्गी राजा के बारे में और जानकारी अगली पोस्ट में देंगे ,जरूर पढ़िए !

नेहरू-गाँधी राजवंश (?









Wednesday 18 April 2007
नेहरू-गाँधी राजवंश (?)



http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/04/blog-post_18.html

आजकल जबसे "बबुआ" राहुल गाँधी ने राजनीति में आकर अपने बयान देना शुरू कर दिया है, तब से "नेहरू राजवंश" नामक शब्द बार-बार आ रहा है । नेहरू राजवंश अर्थात Nehru Dynasty... इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में विभिन्न साईटों और ग्रुप्स में बहुत चर्चा हुई है....बहुत दिनों से सोच रहा था कि इसका हिन्दी में अनुवाद करूँ या नहीं, गूगल बाबा पर भी खोजा, लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद कहीं नहीं मिला, इसलिये फ़िर सोचा कि हिन्दी के पाठकों को इन महत्वपूर्ण सूचनाओं से महरूम क्यों रखा जाये. यह जानकारियाँ यहाँ, यहाँ तथा और भी कई जगहों पर उपलब्ध हैं मुख्य समस्या थी कि इसे कैसे संयोजित करूँ, क्योंकि सामग्री बहुत ज्यादा है और टुकडों-टुकडों में है, फ़िर भी मैने कोशिश की है इसका सही अनुवाद करने की और उसे तारतम्यता के साथ पठनीय बनाने की...जाहिर है कि यह सारी सामग्री अनुवाद भर है, इसमें मेरा सिर्फ़ यही योगदान है... हालांकि मैने लगभग सभी सन्दर्भों (references) का उल्लेख करने की कोशिश की है, ताकि लोग इसे वहाँ जाकर अंग्रेजी में पढ सकें, लेकिन हिन्दी में पढने का मजा कुछ और ही है... बाकी सब पाठकों की मर्जी...हजारों-हजार पाठकों ने इसे अंग्रेजी में पढ ही रखा होगा, लेकिन जो नहीं पढ़ पाये हैं और वह भी हिन्दी में, तो उनके लिये यह पेश है...


"नेहरू-गाँधी राजवंश (?) की असलियत"...इसको पढने से हमें यह समझ में आता है कि कैसे सत्ता शिखरों पर सडाँध फ़ैली हुई है और इतिहास को कैसे तोडा-मरोडा जा सकता है, कैसे आम जनता को सत्य से वंचित रखा जा सकता है । हम इतिहास के बारे में उतना ही जानते हैं जितना कि वह हमें सत्ताधीशों द्वारा बताया जाता है, समझाया जाता है (बल्कि कहना चाहिये पीढी-दर-पीढी गले उतारा जाता है) । फ़िर एक समय आता है जब हम उसे ही सच समझने लगते हैं क्योंकि वाद-विवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं छोडी जाती । हमारे वामपंथी मित्र इस मामले में बडे़ पहुँचे हुए उस्ताद हैं, यह उनसे सीखना चाहिये कि कैसे किताबों में फ़ेरबदल करके अपनी विचारधारा को कच्चे दिमागों पर थोपा जाये, कैसे जेएनयू और आईसीएचआर जैसी संस्थाओं पर कब्जा करके वहाँ फ़र्जी विद्वान भरे जायें और अपना मनचाहा इतिहास लिखवाया जाये..कैसे मीडिया में अपने आदमी भरे जायें और हिन्दुत्व, भारत, भारतीय संस्कृति को गरियाया जाये...ताकि लोगों को असली और सच्ची बात कभी पता ही ना चले... हम और आप तो इस खेल में कहीं भी नहीं हैं, एक पुर्जे मात्र हैं जिसकी कोई अहमियत नहीं (सिवाय एक ब्लोग लिखने और भूल जाने के)...तो किस्सा-ए-गाँधी परिवार शुरु होता है साहेबान...शुरुआत होती है "गंगाधर" (गंगाधर नेहरू नहीं), यानी मोतीलाल नेहरू के पिता से । नेहरू उपनाम बाद में मोतीलाल ने खुद लगा लिया था, जिसका शाब्दिक अर्थ था "नहर वाले", वरना तो उनका नाम होना चाहिये था "मोतीलाल धर", लेकिन जैसा कि इस खानदान की नाम बदलने की आदत थी उसी के मुताबिक उन्होंने यह किया । रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज की किताब "ए लैम्प फ़ॉर इंडिया - द स्टोरी ऑफ़ मदाम पंडित" में उस तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा है, जिसके अनुसार गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान था, जिसका असली नाम गयासुद्दीन गाजी था. लोग सोचेंगे कि यह खोज कैसे हुई ?

दरअसल नेहरू ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफ़र के समय) में नगर कोतवाल थे. अब इतिहासकारों ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफ़र के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था..और खोजबीन पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला (मेहदी हुसैन की पुस्तक : बहादुरशाह जफ़र और १८५७ का गदर, १९८७ की आवृत्ति), रिकॉर्ड मिलता भी कैसे, क्योंकि गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था "गयासुद्दीन गाजी" । जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था,तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था (जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं), अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे, जो हिन्दू राजाओं (पृथ्वीराज चौहान ने) ने मुसलमान आक्रांताओं को जीवित छोडकर की थी, इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया, लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाकों मे चले गये थे । उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ़ कूच कर गया...हमने यह कैसे जाना ? नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोक कर पूछताछ की थी, लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं, बल्कि कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया... बाकी तो इतिहास है ही । यह "धर" उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है, और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह "दर" या "डार" हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है । लेकिन मोतीलाल ने नेहरू नाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे । इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ़ यही है कि हमें पता चले कि "खानदानी" लोग क्या होते हैं । कहा जाता है कि आदमी और घोडे़ को उसकी नस्ल से पहचानना चाहिये, प्रत्येक व्यक्ति और घोडा अपनी नस्लीय विशेषताओं के हिसाब से ही व्यवहार करता है, संस्कार उसमें थोडा सा बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उसका मूल स्वभाव आसानी से बदलता नहीं है.... फ़िलहाल गाँधी-नेहरू परिवार पर फ़ोकस...


अपनी पुस्तक "द नेहरू डायनेस्टी" में लेखक के.एन.राव (यहाँ उपलब्ध है) लिखते हैं....ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल की एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का नाम था, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी । कमला शुरु से ही इन्दिरा के फ़िरोज से विवाह के खिलाफ़ थीं... क्यों ? यह हमें नहीं बताया जाता...लेकिन यह फ़िरोज गाँधी कौन थे ? फ़िरोज उस व्यापारी के बेटे थे, जो "आनन्द भवन" में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था...नाम... बताता हूँ.... पहले आनन्द भवन के बारे में थोडा सा... आनन्द भवन का असली नाम था "इशरत मंजिल" और उसके मालिक थे मुबारक अली... मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक अली के यहाँ काम करते थे...खैर...हममें से सभी जानते हैं कि राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं... और अधिकतर परिवारों में दादा और पिता का नाम ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, बजाय नाना या मामा के... तो फ़िर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था.... किसी को मालूम है ? नहीं ना... ऐसा इसलिये है, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब खान, एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाय करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में... नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया... फ़िरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था "घांदी" (गाँधी नहीं)... घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था...विवाह से पहले फ़िरोज गाँधी ना होकर फ़िरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था...हमें बताया जाता है कि राजीव गाँधी पहले पारसी थे... यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है । इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं । शांति निकेतन में पढते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था... अब आप खुद ही सोचिये... एक तन्हा जवान लडकी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पडी़ हुई हों... थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी, और विपरीत लिंग की ओर क्यों ना आकर्षित होगी ? इसी बात का फ़ायदा फ़िरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फ़ुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली (नाम रखा "मैमूना बेगम") । नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए, लेकिन अब क्या किया जा सकता था...जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने ताबडतोड नेहरू को बुलाकर समझाया, राजनैतिक छवि की खातिर फ़िरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले.. यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये, बजाय धर्म बदलने के सिर्फ़ नाम बदला जाये... तो फ़िरोज खान (घांदी) बन गये फ़िरोज गाँधी । और विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक कहीं नहीं किया, और वे महात्मा भी कहलाये...खैर... उन दोनों (फ़िरोज और इन्दिरा) को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुनः वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया, ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक (?) का भ्रम बना रहे । इस बारे में नेहरू के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक "रेमेनिसेन्सेस ऑफ़ थे नेहरू एज" (पृष्ट ९४ पैरा २) (अब भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) में लिखते हैं कि "पता नहीं क्यों नेहरू ने सन १९४२ में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी, जबकि उस समय यह अवैधानिक था, कानूनी रूप से उसे "सिविल मैरिज" होना चाहिये था" । यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फ़िरोज अलग हो गये थे, हालाँकि तलाक नहीं हुआ था । फ़िरोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे, और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे । तंग आकर नेहरू ने फ़िरोज का "तीन मूर्ति भवन" मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फ़िरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बडी़ राहत मिली थी । १९६० में फ़िरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी, जबकि वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे । अपुष्ट सूत्रों, कुछ खोजी पत्रकारों और इन्दिरा गाँधी के फ़िरोज से अलगाव के कारण यह तथ्य भी स्थापित हुआ कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी (या श्रीमती फ़िरोज खान) का दूसरा बेटा अर्थात संजय गाँधी, फ़िरोज की सन्तान नहीं था, संजय गाँधी एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस का बेटा था । संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था, अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था । ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था (इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था) । अब संयोग पर संयोग देखिये... संजय गाँधी का विवाह "मेनका आनन्द" से हुआ... कहाँ... मोहम्मद यूनुस के घर पर (है ना आश्चर्य की बात)... मोहम्मद यूनुस की पुस्तक "पर्सन्स, पैशन्स एण्ड पोलिटिक्स" में बालक संजय का इस्लामी रीतिरिवाजों के मुताबिक खतना बताया गया है, हालांकि उसे "फ़िमोसिस" नामक बीमारी के कारण किया गया कृत्य बताया गया है, ताकि हम लोग (आम जनता) गाफ़िल रहें.... मेनका जो कि एक सिख लडकी थी, संजय की रंगरेलियों की वजह से गर्भवती हो गईं थीं और फ़िर मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी, फ़िर उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर "मानेका" किया गया, क्योंकि इन्दिरा गाँधी को "मेनका" नाम पसन्द नहीं था (यह इन्द्रसभा की नृत्यांगना टाईप का नाम लगता था), पसन्द तो मेनका, मोहम्मद यूनुस को भी नहीं थी क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम लडकी संजय के लिये देख रखी थी । फ़िर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं, क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ़ एक तौलिये में विज्ञापन किया था । आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गाँधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कृत्यों पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने की छूट दी । ऐसा प्रतीत होता है कि शायद संजय गाँधी को उसके असली पिता का नाम मालूम हो गया था और यही इन्दिरा की कमजोर नस थी, वरना क्या कारण था कि संजय के विशेष नसबन्दी अभियान (जिसका मुसलमानों ने भारी विरोध किया था) के दौरान उन्होंने चुप्पी साधे रखी, और संजय की मौत के तत्काल बाद काफ़ी समय तक वे एक चाभियों का गुच्छा खोजती रहीं थी, जबकि मोहम्मद यूनुस संजय की लाश पर दहाडें मार कर रोने वाले एकमात्र बाहरी व्यक्ति थे...। (संजय गाँधी के तीन अन्य मित्र कमलनाथ, अकबर अहमद डम्पी और विद्याचरण शुक्ल, ये चारों उन दिनों "चाण्डाल चौकडी" कहलाते थे... इनकी रंगरेलियों के किस्से तो बहुत मशहूर हो चुके हैं जैसे कि अंबिका सोनी और रुखसाना सुलताना [अभिनेत्री अमृता सिंह की माँ] के साथ इन लोगों की विशेष नजदीकियाँ....)एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ २०६ पर लिखते हैं - "१९४८ में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था । वह संस्कृत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृति की अच्छी जानकार थी । नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था, नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये । मथाई के शब्दों में - एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा, वह बहुत ही जवान, खूबसूरत और दिलकश थी - । एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये, नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया, और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं, किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर १९४९ में बेंगलूर के एक कॉन्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया । उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कॉन्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं, पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया ।

मथाई लिखते हैं - मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफ़ी कोशिश की, लेकिन कॉन्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस, जो कि एक विदेशी महिला थी, बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा.....लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कैथोलिक संस्कारों में बडा करूँ, चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो.... लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था.... खैर... हम बात कर रहे थे राजीव गाँधी की...जैसा कि हमें मालूम है राजीव गाँधी ने, तूरिन (इटली) की महिला सानिया माईनो से विवाह करने के लिये अपना तथाकथित पारसी धर्म छोडकर कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया था । राजीव गाँधी बन गये थे रोबेर्तो और उनके दो बच्चे हुए जिसमें से लडकी का नाम था "बियेन्का" और लडके का "रॉल" । बडी ही चालाकी से भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिये राजीव-सोनिया का हिन्दू रीतिरिवाजों से पुनर्विवाह करवाया गया और बच्चों का नाम "बियेन्का" से बदलकर प्रियंका और "रॉल" से बदलकर राहुल कर दिया गया... बेचारी भोली-भाली आम जनता !

प्रधानमन्त्री बनने के बाद राजीव गाँधी ने लन्दन की एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में अपने-आप को पारसी की सन्तान बताया था, जबकि पारसियों से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था, क्योंकि वे तो एक मुस्लिम की सन्तान थे जिसने नाम बदलकर पारसी उपनाम रख लिया था । हमें बताया गया है कि राजीव गाँधी केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक थे, यह अर्धसत्य है... ये तो सच है कि राजीव केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे, लेकिन उन्हें वहाँ से बिना किसी डिग्री के निकलना पडा था, क्योंकि वे लगातार तीन साल फ़ेल हो गये थे... लगभग यही हाल सानिया माईनो का था...हमें यही बताया गया है कि वे भी केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्नातक हैं... जबकि सच्चाई यह है कि सोनिया स्नातक हैं ही नहीं, वे केम्ब्रिज में पढने जरूर गईं थीं लेकिन केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में नहीं । सोनिया गाँधी केम्ब्रिज में अंग्रेजी सीखने का एक कोर्स करने गई थी, ना कि विश्वविद्यालय में (यह बात हाल ही में लोकसभा सचिवालय द्वारा माँगी गई जानकारी के तहत खुद सोनिया गाँधी ने मुहैया कराई है, उन्होंने बडे ही मासूम अन्दाज में कहा कि उन्होंने कब यह दावा किया था कि वे केम्ब्रिज की स्नातक हैं, अर्थात उनके चमचों ने यह बेपर की उडाई थी)। क्रूरता की हद तो यह थी कि राजीव का अन्तिम संस्कार हिन्दू रीतिरिवाजों के तहत किया गया, ना ही पारसी तरीके से ना ही मुस्लिम तरीके से । इसी नेहरू खानदान की भारत की जनता पूजा करती है, एक इटालियन महिला जिसकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह इस खानदान की बहू है आज देश की सबसे बडी पार्टी की कर्ताधर्ता है और "रॉल" को भारत का भविष्य बताया जा रहा है । मेनका गाँधी को विपक्षी पार्टियों द्वारा हाथोंहाथ इसीलिये लिया था कि वे नेहरू खानदान की बहू हैं, इसलिये नहीं कि वे कोई समाजसेवी या प्राणियों पर दया रखने वाली हैं....और यदि कोई सानिया माइनो की तुलना मदर टेरेसा या एनीबेसेण्ट से करता है तो उसकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है और हिन्दुस्तान की बदकिस्मती पर सिर धुनना ही होगा...

यह अनुवाद सिर्फ़ इसीलिये किया गया है कि जो बात बरसों पहले से ही अंग्रेजी में उपलब्ध है, उसे हिन्दी में भी अनुवादित भी होना चाहिये.... यह करने के पीछे उद्देश्य किसी का दिल दुखाना नहीं है, ना ही अपने चिठ्ठे की टीआरपी बढाने का है... हाँ यह स्वार्थ जरूर है कि यदि पाठकों को अनुवाद पसन्द आया तो इस क्षेत्र में भी हाथ आजमाया जाये और इस गरीब की झोली में थोडा़ सा नावां-पत्ता आ गिरे.... (नीले रंग से इटैलिक किये हुए शब्द मेरे हैं, बाकी सब अनुवाद है)
Posted by Suresh Chiplunkar at 3:43 PM


blog.sureshchiplunkar.com/2007/04/blog-post_18.html



Sunday 23 December 2007
सोनियाजी ऐसी भी क्या दुश्मनी!!!

Sonia Gandhi Amitabh Bachchan Rivalry

http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/12/sonia-gandhi-amitabh-bachchan-rivalry.html
आमतौर पर एक सामाजिक मान्यता है कि भले ही आप किसी परिवार में मांगलिक अवसरों पर उपस्थित न हो सकें तो चलेगा, लेकिन उस परिवार की गमी में अवश्य शामिल होना चाहिये, चाहे उस परिवार से आपका कितना ही मनमुटाव क्यों ना हो... अमिताभ बच्चन की माँ अर्थात तेजी बच्चन के अन्तिम संस्कार में गाँधी परिवार का एक भी सदस्य मौजूद नहीं था, जबकि भैरोंसिंह शेखावत अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसमें शामिल हुए।

उल्लेखनीय है कि तेजी बच्चन एक संभ्रांत सिख परिवार की बेटी थीं, जिन्होंने अपने परिवार के भारी विरोध के बावजूद उस जमाने में एक कायस्थ से प्रेम विवाह किया। हालांकि उनके दबंग व्यक्तित्व को रेखांकित करने के लिये यही एक तथ्य काफ़ी है, लेकिन इसके भी परे उन्होंने अपने बच्चों अमिताभ और अजिताभ को बेहतर संस्कार दिये और उन्हें एक मृदुभाषी और संस्कारित व्यक्ति बनाया।

तेजी बच्चन के स्व.इन्दिरा गाँधी से व्यक्तिगत सम्बन्ध रहे और उन्होंने हमेशा राजीव गाँधी को अपने पुत्र के समान माना और स्नेह दिया। जब सोनिया माइनो से राजीव का विवाह तय हुआ उस समय सोनिया को भारतीय संस्कारों और परम्पराओं की जानकारी देने के लिये इंदिरा गाँधी ने तेजी से ही अनुरोध किया था, और एक तरह से तात्कालिक रूप से सोनिया का कन्या पक्ष बच्चन परिवार ही था, और चूँकि भारतीय पद्धति से विवाह (देखें लिंक दिखावे के लिये ही सही) हो रहा था इसलिये “कन्यादान” जैसी रस्म भी बच्चन परिवार ने ही निभाई थी। दो परिवारों के बीच इतने “प्रगाढ़” सम्बन्ध होने के बावजूद ऐसा क्या हो गया कि अब सोनिया एक महत्वपूर्ण शोक के अवसर पर नदारद रहीं। क्या राजनीति और अहं की परछाईयाँ इतनी लम्बी होती हैं कि व्यक्ति अपने सामान्य नैतिक व्यवहार तक भूल जाता है? क्या बच्चन परिवार ने गाँधी परिवार का इतना बुरा कर दिया है कि इस मौके पर भी कम से कम राहुल गाँधी को उपस्थित रहने का निर्देश भी सोनिया नहीं दे सकीं? अब तक तो बच्चन परिवार की ओर से शालीन बर्ताव के कारण यह पता नहीं चल सका है कि इन दोनों परिवारों में मनमुटाव की ऐसी स्थिति क्यों और कैसे बनी (अब तक तो यही देखने में आया है कि अमिताभ के खिलाफ़ आयकर विभाग को सतत काम पर लगाया गया, जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता “दोहरे लाभ पद” वाले मामले में कुर्बान करनी पड़ी) लेकिन एक बार बीच में राहुल के मुँह से निकल गया था कि “बच्चन परिवार ने हमारे साथ विश्वासघात किया है”... हो सकता है कि ऐसी कोई बात हो भी, लेकिन भारतीय संस्कृति में और इतने बड़े सार्वजनिक पद पर रहने के कारण सोनिया का यह फ़र्ज बनता था कि अपने “दुश्मन” के यहाँ इस अवसर पर उपस्थित रहतीं, या परिवार के किसी सदस्य को भेजतीं, और नहीं तो कम से कम एक बयान जारी करके अखबारों में ही संवेदना प्रकट कर देतीं, लेकिन शायद “इटली” के संस्कार भारतीय बहू(?) पर भारी पड़ गये.... ऐसी भी क्या दुश्मनी!!!

Thursday, August 11, 2011

राहुल गांधी -सुकन्या बलात्कार काण्ड...राहल के अपराधों की लिस्ट और बड़ी हो सकती है




कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को बलात्कारी बताना  को भारी पड़......
http://visfot.com/home/index.php/permalink/3902.html






कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को बलात्कारी बताना किशोर समरीते को भारी पड़ गया है. एक ओर जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उनके खिलाफ पचास लाख का जुर्माना किया है वहीं सरकार ने इस पूरे मामले में सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है. हालांकि समरीते का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद वे अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

1 मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राहुल गांधी के नाम एक नोटिस जारी करते हुए उनसे पूछा था कि वे इस संबंध में अदालत में याचिकाकर्ता के आरोपों का जवाब दें.राहुल गांधी को अदालत ने दो सप्ताह का वक्त दिया था. लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही अदालत में एक डबल बेंच बैठी और उसने न केवल उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें राहुल गांधी द्वारा कथित तौर पर बलात्कार पीड़ित सुकन्या सिंह तथा उसके परिजनों को बंधक बनाकर रख लेने का संदेह जताया गया था बल्कि याचिकाकर्ता किशोर समरीते पर पचास लाख का जुर्माना भी लगा दिया. जुर्माने की इस रकम में 25 लाख रूपये उस लड़की को दिये जाएंगे जिसका नाम आ रहा है, 20 लाख रूपये राहुल गांधी को दिये जाएंगे और पांच लाख रुपये की रकम पुलिस महानिदेशक को दिये जाएंगे जिन्होंने समय के भीतर पीड़ित परिजनों को हाजिर कर दिया.

याचिकाकर्ता किशोर समरीते का कहना हैं कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद वे सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान पुलिस महानिदेशक करमवीर सिंह ने आज बलराम सिंह, उनकी पत्नी सावित्री और पुत्री सुकन्या को अदालत में पेश किया। तीनों ने कहा कि न तो उनका अपहरण हुआ और न उन पर कोई जुल्म किया गया। अब किशोर समरीते सवाल उठा रहे हैं कि जिन लोगों को सुकन्या देवी, बलराम सिंह और सावित्री देवी बनाकर पुलिस ने अदालत के सामने पेश किया है वे वह हैं ही नहीं. अदालत के सामने झूठे लोगों को पेश किया गया है. समरीते बताते हैं कि जिसे सुकन्या देवी बताकर पुलिस ने अदालत के सामने पेश किया है उसका नाम मोना है, जबकि सावित्री देवी की जगह कीर्ति सिंह और बलराम सिंह की जगह डॉ बलराम सिंह को पेश किया गया है. किशोर कहते हैं कि उनके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं और उन्हीं सबूतों के आधार पर वे सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

3 दिसंबर 2006 में कथित तौर पर घटी इस घटना के संबंध में जो खबरें आयी हैं उससे कांग्रेस पार्टी में खासा रोष है. कांग्रेस ने पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी जिसे देखते हुए केन्द्र ने सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है. पार्टी ने 8 मार्च को एक विज्ञप्ति जारी करके कहा था कि राहुल गांधी की छवि खराब करने के लिए जानबूझकर कुछ लोग इस तरह की अफवाह फैला रहे हैं.



http://bhandafodu.blogspot.com/2009/03/blog-post_13.html

Friday, March 13, 2009
राहुल गांधी की आपराधिक पृष्ठभूमी

 
राहुल गांधी -सुकन्या बलात्कार काण्ड के बारे में लगभग सबको पता चल चुका है .और राहल के अपराधों की लिस्ट और बड़ी हो सकती है। परन्तु उन में से दो ऐसे अपराध हैं जिनके प्रमाणिक तथ्य उपलब्ध है ,वे इस प्रकार हैं ।
१-सितम्बर २००१ में राहुल अपनी सीक्रेट वाइफ जुअनिता उर्फ़ वेरोनिका के साथ अमेरिका के बोस्टन एयर पोर्ट पर ऍफ़ बी आई द्वारा गिरफ्तार किया गया था .उसके पास से इटालियन पासपोर्ट ,और सूटकेस से अवैध रूप से २०००० अमेरिकन डालर बरामद हुए थे। इस गिरफ्तारी के बारे में लखनऊ के ६ वकीलों ने हाईकोर्ट के माध्यम से ऍफ़ बी आई से जानकारी देने हेतु एक याचिका भी दायर भी की थी।

राहुल को छुडाने के लिए सोनिया ने ब्रिजेश मिश्रा से अनुरोध किया था .जो उस समय प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के सलाहकार थे। ब्रिजेश मिश्रा की लड़की ज्योत्स्ना एक इटालियन व्यक्ती से ब्याही है ,जो सोनिया का परिचित था.उसने ज्योत्स्ना के माध्यम से ब्रिजेश मिश्रा पर दवाब डाला की वह बाजपेयी से ,राहुल को छुडाने के लिए बुश प्रशाशन से कहें .और इस तरह से बाजपेयी के प्रयासों से राहुल को छुडाया जा सका था।
२-इंडियन एक्सप्रेस दिनांक ०३जन ०५ के अनुसार अपनी कोलंबियन गर्ल फ्रेंड जुअनिता के साथ केरल के कुमार कौनम ताज होटल में तीन दिन-रात रहा था .यह जगह केरल के कोच्ची नाम की जगह के पास है .जब होटल के मालिक ने राहुल से उसके साथ वाली लड़की के बारे में जानकारी चाही तो ,राहुल ने गोलमाल सा जवाब दिया। इस पर उसी होटल में रुके हुए एक रिटायर्ड प्रोफेसर जोन एम् इत्ती ने ३१दिसम्बर ०४ को लेरल की अलिपुज्हा जिला अदालत में राहुल के ख़िलाफ़ इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट के अधीन मुकद्दमा दायर कर दिया था .यह केस अभी अदालत में लंबित है ।
इस से आप समझ सकते हैं की राहुल किस प्रकार का व्यक्ति है .उसे सच्चाई छुपाने की क्या जरूरत थी। सच तो यह है की पूरा सोनिया परिवार ही झूठा है राहुल के बाप राजीव ने दावा किया था की उसने कैम्ब्रिज से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री की थी ,जो बाद में सरासर झूठ निकला .उसकी माँ ने कहा की उसने कैम्ब्रिज सेअन्ग्रेज़ी की डिग्री ली है,यह भी झूठ है .उसने सिर्फ़ एक कोचिंग स्कूल से अन्ग्रेज़ी सीखने का प्रमाण पत्र लिया है.अब राहुल भी ख़ुद को एम् फिल बताता फिरता है ,लेकिन जब उसने बी ऐ पास ही नहीं किया तो ,तो एम् फिल होना कैसे सम्भव हो सकता है।
यह सब मकार और चार सौ बीस हैं .ऐसे लोगों से देश को बचाना हमारा परम कर्तव्य है।
जय भारत
बी एन शर्मा -भोपाल दिनांक १३ मार्च 2009

http://bhandafodu.blogspot.com/2009/03/blog-post_13.html




वंदेमातरम का अमर बलिदानी बालक खुदीराम


वंदेमातरम का अमर बलिदानी बालक खुदीराम

जंग ए आजादी के इतिहास में एक ऐसे क्रांतिकारी का भी नाम है जिसने मात्र 19 साल की उम्र में हंसते- हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में 3 दिसंबर 1889 को जन्मे खुदीराम बोस ने आजादी को अपने जीवन का सबसे परम ध्येय बना लिया था और इसीलिए वह नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता के हवन यज्ञ में कूद पड़े। वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल विभाजन के विरोध में 1905 में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।


इतिहासकार शिरोल ने खुदीराम के बारे में लिखा है कि बंगाल का यह वीर लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय था और वे उसे अपना आदर्श मानते थे। विप्लवी प्रवृत्ति के इस बालक को जब 28 फरवरी 1906 को गिरफ्तार किया गया तो वह कैद से भाग निकला। लगभग दो महीने बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया। प्रोफेसर एनकेपी सिन्हा के अनुसार खुदीराम का क्रांतिकारी चेहरा बचपन में ही नजर आने लगा था। एक बार जब क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन से जुड़ी गुप्त समिति के सदस्य और महान क्रांतिकारी नेता हेमचंद्र कानूनगो साइकिल से जा रहे थे तो खुदीराम ने उनका रास्ता रोककर अंग्रेजों को मारने के लिए उनसे बंदूक मांगी।

सिन्हा के मुताबिक खुदीराम की इस मांग से हेमचंद्र यह सोचकर हैरान रह गए कि इस बालक को कैसे पता चला कि उनके पास बंदूक मिल सकती है। आगे चलकर खुदीराम ने हेमचंद्र के नेतृत्व में कई क्रांतिकारी गतिविधियों को खुदीराम ने छह दिसंबर 1907 को नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, लेकिन वह बच गया। उन्होंने 1908 में दो अंग्रेज अधिकारियों वाटसन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन ये दोनों भी बच निकले।

बंगाल का यह वीर क्रांतिकारी मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा था, जिसने कई क्रांतिकारियों को कड़ी सजा दी थी। उन्होंने अपने साथी प्रफुल्ल चंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड से बदला लेने की योजना बनाई। दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया, लेकिन उस समय इस गाड़ी में किंग्सफोर्ड की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं सवार थीं जो मारी गर्इं। दोनों क्रांतिकारियों को इसका काफी दुख हुआ। अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। ाुदीराम पकड़े गए ्र जबकि प्रफुल्ल चंद चाकी ने खुद को गोली से उड़ा लिया।

उन्नीस साल की उम्र में 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम को फांसी दे दी गई। इस बलिदान के बाद वह इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे ऐसी धोती बुनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था। शिरोल ने लिखा है कि बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

http://visfot.com/home/index.php/permalink/4765.html

दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का विरोध क्यों करता है

http://bhandafodu.blogspot.com/2009/10/blog-post.html

दिग्विजय सिंह अक्सर आर.एस.एस. ,बी.जे.पी और अन्य हिंदूवादी संगठनों को गलियां क्यों देता है ,बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का विरोध क्यों करता है ?राहुल गंदी की तारीफें करके सोनिया की चापलूसी क्यों करता है ?यह ऐसे सवाल हैं ,जो लोगों के मन में उठते रहते हैं .परेक बात सब लोग जानते हैं कि सोनिया .मनमोहन ,दिग्विजय ,अहमद पटेल ,विलास राव ,शीलादीक्षित ,शहीद बलवा ,और हसन अली सब एक ही थैले कि चट्ते बट्टे है,इन सबका विदेशों में अरबों रूपया जमा है .
लोग यह भी जानते हैं कि दिग्विजय एक चालाक ,और मक्कार व्यक्ति है .और राजनीति का घाघ खिलाडी है .उसे एक तीर से कई शिकार करने का अभ्यास है .अंगरेजी क़ी कहावत है ,कि यदि किसी औरत को पटाना हो ,तो उसके कुत्ते तक की तारीफ़ करो .इसी लिए दिग्विजय हर तरह से सोनिया को खुश करता रहता है .क्योंकि असल सत्ता उसी के पास है .वर्ना एक विदेशी विधवा सिवाय भ्रष्टाचार और महगाई के आलावा क्या पैदा कर सकती है .आप सब ने देखा है कि जैसे जैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन तेज होता जा रहा है यह सब एकजुट होने लगे हैं ,और सोनिया कि शरण में आ रहे है .जैसे कुत्तों के पिल्ले अपनी माँ के पास सिमट जाते हैं .
मुझे लगता है कि दिग्विजय की चमचागिरी के पीछे यही कारण होना चाहिए ,दिग्विजय ने अपने शासनकाल में मध्य प्रदेश को चौपट कर दिया था .इसके समय भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था .वैसे तो इसने कई घोटाले किये थे .लेकिन ताजा कर्जा घोटाला (loan scam )सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया है .दिग्विजय सन 1994 से 2000 तक मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री रहा .इसने "State Industrial Development Corporation "के माध्यम से कुछ औद्योगिक समूहों को सात सौ उन्नीस (719 )करोड़ रूपया बिना किसी जमानत ,या शर्त के कर्जा दे दिया था .और कर्जा लेने वालों से कोई जमानत (security )भी नहीं ली .यह सब दिग्विजय के मित्र थे .जब सन 2005 कर्जे की न तो किश्त जमा हुई ,और न ब्याज ही जमा हुआ तो बी. जे. पी की सरकार का माथा ठनका .उस समय कारपोरेशन का मेनेजिंग डायरेक्टर S .R .Mohanty था .जो एक I .A .S अधिकारी था .सरकार ने इस मामले की (EOW ) Economic Offences Wing से जाँच की तो पता चला कि यह कर्जा दिग्विजय ने उद्योगपतिओं को ICD योजना अर्थात "Inter Corporate Deposit "के तहत दिया था .इस घोटाले में उस समय के कुछ कांग्रेसी नेता ,और मोहंती के आलावा 35 अफसरों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर दर्ज हो गयी .( इंडियन एक्सप्रेस 5 फरवरी 2011 ) बाद में मोहंती जबलपुर हाई कोर्ट गया .जहाँ उसको किसी तकनीकी कारण से थोड़ी सी राहत मिल गयी .लेकिन मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया (एन ड़ी टी.वी 6 फरवरी 2011 )मामले कि गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके दो सदस्यों की एक बेंच बना दी ,जिसमे एक Chief Judicial Magistrate और एक Additional Session Judge को रखा गया है .क्योंकि अब वह कर्जा जो 719 करोड़ का था ब्याज मिलाकर 2200 करोड़ का हो गया है .
बी.जे. पी .मध्य प्रदेश के प्रवक्ता श्री नरोत्तम मिश्र ने अदालत से इस केस को प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटने की अपील की है .दूसरी तरफ मुख्य आरोपी मोहंती खुले आम दिग्विजय को जिम्मेदार बता रहा है .उस समय वह "Health Secratary "था .दिग्विजय ने जिन 29 उद्योग पतियोंको कर्जा दिया था उनके कुछ नाम इस प्रकार है -
ई एन बी -प्रफुल महेश्वरी -417 .55
अल्पाइन -सतीश भंडारी -275 .56
रुईया -टी बी रूइया -271 .91
ईशर-गुरुचरण -155 .43
सोम समूह -140 .57
इसकी काफी बड़ी सूचीहै जो ,पत्रिका ,भोपाल 24 दिसंबर 2010 में प्रकाशित हुई थी इसका शीर्षक था "कर्ज लेकर भूल गए :जनता का धन उद्योगपतियों की जेब में "
अब जैसे जैसे सुनवाई के दिन पास आते जा रहे हैं ,दिविजय की चड्डी ढीली होती जा रही है .वह बौखला कर सरे बी.जे.पी ओर संघ को गलियां देने लगा है .उसे भी यह भी डर है की कहीं बाबा रामदेव या अन्ना हजारे इस मूद्दे को देंगे तो सोनिया के साथ सभी अन्दर हो जायेंगे .क्योंकि चोर चोर मोसेरे भाई होते है .यद्यपि मिडिया ने इस घोटाले को अधिक महत्त्व नहीं दिया .फिर भी मैं अपने सभी ब्लोगर बंधुओं से अनुरोध करता हूँ कि,इस घोटाले की बात सबको पहुंचा दें .ताकि दिग्विजय की असलियत लोगों को पता चले .और कोई सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी कर सके .खबर की लिंक भी दी जा रही है -.
http://www.ndtv.com/article/india/loan%20-scam-another%20-ias-under-scanner%20-83683

Thursday, July 28, 2011

मंगोल

मंगोल
मंगोल छोटी आँख, पीली चमड़ी वाली एक जाति, जिसके दाढ़ी-मूँछ बहुत कम होती है। मंगोल लोग प्राय: खानाबदोश थे। ये खानाबदोश मर्द और औरतें बड़े मज़बूत कद-काठी के लोग थे। शहरी जन-जीवन इन्हें रास नहीं आता था। चंगेज़ ख़ाँ जैसा वीर, प्रतापी और महान नेता मंगोल इतिहास में शायद ही हुआ है। बाबर ने अपने वंश को भारत में मुग़ल प्रसिद्ध किया था। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मुग़ल, मंगोलों के ही वंशज थे।

मज़बूत क़द-काठी

मंगोलों को कष्ट झेलने की आदत थी और ये लोग उत्तरी एशिया के लम्बे चौड़े मैदानों में तम्बुओं में रहते थे। लेकिन इनका शारीरिक बल और कष्ट झेलने का मुहावरा इनके ज़्यादा काम न आते, अगर इन्होंने एक सरदार न पैदा किया होता, जो बड़ा अनोखा व्यक्ति था। शहरों और शहरों के रंग-ढंग से भी उन्हें नफ़रत थी। बहुत से लोग समझते हैं कि चूंकि वे खानाबदोश थे, इसलिए जंगली रहे होंगे। लेकिन यह ख्याल ग़लत है। शहर की बहुत सी कलाओं का उन्हें अलबत्ता ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने जिन्दगी का अपना एक अलग तरीक़ा ढाल लिया था और उनका संगठन बहुत ही गुंथा हुआ था।

इतिहास

मंगोलों के कई समूह विविध समयों में भारत में आये और उनमें से कुछ यहीं पर बस गए। चंगेज़ ख़ाँ, जिसके भारत पर आक्रमण करने का ख़तरा 1211 ई. में उत्पन्न हो गया था, वह एक मंगोल था। इसी प्रकार से तैमूर भी, जिसने भारत पर 1398 ई. में हमला किया, वह भी एक मंगोल था। चंगेज ख़ाँ और उसके अनुयायी मुसलमान नहीं थे, किन्तु तैमूर और उसके अनुयायी मुसलमान हो गए थे। 'मंगोल लोग ही मुसलमान बनने के बाद 'मुग़ल' कहलाने लगे।' 1211 ई. में चंगेज ख़ाँ तो सिन्धु नदी से वापस लौट गया, किन्तु उसके बाद मंगोलों ने और कई आक्रमण भारत पर किए। दिल्ली के बलबन और अलाउद्दीन ख़िलजी जैसे शक्तिशाली सुल्तानों को भी मंगोलों का आक्रमण रोकने में एड़ी-चोट का पसीना एक कर देना पड़ा। 1398 ई. में तैमूर के हमले ने दिल्ली सल्तनत की नींवें हिला दीं और मुग़ल वंश की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया, जिसने अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन की स्थापना होने तक इस देश में राज्य किया।

विजय अभियान

लड़ाई के मैदान में अगर मंगोलों ने महान विजय प्राप्त कीं तो अधिक संख्या होने के कारण नहीं, बल्कि अनुशासन और संगठन के कारण, और इसका सबसे बड़ा कारण तो यह था कि, उन्हें चंगेज़ ख़ाँ जैसा जगमगाता सेनानी मिला था। इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास में चंगेज़ जैसा महान और प्रतिभा वाला सैनिक नेता दूसरा कोई नहीं हुआ है। सिकन्दर और सीजर इसके सामने नाचीज़ नज़र आते हैं। चंगेज़ न सिर्फ़ खुद बहुत बड़ा सिपहसलार था, बल्कि उसने अपने बहुत से फ़ौजी अफ़सरों को तालीम देकर होशियार नायक बना दिया था। अपने वतन से हज़ारों मील दूर होते हुए भी दुश्मनों और विरोधी जनता से घिरे रहते हुए भी वे अपने से ज़्यादा तादाद की फ़ौजों से लड़कर उन पर विजय प्राप्त करते थे।