Monday, June 6, 2011

रामलीला मैदान में शनिवार मध्य रात्रि हुआ पुलिसिया तांडव


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भयावह था पुलिस का चेहरा
Jun 05, 10:47 pm

प्रदीप कुमार सिंह, नई दिल्ली

रामलीला मैदान में शनिवार मध्य रात्रि हुआ पुलिसिया तांडव बाबा भक्तों के लिए भयावह था। हर तरफ चीख-पुकार के बीच पुलिस अनशनकारियों पर लाठियां बरसाने में जुटी थी। इस बीच आंसू गैस के गोले भी दागे गए। खुशकिस्मती थी कि पंडाल में आग नहीं लगी, वरना यह रात देश के लिए काली रात बन जाती। सत्याग्रह को कुचलने के लिए पुलिस ने जो बर्बर तरीका अपनाया, उसे अब आला अफसर उचित ठहराने में जुटे हुए हैं। इस संबंध में कमला मार्केट थाने में दंगा भड़काने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने व सरकारी ड्यूटी पर तैनात कर्मियों से मारपीट का मामला दर्ज किया गया है। पुलिसिया कार्रवाई में कई सौ कार्यकर्ता घायल हुए। इनमें से कई की हालत गंभीर है।

भजन-कीर्तन के बाद सत्याग्रही जब नींद में थे, रात एक बजे पुलिसिया कार्रवाई शुरू हुई। कई हजार पुलिस व रैपिड एक्शन के जवानों ने पंडाल नाकेबंदी कर दी। रामलीला मैदान के आसपास सभी मार्गो को सील कर दिया गया। खुद पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता ने पंडाल के अंदर और बाहर से चारों तरफ घूमकर नाकेबंदी का जायजा लिया। मैदान का केवल एक गेट खुला रखा गया। पुख्ता इंतजाम के बाद कई आला अफसरों की मौजूदगी में पुलिस व रैपिड एक्शन के जवान पंडाल में घुस गए और सत्याग्रहियों को खदेड़ना शुरू कर दिया। पुलिस ने बाबा रामदेव को साथ ले जाने का प्रयास किया तो उनके समर्थक बचाव में आगे आ गए। अफरातफरी के बीच बाबा मंच से नीचे कूद पड़े। कुछ भक्तों ने उन्हें कंधों पर उठा लिया। एक तरफ बाबा भक्तों को शांति बनाए रखने की अपील कर रहे थे, दूसरी तरफ पुलिस भक्तों पर लाठियां भांज रही थी। मंच को निशाना बना कर आंसू गैस के गोले दागने शुरू कर दिए। पंडाल में हर तरफ धुआं ही धुआं फैल गया। लोगों की आंखों में जलन शुरू हो गई। पंडाल में भी आग की लपटें उठने लगीं। गनीमत थी कि शिविर में अग्नि से बचाव के इंतजाम थे। एक भक्त ने अग्निशमन उपकरण से आग पर काबू पाया। धुएं का फायदा उठा बाबा रामदेव पुलिस की आंखों से ओझल हो गए।

इसके बाद पुलिसकर्मियों ने किसी को नहीं बख्शा। बुजुर्ग, बच्चों व महिलाओं तक पर लाठियां भांजी गई। महिलाओं को पकड़कर खींचा और बुजुर्गो के हाथ-पांव पकड़कर घसीटा गया। कई महिलाओं के कपड़े तक फट गए। सत्याग्रही गिड़गिड़ा रहे थे, आधी रात को कहां जाएंगे। हरियाणा, आंध्रप्रदेश, झारखंड से कई महिलाएं अकेली ही आई थीं। उन्होंने हाथ जोड़कर पुलिसकर्मियों से सुबह तक वहां ठहरने देने की अनुमति मांगी, मगर उनकी किसी ने नहीं सुनी। करीब दो घंटे तक पुलिसिया तांडव चलता रहा। इस दौरान पुलिस ने पंडाल की लाइट तक काट दी। पुलिस ने पंडाल में बने तीन आपातकालीन गेट नहीं खोले। हमदर्द चौराहे की तरफ वाले केवल एक गेट को ही खुला रहने दिया गया। उस समय पंडाल में 60 हजार लोग मौजूद थे। भगदड़ मची तो सभी एक-दूसरे को धक्का देते, गिरते-पड़ते भागने लगे। जो गिर गया, कुचला गया। पुलिस के डंडे व कुचले जाने से सैकड़ों लोग बेहोश हो गए। जब भीड़ कम हुई तब पुलिस ने कुछ लोगों को वहां से उठाकर पास के अस्पताल में पहुंचाया। पंडाल में हर तरफ लोगों की चप्पल, जूते व सामान बिखरा पड़ा था। सभी को बाहर खदेड़ने के बाद पुलिस ने मैदान सील कर दिया। पंडाल से हिरासत में लिए गए लोगों को बसों में बिठाकर दिल्ली की सीमा पर ले जाकर छोड़ दिया गया। 71 घायलों को लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल में भर्ती कराया गया। चार लोगों को राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया।

विशेष पुलिस आयुक्त (लॉ एंड ऑर्डर) धर्मेद्र कुमार के अनुसार 'बाबा रामदेव की जान को खतरा था और बड़ी तादाद में उनके समर्थकों के रविवार को दिल्ली पहुंचने की सूचना थी। इसलिए उनके योग शिविर की अनुमति रद्द की गई।' शिविर की अनुमति रद्द होने और समर्थकों को वहां से जाने के लिए बोल दिया गया था। मध्य रात्रि 11 बजे ही इस संबंध में बाबा को अवगत करा दिया गया था।

अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त राजन भगत ने कहा, पुलिस जब बाबा को हिरासत में लेने का प्रयास कर रही थी तो उनके समर्थकों ने हाथापाई व धक्का-मुक्की की। ईट व कुर्सियां भी फेंकी गई। नतीजतन, 62 लोगों को चोटें आई। इनमें 23 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। स्थिति पर काबू पाने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के आठ गोले दागे।

ऐसे गिरफ्तार हुए बाबा

पुलिस मान रही थी कि कार्रवाई के बाद बाबा रामदेव बचकर निकल गए, लेकिन वह पंडाल के पीछे स्थित दो दीवारों के बीच खाली जगह में दो घंटे तक छिपे रहे। तड़के करीब सवा चार बजे पंडाल के पीछे की तरफ से कुछ महिलाओं के साथ बाबा निकले तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान बाबा रामदेव से धक्का-मुक्की भी हुई। पुलिस बाबा रामदेव को सीधे सफदरजंग एयरपोर्ट पर ले गई। सुबह तक यहां रखने के बाद विशेष विमान से उन्हें देहरादून के लिए रवाना कर दिया गया।

Saturday, June 4, 2011

To remove corruption, join satyagrah forward it to all & save our india


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अभी नही तो कभी नही [ भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह ]

[ Swami Ramdevji on INDEFINITE FAST up to death- Join this movement ]

जाग उठे हैं लोग, देश में आँधी चलने वाली है ।
भूख और भ्रष्टाचार में डूबी, रात गुजरने वाली है ॥

I am not poor because I am an Indian. My rightful share of wealth is hidden in foreign countries by some corrupt people illegally. This wealth amounts to be approximately 400 lakh crore rupees. This money is amassed not only through tax-dodging; rather a major portion of this is plundered through graft, illegally selling countries national resources and through corruption in defense and other big deals. The only solution for poverty is money. Somehow if this money is brought back then India will become world’s biggest economic power. Only a small portion of this money is sufficient to pay our total national debt. The equation of one dollar is equal to 50 rupees will change to one rupee is equal to 50 dollars. This will be in favour of both import and export. In addition to bringing this money back we have to make such a system that in future nobody can plunder our national resources and wealth. For this we will have to draft and implement a powerful, autonomous and fair Lokpal bill. Simultaneously 100, 500 and 1000 Rs notes need to be withdrawn from circulation, because it’s easier and convenient to bribe in big notes. It will also make the black money invalid, which is amassed by corrupt politicians and bureaucrats in shape of big notes. They will become powerless as they will not be able to convert big notes into small notes. British made thousands of rules and legislations to plunder our country. These legislations are still in force. We will have to replace these British legislations with new ones for a new India, so that people can get justice and not merely verdicts and the corrupt, rapists and adulteraters can be hanged.

To contribute in this Holy Expedition I am going to attend and be a part of the Satyagrah in Ramlila maidan in Delhi on 04 Jun 11.If you are also a true Indian then let’s join Bharat Swabhimaan and work together in the interest of nation so that we can make our country free from corrupt people and corrupt system.

भारत स्वाभिमान आंदोलन की क्रमबद्ध मुहिम मे 30 जनवरी, 27 फरवरी, 23 मार्च के कार्यक्रमों की अभूतपूर्व सफलता के पश्चात आंदोलन निर्णायक मोड पर है । सत्य की इस लड़ाई में आपका सहयोग अपेक्षित है ।
भारत स्वाभिमान आंदोलन के अंतर्गत आयोजित सभाओ के छोटे वीडियो क्लिप्स (Video Clips) -
Video-1 Video 2 Video 3 Video 4 Video 5 Video 6

दिल्ली में परम पूज्य स्वामीजी के साथ आमरण अनशन पर बैठने वाले भाई/ बहिन आनलाइन पंजीकरण करें ईमेल करें:divyayoga@rediffmail.com काल करें: 01334-240008 इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए एक बार 02233081122 पर मिस काल अवश्य करें तथा मित्रो को भी बताए ।

अभियान के बारे में अधिक जानने के लिए वीडियो देखे सत्याग्रह क्यो ? अभियान का आस्था प्रोमो सभी ईमेल sms करे







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राष्ट्रहित में तीन माँगें [Three demands for national cause ]
1. लगभग 400 लाख करोड़ रूपये का कला धन जो राष्ट्रीय संपत्ति है यह देश को मिलना चाहिए .
[ About 400 Lac Crore of Black money, which is national property. Country must get it back ]
2. सक्षम लोकपाल का कठोर क़ानून बनाकर भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाना .
[ Legislation of strong Lokpal Bill to completely remove corruption ]
3. स्वतंत्र भारत में चल रहे विदेशी तंत्र ( ब्रिटिश रुल ) ख़त्म होना चाहिए जिससे सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिल सके.
[ Removal of foreign governing system (BRITISH RULE) in independent Bharat so that everyone can get social and economical justice. ]

To Join Amaran Anshan [Indefinite Fast]In Delhi with Param pujya Swami Ramdevji please register your self via Online Registration E-mail: divyayoga@rediffmail.com Call us : 01334-240008 To support this movement Call [Toll free] 02233081122
Our website
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भवदीय
डॉ जयदीप आर्य (मुख्य केन्द्रीय प्रभारी )
राकेश कुमार ( मुख्य केन्द्रीय प्रभारी )
आचार्य सुमन: ( मुख्य केन्द्रीय प्रभारी )




--
भवदीय,
राकेश कुमार
मुख्य केंद्रीय प्रभारी,

क्या आपने आज भ्रष्टाचार मिटाने व कालाधन वापिस लानेके लिए कम से कम १०० मेल भेजी,
क्या आपने आज देश को बचाने के लिए
कम से कम १० एस ऍम एस भेजे.
अगर नहीं , तो आइये अभी करें,

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Friday, April 8, 2011

"Fight against Corruption. We are with you, Anna Hajare"


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"Fight against Corruption. We are with you, Anna Hajare"


Our Anti corruption system needs a change

Why is it that no one goes to jail in our country despite indulging in corruption? This is because we have completely rotten anti-corruption laws and anti-corruption agencies that it is almost impossible for the corrupt to be penalized.

Jan Lokpal Bill is the solution

Justice Santosh Hegde (former Supreme Court Judge and present Lokayukta of Karnataka), Prashant Bhushan (Supreme Court Lawyer) and Arvind Kejriwal (activist) have together drafted a strong anti-corruption law called Jan Lokpal Bill which requires that investigations into any case should be completed within a year and the trial should get over in the next one year so that a corrupt person goes to jail within two years of complaint and his ill gotten wealth is confiscated.

Proposed Govt Lokpal Bill is an eyewash

Lokpal Bill has been introduced eight times in Parliament since 1968. All the eight versions have been very weak. Even these weak versions have not been passed so far because Lokpal Bill seeks to investigate politicians. The latest draft of Lokpal Bill prepared by the present UPA government is a complete eyewash. Rather than strengthen anti-corruption systems, it demolishes whatever exists in the name of anti-corruption systems today. It seeks to completely insulate politicians from any kind of action against them.


Salient features of Jan Lokpal Bill


Drafted by Justice Santosh Hegde, Prashant Bhushan and Arvind Kejriwal, this Bill has been refined on the basis of feedback received from public on website and after series of public consultations. It has also been vetted by and is supported by Shanti Bhushan, J M Lyngdoh, Kiran Bedi, Anna Hazare etc. It was sent to the PM and all CMs on 1st December.


An institution called LOKPAL at the centre and LOKAYUKTA in each state will be set up
Like Supreme Court and Election Commission, they will be completely independent of the governments. No minister or bureaucrat will be able to influence their investigations.
Cases against corrupt people will not linger on for years anymore: Investigations in any case will have to be completed in one year. Trial should be completed in next one year so that the corrupt politician, officer or judge is sent to jail within two years.
The loss that a corrupt person caused to the government will be recovered at the time of conviction.
How will it help a common citizen: If any work of any citizen is not done in prescribed time in any government office, Lokpal will impose financial penalty on guilty officers, which will be given as compensation to the complainant.
So, you could approach Lokpal if your ration card or passport or voter card is not being made or if police is not registering your case or any other work is not being done in prescribed time. Lokpal will have to get it done in a month’s time. You could also report any case of corruption to Lokpal like ration being siphoned off, poor quality roads been constructed or panchayat funds being siphoned off. Lokpal will have to complete its investigations in a year, trial will be over in next one year and the guilty will go to jail within two years.
But won’t the government appoint corrupt and weak people as Lokpal members? That won’t be possible because its members will be selected by judges, citizens and constitutional authorities and not by politicians, through a completely transparent and participatory process.
What if some officer in Lokpal becomes corrupt? The entire functioning of Lokpal/ Lokayukta will be completely transparent. Any complaint against any officer of Lokpal shall be investigated and the officer dismissed within two months.
What will happen to existing anti-corruption agencies? CVC, departmental vigilance and anti-corruption branch of CBI will be merged into Lokpal. Lokpal will have complete powers and machinery to independently investigate and prosecute any officer, judge or politician.



I support him. The corruption in India is a very serious problem and it need to be removed. Although i don't agree with his method on fasting till death, but if he succeeded in getting the Jan Lokpal bill from parliament, then it will be a huge step. Hope at least now this government will understand how much this country is worried about corruption. .......

Saturday, January 29, 2011

धर्मग्रंथों पर धारणा की चोट


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धर्मग्रंथों पर धारणा की चोट
Sep 09, 11:24 am


नई दिल्ली [शंकर शरण]। शिकागो विश्वविद्यालय की प्रोफेसर वेंडी डोनीजर की लिखी पुस्तक 'द हिंदूज: ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री' आजकल चर्चा में है। पुस्तक के चर्चा में आने की वजह कोई स्तरीय या शोधपरक लेखन नहीं, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों और आख्यानों के चुने हुए प्रसंगों की व्याख्या काम भाव की दृष्टि से किया जाना है।

उदाहरण के लिए इस पुस्तक में लिखा गया है कि रामायण में उल्लिखित राजा दशरथ कामुक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और बुढ़ापे में भी कैकेयी जैसी जवान पत्नी के साथ वह रंगरेलियों में डूबे रहते थे। इसमें लिखा गया है कि कैकेयी के इशारे पर ही राजा दशरथ ने अपने बेटे राम को जंगल में भेज दिया ताकि कोई रुकावट न रहे।

पुस्तक के मुताबिक राम और लक्ष्मण दोनों ने ही अपने पिता को कामुक बूढ़ा कहा था। वेंडी ने लिखा है कि जंगल में रहते हुए लक्ष्मण के मन में भी सीता के प्रति कामभावना पैदा हुई थी और राम ने इस बारे में लक्ष्मण से सवाल भी किया था। इसी तरह महाभारत की कथा के बारे में भी वेंडी ने अपने मनमुताबिक व्याख्या दी है। जैसे कुंती द्वारा सूर्य के साथ नियोग से प्राप्त पुत्र के बारे में लिखा गया है कि सूर्य देवता ने कुंती के साथ बलात्कार किया जिससे 'कर्ण' नामक अवैध संतान पैदा हुई।

पुस्तक में भारतीय धर्मग्रंथों के कुछ चुने हुए प्रसंगों की कामुक व्याख्या करके एक वैकल्पिक इतिहास लिखने की कोशिश की गई है। यह केवल प्राचीन ग्रंथों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक घटनाक्रमों को भी कुछ इसी तरह घसीटा गया है। गांधी की रामराज्य की कल्पना को भारत में मुसलमानों और ईसाइयों से छुटकारा पाने और हिंदू राज्य की स्थापना से जोड़ा गया है।

वेंडी ने ऐसा लेखन पहली बार नहीं किया है। हिंदू चिंतन, मनीषा और इतिहास पर वह पिछले तीन दशक से इसी तरह का लेखन करती रही हैं। हमारे बुद्धिजीवियों को भी पश्चिमी भक्ति के कारण पर्याप्त आदर और सम्मान मिलता रहा है। जिस लेखन को किसी अन्य धर्म अथवा मत के लोग घृणा या क्षोभ से देखते हैं उसे पश्चिम के रेडिकल प्रोफेसर एक नई व्याख्या के रूप में सम्मान देते हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा लेखन यदि इस्लामी प्रसंगों पर कोई करे तो उसे एंटी मुस्लिम और घोर साप्रदायिक कहकर प्रतिबंधित करने की मांग की जाती है। विडंबना यह है कि यह लोग भी वही होते हैं जो जो हिंदू ग्रंथों और महापुरुषों पर कालिख पोतने का हर तरीके से समर्थन करते हैं। यह कार्य केवल बयान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जुलूस और प्रदर्शन तक किए जाते है।

जेम्स लेन की पुस्तक में छत्रपति शिवाजी के गंदे चित्रण का समर्थन करते हुए यही किया गया था। सच्चाई तो यही है कि वेंडी डोनीजर या जेम्स लेन जैसे लेखक भारत में भी हैं। इतिहासकार डी एन झा ने लिखा है कि कृष्ण का चाल-चलन अच्छा नहीं था। साहित्यकार राजेंद्र यादव ने राम को युद्धलिप्साग्रस्त साम्राज्यवादी तथा हनुमान को पहला आतंकवादी तक बताया। रोमिला थापर ने सनातन हिंदू धर्म को नकारते हुए इसे ब्राह्मणवाद घोषित करते हुए व्याख्या दी कि यह निम्न जातियों के शोषण और दमन करने की विचारधारा है।

इधर एक नेता ने उसी भाव से द्रौपदी नामक उपन्यास लिखा। ऐसे अधिकाश लेखक हिंदू परिवारों में ही पैदा हुए, लेकिन वास्तव में यह धर्महीन हो चुके लेखक ही हैं। इनका मुख्य लक्ष्य हिंदू धर्म चिंतन और महापुरुषों को लाछित करके नाम कमाना है। विडंबना यह है कि इन सबको भारत में मान-सम्मान भी मिलता रहा है। यह एक सच्चाई है कि आजाद भारत में हिंदू मनीषा के साथ दोहरा अन्याय होता रहा है। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों को उतना सम्मान नहीं मिल पाया जितना मिलना चाहिए था। यदि इन्हें कुरान, बाइबिल की तरह धर्म-पुस्तक गया होता तो इस तरह घृणा फैलाने का दुस्साहस शायद ही कोई करता। तब राम, कृष्ण को केवल ईश्वरीय आदर दिया जाता जैसा कि पैगंबर मुहम्मद या ईसामसीह को दिया जाता है। दर्शनशास्त्र, राजनीति विज्ञान, मनोविज्ञान, इतिहास जैसे पाठ्यक्रमों में पश्चिमी विचारों की बहुलता दिखती है।

उपनिषद दर्शनशास्त्र का विश्वकोष है, किंतु भारत में दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी अरस्तू, काट, मा‌र्क्स, फूको, देरिदा आदि को ही पढ़ता है। महाभारत राजनीति और नैतिकता की अद्भुत पुस्तक होने के बावजूद औपचारिक शिक्षा से बहिष्कृत है। यह सब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किया जाता है। तर्क दिया जाता है कि यदि इन्हें पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाएगा तो बाइबिल, कुरान, हदीस को भी शामिल करना पड़ेगा।

जब वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, नीतिशतक को धर्मपुस्तक का आदर देने की बात हो इन्हें गल्प साहित्य मानकर मनमाने आलोचना का शिकार बनाया जाता है। अपनी मूल्यवान थाती का ऐसा निरादर शायद ही दुनिया में कहीं और हुआ हो। भारत में हिंदू ग्रंथों के साथ हो रहे इस दोहरे अन्याय को ईसाइयत के उदाहरण से अच्छी तरह समझा जा सकता है। सुपरस्टार के रूप में जीसस क्राइस्ट और द विंसी कोड जैसे उदाहरणों से स्पष्ट है यूरोपीय अमेरिकी समाज बाइबिल और ईसाई कथा-प्रसंगों की आलोचनात्मक व्याख्या सहता है, साथ ही ईसाइयत का पूरा चिंतन, चर्च और वेटिकन के विचार-भाषण-प्रस्ताव आदि यूरोप की शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग भी हैं और वह औपचारिक शिक्षा की प्रणाली से बाहर नहीं है।

ईसाइयत संबंधी धर्मशिक्षा पश्चिम में उसी तरह स्थापित हैं जैसे भौतिकी, रसायन या अर्थशास्त्र आदि हैं। इन्हें पढ़कर हजारों युवा उसी तरह वहां के कालेजों, विश्वविद्यालयों से हर वर्ष स्नातक होते हैं जैसे कोई अन्य विषय पढ़कर। तदनुरूप उनकी विशिष्ट पत्र-पत्रिकाएं, सेमिनार सम्मेलन आदि भी होते हैं। ईसाइयत संबंधी विमर्श, शोध, चिंतन के अकादमिक जर्नल्स आक्सफोर्ड और सेज जैसे प्रमुख अकादमिक प्रकाशनों से प्रकाशित होते हैं। ऐसा इक्का-दुक्का नहीं, बल्कि अनगिनत होता है।

यदि यूरोपीय जगत ईसा और ईसाइयत की कथाओं और ग्रंथों की आलोचनात्मक व्याख्या को स्थान देता है तो साथ ही धर्मग्रंथों के संपूर्ण अध्ययन को एक विषय के रूप में सम्मानित आसन भी देता है। स्वयं वेंडी डोनीजर शिकागो विश्वविद्यालय के डिविनिटी स्कूल में प्रोफेसर हैं। हालांकि भारतीय विश्वविद्यालयों में ऐसा कोई विभाग ही नहीं होता।

भारत में इसके ठीक विपरीत धर्म और उसके नाम पर सभी हिंदू ग्रंथों और चिंतन के अगाध भंडार को औपचारिक शिक्षा से बाहर रखा गया है। यहां यह जानने योग्य है कि मैक्सवेबर जैसे महान विद्वान ने भी भगवद्गीता को राजनीति और नैतिकता के अंत:संबंध पर पूरे विश्व में एकमात्र सुसंगत पाठ्यसामग्री माना है, किंतु क्या मजाल कि भारत में राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों को इसे पढ़ाने की अनुमति दी जाए। यह तो एक उदाहरण है।

वास्तव में यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम की तुलना में हिंदू चिंतन कहीं ज्यादा गहन है। समाज विज्ञान का कोई भी ऐसा विषय नहीं है जिसके समुचित अध्ययन के लिए हमें हिंदू ग्रंथों से मदद न मिल सके। इस सबके बावजूद समाज विज्ञान विभागों में या फिर अलग विधा के विषय के रूप में भारत में कोई अकादमिक संस्थान या स्थान नहीं बनाया गया है।

यही कारण है कि गीता प्रेस, गोरखपुर के संपूर्ण कार्यो को अकादमिक जगत उपेक्षा से देखता है। मानो वह आधुनिक समाज से कटे हुए वृद्ध पुरुषों-महिलाओं और अशिक्षितों के पढ़ने के लिए सतही व अंधविश्वासी चीजें हों।

यदि इन बातों पर सगग्रता में विचार किया जाए तो पाएंगे कि आजाद भारत में हिंदू मनीषा के साथ किस तरह दोहरा अन्याय हुआ है। यहां यह कहना गलत न होगा कि ऐसा करने के लिए आजाद भारत के शासकों और नीति-निर्माताओं ने जनता से कभी कोई जनादेश तो लिया नहीं है। यह सब चुपचाप एक चिरस्थापित औपनिवेशिक मानसिकता के तहत अभी तक चल रहा है। भारतीयों पर यह मानसिकता हजारों वर्षो की गुलामी में विदेशी शासकों ने जबरन थोपी। जिसमें हर स्वदेशी चीज खराब मानी जाती है और हर पश्चिमी चीज अच्छी।

पश्चिमी लेखक वेंडी डोनीजर को सम्मान और भारतीय हनुमान प्रसाद पोद्दार का बहिष्कार इसका स्पष्ट प्रमाण है।

----------------- Manthan Aryan------------------------------
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Friday, September 24, 2010

श्रीराम जन्मभूमि


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वाद-विवाद खूबसूरत हल नहीं होता। संवाद सौहा‌र्द्र का पर्याय है। इसका कोई विकल्प नहीं होता। सर्वोच्च न्यायपीठ ने श्रीराम जन्मभूमि मुकदमे में परस्पर संवाद का एक अवसर और दिया है। न्यायिक कार्यवाही का आधार तत्समय प्रवृत्त विधि विधान और उपलब्ध साक्ष्य होते हैं। न्यायिक कार्यवाही की यही सीमा है। लेकिन आस्था की कोई सीमा नहीं होती। आस्था अंत:करण का असीम साक्ष्य है। भारतीय संविधान में अंत:करण की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। हिंदू अंत:करण में श्रीराम एक दिव्य गहन आस्था हैं, हिंदू विवेक में वे इतिहास पुरुष हैं, पुरुषों में सर्वोत्तम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। न्यायालय की सदेच्छा विचारणीय है। श्रीराम जन्मभूमि हिंदू आस्था है। दूसरा पक्ष यहां बाबरी मस्जिद मानता है। न्यायिक कार्यवाही से एक पक्ष जीतता है, दूसरा पराजित होता है। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से यह एक खतरनाक परिस्थिति है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में यही बात कही थी, यह ऐसा विषय है, जो अनिवार्य रूप से वार्ता के आधार पर सुलझाए जाने के सर्वथा उपयुक्त है। ऐसे में कोई भी पक्ष विजेता या पराजित नहीं होता, लेकिन न्यायिक निर्णय में एक पक्ष विजेता और दूसरा पराजित होता है। राष्ट्रहित की अपेक्षा है कि इस विवाद का समाधान इस तरह किया जाए जिसमें कोई भी पक्ष स्वयं को हारने वाला न समझे। यह वार्ता द्वारा ही संभव है। फिर वार्ता के निष्कर्ष के आधार पर मुकदमे के विषय में न्यायिक आदेश प्राप्त किया जा सकता है। जब तक सभी पक्षों को संतुष्ट करने का समाधान नहीं खोजा जाता तब तक सद्भावना का विकास नहीं होगा। एक ही राष्ट्र में विजित और विजेता की भावनाएं स्थायी शत्रुभाव बढ़ाएंगी। राष्ट्रभाव खंडित होगा। हिंदू मन ने मुसलमानों की हरेक भावना का सम्मान किया है। खलीफा का खात्मा तुर्की में हुआ था। महात्मा गांधी सहित भारत के हजारों हिंदू मुस्लिम भावना के साथ खिलाफत आंदोलन में कूदे थे। मुस्लिम लीग ने दो राष्ट्र बताए। कांग्रेसी नेताओं ने अलग मुल्क दे दिया। जिन्हें जाना था, वे पाकिस्तान गए, जो यहां रहे, हिंदुओं ने उन्हें अपना सगा भाई जाना। भारत एक संस्कृति के कारण एक राष्ट्र है। समान नागरिक संहिता राष्ट्र-राज्य की अनिवार्यता है। भारत ने इन्हीं की भावना का सम्मान किया और संप्रभु राष्ट्र-राज्य के इस मौलिक सिद्धांत से भी किनाराकशी की। शाहबानो मसले पर न्यायालय का निर्णय मुस्लिम भावनाओं के विपरीत था लेकिन बहुसंख्यक समुदाय ने इस्लामी भावना की कद्र की। बावजूद इसके वे विदेशी हमलावर के हुक्म से तोड़ा गया श्रीराम जन्मभूमि मंदिर भी देने को तैयार नहीं हैं। पांडव पांच गांव मांग रहे थे। विदुर जैसे नीतिकार, भीष्म पितामह जैसे योद्धा और स्वयं योगेश्वर कृष्ण भी न्याय नहीं दिला पाए। भारत में महाभारत हो गया। कौरव नष्ट हो गए। पांडव हिमालय जाने को अभिशप्त हुए। न ये जीते, न वे। राष्ट्र की अपूर्णीय क्षति हुई। दुनिया के किसी भी राष्ट्र-राज्य में आस्था पर चोट नहीं होती लेकिन हिंदू आस्था सातवीं सदी से ही हल्ले-हमले का शिकार है। हजारों मंदिरों का ध्वस्तीकरण इतिहास की साक्षी है। तलवार का भय, लोभ और षड्यंत्र का आस्था परिवर्तन भी ऐतिहासिक तथ्य है। दुनिया के सभी पंथ, मजहब और आस्था समूह अपनी आस्था मानने को स्वतंत्र हैं केवल हिंदू आस्था ही प्रश्नवाचक है। कश्मीर के मुट्ठी भर अलगाववादी गिरोहबंद होकर संप्रभु राष्ट्र-राज्य को ललकारते हैं। सरकार मिमियाती है, पूरा राजनीतिक तंत्र उनकी बात सुनने उनके घर पहुंच जाता हैं। लेकिन हिंदू मन विधि व्यवस्था और संविधान की सभी संस्थाओं को आदर देकर भी दोयम दर्जे का नागरिक है। न्यायालय से इस या उस पक्ष की जीत का कोई खास महत्व नहीं है। बुनियादी सवाल यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय की हरेक भावना का सम्मान करने वाले करोड़ों की आबादी वाले बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का वैसा ही सम्मान अल्पसंख्यक समुदाय भी क्यों नहीं करता? न्यायपालिका काफी लंबे समय से परिश्रम कर रही है। लेकिन नतीजे विवादांत तक नहीं पहुंचे। सन 1885 में फैजाबाद कोर्ट में मालिकाना हक का मुकदमा हुआ। अंग्रेज जज चेमियर ने यथास्थिति का फैसला सुनाया। 1949-50 में फिर मुकदमा हुआ, 1955 फैसले में पूजापाठ का अधिकार बहाल रहा। 1959 में निर्मोही अखाड़े ने याचिका दी कि प्रतिवादी श्रीराम जन्मभूमि परिसर में दखल न दें। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मालिकाना दावा ठोक दिया। 1966 में इसे वक्फ संपति न मानने का आदेश हुआ। 1986 में जिला न्यायाधीश ने ताला खोलने के आदेश दिए। 1989 में श्रीराम के पक्ष में मालिकाना हक का मुकदमा हुआ। 1989 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी पांच मुकदमों को तीन न्यायाधीशों की एक बेंच को सौंपा। उच्च न्यायालय की विशेष बेंच ने 7 नवंबर, 1989 को बहुत महत्वपूर्ण बात कही, इसमें संदेह है कि इससे जुड़े कुछ प्रश्नों का समाधान न्यायिक प्रक्रिया से निकल सकता है। फिर जमीन अधिग्रहण हुआ। हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश में अधिग्रहण को उचित ठहराया। फिर 6 दिसंबर, 1992 की बड़ी घटना हो गई। जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट (1724-1804) ने लिखा था, ज्ञान संवेदन से प्रारंभ होता है। बोध शक्ति की ओर प्रगति करता है और तर्कबुद्धि में समाप्त हो जाता है। आस्था तर्कातीत है। तौरात यहूदी आस्था है। इनजील की बाबत ऐसी ही ईसाई आस्था है। बाइबिल भी अत‌र्क्य है। कुरान इस्लामी आस्था है। प्रभु यीशु के जन्म स्थान बेथलहम में निर्मित चर्च के मुख्य पादरी से एक भारतीय पत्रकार ने पूछा कि इस बात का क्या प्रमाण है कि यीशु ने यहीं जन्म लिया था? उसने उत्तर दिया ऐसा हमारा विश्वास है और यही लोक आस्था है। बेथलहम अत‌र्क्य रूप में यीशु का जन्म स्थान है लेकिन भौतिकवादी ईश्वर नहीं मानते। आस्था है कि कुरान ईश्र्वरीयवाणी है। लेकिन खांटी मा‌र्क्सवादी भी कुरान के बारे में ऐसा प्रश्न नहीं करते। आस्थाओं पर तर्क नहीं होते, लेकिन श्रीराम जन्मभूमि की हिंदू आस्था को चुनौती है। हम भारत के लोग एक संप्रभु राष्ट्र हैं। बेशक यहां भावात्मक श्रद्धा है, लेकिन भावात्मक एकता का क्या होगा? भावात्मक एकता के लिए एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान जरूरी है। हिंदू आहत हैं। राजनीति उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक मानती है। मुस्लिम सर्वोपरिता की नारेबाजी है। विद्वान उलेमा और मुस्लिम बुद्धिजीवी हिंदू भावनाओं को समझने का प्रयास करें। आहत हिंदू मन की व्यथा सुनें। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए अवसर का सदुपयोग करें। वाद-विवाद को संवाद में बदलें। श्रीराम जन्मभूमि राष्ट्र की भावात्मक एकता का प्रश्न है। हिंदू-मुसलमान के पूर्वज एक हैं। भूगोल और इतिहास भी एक है। भारत को विश्व में प्रथम श्रेणी का राष्ट्र बनाने का लक्ष्य भी एक है, लेकिन भावात्मक एकता के बीच दीवारें हैं। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विवाद का आपसी हल ही मजबूत राष्ट्र की गारंटी है।

Tuesday, September 14, 2010

मैं आप सबकी हूँ : हिन्दी मैं झगड़ों की भाषा नहीं हूँ

मैं हिन्दी हूँ। बहुत दुखी हूँ। स्तब्ध हूँ। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ? कैसे शुरू करूँ? मैं, जिसकी पहचान इस देश से है, इसकी माटी से है। इसके कण-कण से हैं। रोज अपने ही आँगन में बेइज्जत की जा रही हूँ। कहने को संविधान के अनुच्छेद 343 में मुझे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वह मेरा प्रसार बढ़ाएँ। पर आज यह सब मुझे क्यों कहना पड़ रहा है?

मन बहुत दुखता है जब मुझे अपनी ही संतानों को यह बताना पड़े कि मैं भारत के 70 प्रतिशत गाँवों की अमराइयों में महकती हूँ। मैं लोकगीतों की सुरीली तान में गुँजती हूँ। मैं नवसाक्षरों का सुकोमल सहारा हूँ। मैं जनसंचार का स्पंदन हूँ। मैं कलकल-छलछल करती नदियाँ की तरह हर आम और खास भारतीय ह्रदय में प्रवाहित होती हूँ। मैं मंदिरों की घंटियों, मस्जिदों की अजान, गुरुद्वारे की शबद और चर्च की प्रार्थना की तरह पवित्र हूँ। क्योंकि मैं आपकी, आप सबकी-अपनी हिन्दी हूँ।


NDविश्वास करों मेरा कि मैं दिखावे की भाषा नहीं हूँ, मैं झगड़ों की भाषा भी नहीं हूँ। मैंने अपने अस्तित्व से लेकर आज तक कितनी ही सखी भाषाओं को अपने आँचल से बाँध कर हर दिन एक नया रूप धारण किया है। फारसी, अरबी, उर्दू से लेकर 'आधुनिक बाला' अंग्रेजी तक को आत्मीयता से अपनाया है। सखी भाषा का झगड़ा मेरे लिए नया नहीं है।

पहले भी मेरी दक्षिण भारतीय 'बहनों' की संतानों ने यह स्वर उठाया था, मैंने हर बार शांत और धीर-गंभीर रह कर मामले को सहजता से सुलझाया है। लेकिन इस बार मेरी अनन्य सखी मराठी की संतानें मेरे लिए आतंक बन कर खड़ी है। इस समय जबकि सारे देश में विदेशी ताकतों का खतरा मँडरा रहा है, ऐसे में आपसी दीवारों का टकराना क्या उचित है?

लेकिन कैसे समझाऊँ और किस-किस को समझाऊँ? मैं क्या कल की आई हुई कच्ची-पक्की बोली हूँ जो मेरा नामोनिशान मिटा दोगे? मैं इस देश के रेशे-रेशे में बुनी हुई, अंश-अंश में रची-बसी ऐसी जीवंत भाषा हूँ जिसका रिश्ता सिर्फ जुबान से नहीं दिल की धड़कनों से हैं। मेरे दिल की गहराई का और मेरे अस्तित्व के विस्तार का तुम इतने छोटे मन वाले भला कैसे मूल्यांकन कर पाओगे? इतिहास और संस्कृ‍ति का दम भरने वाले छिछोरी बुद्धि के प्रणेता कहाँ से ला सकेंगे वह गहनता जो अतीत में मेरी महान संतानों में थी।


NDमैंने तो कभी नहीं कहा कि बस मुझे अपनाओ। बॉलीवुड से लेकर पत्रकारिता तक और विज्ञापन से लेकर राजनीति तक हर एक ने नए शब्द गढ़े, नए शब्द रचें, नई परंपरा, नई शैली का ईजाद किया। मैंने कभी नहीं सोचा कि इनके इस्तेमाल से मुझमें विकार या बिगाड़ आएगा। मैंने खुले दिल से सब भाषा का,भाषा के शब्दों का, शैली और लहजे का स्वागत किया। यह सोचकर कि इससे मेरा ही विकास हो रहा है। मेरे ही कोश में अभिवृद्धि हो रही है। अगर मैंने भी इसी संकीर्ण सोच को पोषित किया होता कि दूसरी भाषा के शब्द नहीं अपनाऊँगी तो भला यहाँ तक उद्दाम आवेग से इठलाती-बलखाती कैसे पहुँच पाती?

मैंने कभी किसी भाषा को अपना दुश्मन नहीं समझा। किसी भाषा के इस्तेमाल से मुझमें असुरक्षा नहीं पनपी। क्योंकि मैं जानती थी कि मेरे अस्तित्व को किसी से खतरा नहीं है। महाराष्ट्र की घटनाओं से एक पल के लिए मेरा यह विश्वास डोल गया।

पिछले दिनों मैं और मेरी सखी भाषाएँ मिलकर त्रिभाषा फार्मूला पर सोच ही रही थी। लेकिन इसका अर्थ यह तो कतई नहीं था कि हमारी संतान एक-दूसरे के विरुद्ध नफरत के खंजर निकाल लें। यह कैसा भाषा-प्रेम है? यह कैसी भाषाई पक्षधरता है? क्या 'माँ' से प्रेम दर्शाने का यह तरीका है कि 'मौसी' की गोद में बैठने पर अपने ही भाई के मुँह पर तमाचा मार दो? क्या लगता है आपको, इससे 'मराठी' खुश होगी? नहीं हो सकती। हम सारी भाषाएँ संस्कृत की बेटियाँ हैं। बड़ी बेटी का होने का सौभाग्य मुझे मिला, लेकिन इससे अन्य भाषाओं का महत्व कम तो नहीं हो जाता। पर यह भी तो सच है ना कि मुझे अपमानित करने से मराठी का महत्व बढ़ तो नहीं जाएगा?

यह कैसा भाषा गौरव है जो अपने अस्तित्व को स्थापित करने के लिए स्थापित भाषा को उखाड़ देने की धृष्टता करें। मुझे कहाँ-कहाँ पर प्रतिबंधित करोगे? ‍पूरा महाराष्ट्र तो बहुत दूर की बात है अकेली मुंबई से मुझे निकाल पाना संभव नहीं है। बरसों से भारतीय दर्शकों का मनोरंजन कर रही फिल्म इंडस्ट्री से पूछ कर देख लों कि क्या मेरे बिना उसका अस्तित्व रह सकेगा? कैसे निकालोगे लता के सुरीले कंठ से, गुलजार की चमत्कारिक लेखनी से? अपनी सोच को थोड़ा सा विस्तार दो, मैं तो सबकी हूँ। और रहूँगी। मेरा जीते जी श्राद्ध नहीं मनाओ। पुण्यतिथि नहीं मनाओ, हो सके तो मुझे दिल में बैठाओं।
आज बस इतना ही,

आप सबकी
हमेशा-सी,
हिन्दी

Sunday, May 30, 2010

चाहे जितनी बार आग मे जला के देखो :)


http://anaryan.hi5.com

हर चहरे मे कुछ तोह एह्साह है,
आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,
क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .
चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तोह चाँद की चाहत किसे होती.
कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.
कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,
जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.
दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है
दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है.
दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.
दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,
इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,
यह वो "अनमोल" मोटी है जो बिकता नही . . .
सची है दोस्ती आजमा के देखो..
करके यकीं मुझपर मेरे पास आके देखो,
बदलता नही कभी सोना अपना रंग ,
चाहे जितनी बार आग मे जला के देखो :)